तेरी छत्रच्छाया
समाधि भक्ति
(शब्द शिल्प अनुकम्पा: आचार्य श्री विभव सागर जी महाराज)
तेरी छत्रच्छाया भगवन्! मेरे सिर पर हो।
मेरा अन्तिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो
जिनवाणी रसपान करूँ मैं, जिनवर को ध्याऊँ।
आर्यजनों की संगति पाऊँ, व्रत संयम चाहूँ।
गुणीजनों के सद्गुण गाऊँ, जिनवर यह वर दो।
मेरा अन्तिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो
परनिन्दा न मुँह से निकले, मधुर वचन बोलूँ।
हृदय तराजू पर हितकारी, सम्भाषण तोलूँ
आत्म तत्व की रहे भावना, भाव विमल कर दो।
मेरा अन्तिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो
जिन शासन में प्रीति बढ़ाऊँ, मिथ्यापथ छोड़ूँ।
निष्कलंक चैतन्य भावना, जिनमत से जोड़ूँ
जन्म-जन्म में जैन धर्म, यह मिले कृपा कर दो।
मेरा अन्तिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो
मरण समय गुरु पाद-मूल हो, सन्त समूह रहे।
जिनालयों में जिनवाणी की, गंगा नित्य बहे
भव-भव में संन्यास मरण हो, नाथ हाथ धर दो।
मेरा अन्तिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो
बाल्यकाल से अब तक मैंने, जो सेवा की हो।
देना चाहो प्रभो! आप तो, बस इतना फल दो
श्वास-श्वास अन्तिम श्वासों में, णमोकार भर दो।
मेरा अन्तिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो
विषय कषायों को मैं त्यागूँ, तजूँ परिग्रह को।
मोक्ष मार्ग पर बढ़ता जाऊँ, नाथ अनुग्रह हो
तन पिंजर से हमेंनिकालो, सिद्धालय घर दो।
मेरा अन्तिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो
भद्रबाहु सम गुरु हमारे, हमें भद्रता दो।
रत्नत्रय संयम की शुचिता, हृदय सरलता दो
चन्द्रगुप्त सी गुरु सेवा का, पाठ हृदय भर दो।
मेरा अन्तिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो
अशुभ न सोचूँ, अशुभ न चाहूँ, अशुभ नहीं देखूँ।
अशुभ सुनूँ न, अशुभ कहूँ न, अशुभ नहीं लेखूँ
शुभ चर्चा हो, शुभ क्रिया हो, शुद्ध भाव भर दो।
मेरा अन्तिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो
तेरे चरण कमल द्वय, जिनवर! रहें हृदय मेरे।
मेरा हृदय रहे सदा ही, चरणों में तेरे
पण्डित-पण्डित मरण हो मेरा, ऐसा अवसर दो।
मेरा अन्तिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो
दुःख नाश हों, कर्म नाश हों, बोधि लाभ वर दो।
जिन गुण से प्रभु आप भरे हो, वह मुझ में भर दो
यही प्रार्थना, यही भावना, पूर्ण आप कर दो।
मेरा अन्तिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो
तेरी छत्रच्छाया भगवन्! मेरे सिर पर हो।
मेरा अन्तिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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