ओंकारमयी वाणी तेरी


 


ओंकारमयी वाणी तेरी, जिनधर्म की शान है।

समोशरण देख के, शांत छवि देख के, गणधर भी हैरान है।

स्वर्ण कमल पर आसन है तेरा, और इन्द्र कर रहे गुणगान हैं।

दृष्टि है तेरी नासा के ऊपर, सर्वज्ञता ही तेरी शान है।

चाँद सितारों में, लाखों हज़ारों में, तेरी यहाँ कोई मिसाल नहीं है।

चार मुख दिखते, समोशरण में, स्वर्ग में भी ऐसा कमाल नहीं है।

हमको भी मुक्ति मिले, हम सब का अरमान है। समोशरण.....

सारे जहाँ में फैली है वाणी, गणधर ने गूंथी इसे शास्त्र में।

सच्ची विनय से श्रद्धा करें तो, ले जाती है मुक्ति के मार्ग में।

कषाय मिटाए, राग को भगाए, जिसके श्रवण से ये शांति मिली है।

सुख का ये सागर, आत्म में रमण कर, आतम की बगिया में मुक्ति खिली है।

हम सब भी तुम सा बनें, ऐसा ये वरदान है। समोशरण.....

 मैं हूँ त्रिकाली ज्ञानी स्वभावी, दिव्य ध्वनि का यही सार है।

शक्ति अनंत का पिंड अखंड, पर्याय का भी ये आधार है।

दीए झलकते हैं ज्ञान की कला में, कैसा ये अद्भुत कलाकार है।

दृष्टि को जीता फिर भी अछूता, तुझमें ही ऐसा चमत्कार है।

जग में है महिमा तेरी, गूंज रहा नाम है। समोशरण.....

। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद 

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