आरती - श्री सिद्धचक्र पाठ
आरती - श्री सिद्धचक्र पाठ
श्री सिद्धचक्र का पाठ, करो दिन आठ,
ठाठ से प्राणी, फल पायो मैना रानी।
मैनासुन्दर इक नारी थी, कोढ़ी पति लखि दुखियारी थी।
नहिं पडे़ चैन दिन रैन, व्यथित अकुलानि, फल पायो.......।
जो पति का कष्ट मिटाऊँगी, तो उभय लोक सुख पाऊँगी,
नहिं अजागलस्तनवत निष्फल जिन्दगानी, फल पायो.......।
एक दिवस गई जिन मंदिर में, दर्शन कर अति हर्षी उर में,
फिर लखे साधु निग्र्रन्थ दिगम्बर ज्ञानी, फल पायो.......।
बैठी कर मुनि को नमस्कार, निज निन्दा करती बार बार,
भर अश्रु नयन कही मुनि सों दुःखद कहानी, फल पायो.......।
बोले मुनि पु़त्री धैर्य धरो, श्री सिद्धचक्र का पाठ करो,
नहिं रहे कुष्ठ की तन में नाम निशानी, फल पायो.......।
सुन साधु वचन हर्षी मैना, नहिं होंय झूठ मुनि के बैना,
करिके श्रद्धा श्री सिद्धचक्र की ठानी, फल पायो.......।
जब पर्व अठाई आया है, उत्सवयुत पाठ कराया है,
सबकेे तन छिड़का यन्त्र न्हवन का पानी, फल पायो.......।
गन्धोदक छिड़का वसु (आठ) दिन में, नहिं रहा कुष्ठ किंचित तन में,
भई सात शतक(700) की काया स्वर्ण समानी, फल पायो.......।
भव भोगि भोगि योगेश भए, श्रीपाल कर्म हनि मोक्ष गए,
दूजे भव मैना पावे शिव रजधानी, फल पायो.......।
जो पाठ करे मन वच तन से, वे छूटि जाएं भव बन्धन से,
‘मक्खन’ मत करो विकल्प कहा जिनवाणी.........।
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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