पांचवीं ढाल का सारांश
अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत
छहढाला(48)
पांचवीं ढाल का सारांश
यह बारह भावनाएँ चारित्रगुण की आंशिक शुद्ध पर्यायें हैं; इसलिये वे सम्यग्दृष्टि जीव को ही हो सकती हैं। सम्यक् प्रकार से यह बारह प्रकार की भावनाएँ भाने से वीतरागता की वृद्धि होती है; उन बारह भावनाओं का चिंतवन मुख्यरूप से तो वीतरागी दिगम्बर जैन मुनिराज को ही होता है तथा गौणरूप से सम्यग्दृष्टि को होता है। जिस प्रकार पवन के लगने से अग्नि भभक उठती है, उसी प्रकार अन्तरंग परिणामों की शुद्धता सहित इन भावनाओं का चिंतवन करने से समताभाव प्रगट होता है और उससे मोक्षसुख प्रगट होता है। स्वोन्मुखतापूर्वक इन भावनाओं से संसार, शरीर और भोगों के प्रति विशेष उपेक्षा होती है और आत्मा के परिणामों की निर्मलता बढ़ती है।
अनित्यादि चिंतवन द्वारा शरीरादि को बुरा जानकर, अहित मानकर उनसे उदास होने का नाम अनुप्रेक्षा नहीं है, क्योंकि यह तो जिस प्रकार पहले किसी को मित्र मानता था तब उसके प्रति राग था और फिर उसके अवगुण देखकर उसके प्रति उदासीन हो गया, समीपकर पहले शरीरादिसे राग था, किन्तु बाद में उनके अनित्यादि अवगुण देखकर उदासीन हो गया; परन्तु ऐसी उदासीनता तो द्वेषरूप है। किन्तु अपने तथा शरीरादिके यथार्थ स्वरूप को जानकर, भ्रम का निवारण करके, उन्हें अन्य जानकर राग न करना तथा बुरा जानकर द्वेष न करना—ऐसी यथार्थ उदासीनता के हेतु अनित्यता आदि का यथार्थ चिंतवन करना ही सच्ची अनुप्रेक्षा है। (मोक्षमार्ग प्रकाशक पृ. २२९, श्री टोडरमल स्मारक ग्रन्थमाला से प्रकाशित)।
पांचवीं ढाल का भेद-संग्रह
अनुप्रेक्षा अथवा भावना:— अनित्य, अशरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचि, आस्रव, संवर, निर्जरा, लोक, बोधिदुर्लभ और धर्म—यह बारह हैं।
इन्द्रियों के विषय:— स्पर्श, रस, गंध, वर्ण और शब्द—यह पांच हैं।
निर्जरा:— के चार भेद हैं:—अकाम, सविपाक, सकाम, अविपाक
योग:— द्रव्य और भाव।
परिवर्तन:— पांच प्रकार हैं:—द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव और भाव।
मलद्वार:— दो कान, दो आँखें, दो नासिका छिद्र, एक मुँह तथा मल-मूत्रद्वार दो—इस प्रकार नौ।
वैराग्य:— संसार, शरीर और भोग—इन तीनों से उदासीनता।
धातु:— पीब, लहू, वीर्य, मल, चरबी, मांस और हड्डी आदि।
पांचवीं ढाल का लक्षण-संग्रह
प्रेक्षा (भावना):— भेदज्ञानपूर्वक संसार, शरीर और भोगादि के स्वरूप का बारंबार विचार करके उनके प्रति उदासीनभाव उत्पन्न करना ।
अशुभ उपयोगः- हिंसादिमें अथवा कषाय, पाप और व्यसनादि निन्दापात्र कार्योंमें प्रवृत्ति।
असुरकुमारः- असुर नामक देवगति नामकर्म के उदय वाले भवनवासी देव ।
कर्मः- आत्मा रागादि विकाररूप से परिणमित हो तो उसमें निमित्तरूप होने वाले जड़कर्म-द्रव्यकर्म।
गतिः- नरक, तिर्यंच, देव और मनुष्यरूप जीव की अवस्था विशेष को गति कहते हैं, उसमें गति नामक नामकर्म निमित्त है।
ग्रैवेयकः- सोलहवें स्वर्ग से ऊपर और प्रथम अनुदिश से नीचे, देवों को रहने के स्थान।
देवः- देवगतिको प्राप्त जीवों को देव कहते हैं; वे अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व- इन आठ सिद्धि (ऐश्वर्य) वाले होते हैं; उनके मनुष्य समान आकारवाला सप्त कुधातु रहित सुन्दर शरीर होता है।
धर्मः- दुःख से मुक्ति दिलाने वाला निश्चयरत्नत्रयरूप मोक्षमार्ग; जिससे आत्मा मोक्ष प्राप्त करता है। (रत्नत्रय अर्थात् सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र ।)
धर्म के भिन्न-भिन्न लक्षणः— (१) वस्तु का स्वभाव वह धर्म; (२) अहिंसा; (३) उत्तमक्षमादि दस लक्षण; (४) निश्चयरत्नत्रय ।
पापः— मिथ्यादर्शन, आत्मा की विपरीत समझ, हिंसादि अशुभ- भाव सो पाप है।
पुण्यः— दया, दान, पूजा, भक्ति, व्रतादि के शुभभाव; मंदकषाय यह जीव के चारित्रगुण की अशुभ दशा है; पुण्य-पाप दोनों आस्रव हैं, बन्धनके कारण हैं।
बोधिः— सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र की एकता।
मुनिः— (साधु परमेष्ठी):— समस्त व्यापार से विमुक्त, चार प्रकार की आराधना में सदा लीन, निर्मन्थ और निर्मोह ऐसे सर्व साधु होते हैं। समस्त भावलिंगी मुनियोंको नग्न- दिगम्बर दशा तथा साधु के २८ मूलगुण होते हैं।
योगः— मन, वचन, काया के निमित्त से आत्मा के प्रदेशों का कम्पन होना उसे द्रव्ययोग कहते हैं। कर्म और नोकर्म के ग्रहण में निमित्तरूप जीव की शक्ति को भावयोग कहते हैं।
शुभ उपयोगः— देवपूजा, स्वाध्याय, दया, दानादि, अणुव्रत- महाव्रतादि शुभभावरूप आचरण ।
सकलव्रतः— ५-महाव्रत, ५-समिति, ६-आवश्यक, ५-इन्द्रिय-जय, ६-केशलोच, अस्नान, भूमिशयन, अदन्तधोवन,
खड़े-खड़े आहार, दिन में एक बार आहार-जल तथा नग्नता आदि का पालन—सो व्यवहार से सकलव्रत है; और रत्नत्रय की एकतारूप आत्मस्वभाव में स्थिर होना सो निश्चय से सकलव्रत है।
सकलव्रती:- (सकलव्रतोंके धारक) रत्नत्रयकी एकतारूप स्वभावमें स्थिर रहनेवाले महाव्रतके धारक दिगम्बर मुनि वे निश्चय सकलव्रती हैं।
अन्तर-प्रदर्शन
१:- अनुप्रेक्षा और भावना पर्यायवाची शब्द हैं; उनमें कोई अन्तर नहीं है।
२:- धर्मभावना में तो बारम्बार विचार की मुख्यता है और धर्म में निज गुणों में स्थिर होने की प्रधानता है।
३:- व्यवहार सकलव्रत में तो पापों का सर्वदेश त्याग किया जाता है और व्यवहार अणुव्रत में उनका एकदेश त्याग किया जाता है; इतना इन दोनों में अन्तर है।
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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