आरती- आदिनाथ जी की
आरती- आदिनाथ जी की
आरती आदिनाथ थारी, कर्म की काटो अंधियारी।
1. जन्म अयोध्या में प्रभु लीना, नाभिराय घर आए।
मरुदेवी के उर से जन्मे, ऋषभदेव कहलाए।
रत्न की वर्षा हुई भारी, कर्म की..................।
2. ऋषभदेव सा राजा पाकर, धन्य हुआ ये देश।
राजनीति और न्यायनीति से, बदला था परिवेश।
नहीं कोई तुम सा उपकारी, कर्म की..................।
3. नृत्य करने को आई अप्सरा, अंजन खूब लगाया।
नीलांजना की मृत्यु देखी, मन वैराग्य समाया।
उसी क्षण दीक्षा ली भारी, कर्म की..................।
4. छोड़ दिया घरबार प्रभु ने, चले शिखर कैलाश।
करी तपस्या घोर प्रभु ने, किया कर्म का नाश,
तपोनिधि भूमि तेरी न्यारी, कर्म की..................।
5. प्रथम पूज्य हे आदि जिनेश्वर, तीर्थंकर बन आए।
मोक्ष परम पद प्राप्त किया, प्रभु मोक्ष मार्ग खुलवाए।
निर्मल छवि पर बलिहारी, कर्म की...............
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
विनम्र निवेदन
यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें।
धन्यवाद
Comments
Post a Comment