महावीर की अमृत वाणी
महावीर की अमृत वाणी
माँ त्रिशला के लाल तुम, हो करुणा के धाम।
धर्म धरा इस देश की, जपत तुम्हारा नाम।
शुद्धाचार की भीति पर, कर अपना निर्माण।
ज्ञान चरण उत्थान से, पायो पद निर्वाण।
नाथ तुम्हारे जगत में, सेवक लाखों लाख।
नाथवंश के वृक्ष तुम, बढ़ी तुम्हारी शाख।
वीर महा अति वीर जी, तुम जग की जागीर।
तुम निर्धन की सम्पदा, वर्धमान महावीर।
नाम तिहारो ध्याय के, सकल दाह मिट जाय।
मृत्युंजय तुम हो प्रभु, ध्यान धरे दुःख जाय।
परम पिता परमात्मा, सिद्धार्थ सुत आप।
अजर अमर प्रभु आपका, जग में सुयश प्रताप।
जैन धर्म तुम पर टिका, हो तुम अंतिम देव।
तीर्थंकर चौबीसवें, महामहिम जिनदेव।
निर्मल हिय में धार के, कर निर्मल परिणाम।
करें वंदना आपकी, शत शत करें प्रणाम।
2.
वीर प्रभु तुम धर्म धुरंधर, ज्ञान रूप अतुलित अति सुंदर।
वीर प्रभु तुम जग में नामी, वीतराग तुम अन्तर्यामी।
वीर नाम जग तारणहारा, पतितन को प्रभु देय किनारा।
वीर नाम तुम जपो निरंतर, शुद्ध होय मन वाणी अंतर।
जो भव जीव नाम उच्चारे, जन्म जरा भय संकट तारे।
जो तुम नाम जपे मन मांहि, आए जगत को कछु दुःख नाहि।
जो तुम नाम जपे मन लाय, सर्व अमंगल दूर भगाए।
नाश अशोक शोक ते हीना, भक्तन को करो शोक विहीन।
वीर वीर जो जन उच्चारे, अपनो जीवन तुरत संवारे।
नाम तुम्हारो देय उर्वरा, कठिन कर्म की होय निर्जरा।
तुमरो गुण जो भी नर गाए, भवसागर से वो तिर जाए।
तुम में है प्रभु ज्ञान अनंता, ध्यान करे सुर नर मुनि संता।
दो अक्षर का नाम तिहारा, मन मंदिर में करे उजारा।
तुम निज नाथ महान हितैषी, तीन जगत के तुम उपदेशी।
नाथ तिहारे नाम सों, उपजे मन आलोक। दिव्य चरण प्रभु आपके, सदा देहुं मैं धोक।
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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