दर्शन स्तुति

 दर्शन स्तुति (पारुल जैन, दरियागंज, दिल्ली)

प्रभुवर तेरे दर्शन कर निज आतम को ध्याऊँ।

निज में निज को देखूँ, निज में ही समा जाऊँ।

ये नासा दृष्टि तेरी, ये वीतरागी मुद्रा।

सर्वज्ञ हो तब भी, निज आनंद की मुद्रा।

कुछ नहीं यहाँ तेरा है, कुछ नहीं यहाँ मेरा है।

ये भाव विकारी ही, संसार का डेरा है॥

ये शांत स्वरूप तेरा, उर को अब भाता है।

निज सहज स्वरूप अपना, मन पाना चाहता है॥ प्रभुवर तेरे......

कर पर कर रखे प्रभु, यही भाव बताते हो।

कर्ता नहीं निज पर का, सबको समझाते हो।

कर्ता बुद्धि छोडूँ, यही भाव जगाते हो।

ज्ञाता दृष्टा होऊँ, ये ही सिखलाते हो॥

निज पर का ज्ञान करूँ, ये ज्ञान कराते हो।

भव सागर पार करूँ, यही भाव जगाते हो॥ प्रभुवर.......

नहीं वस्त्र धरे तन पे, नहीं नारी रखी संग में।

चैतन्य में रहते हो, नहीं शस्त्र धरे संग में॥

कर्मों को जीत लिया, समता रख के उर में।

निर्मल ये रूप प्रभु, रखूँ मैं अब मन में॥

तुम जैसा हो जाऊँ, यही भावना है मन में।

त्यागूँ भव-भव बाधा, रह लूँ निज आतम में॥ प्रभुवर.......

जो मार्ग दिखाया है, उस पर अब चल पाऊँ।

प्रभुवर तेरे दर्शन कर, निज आतम को ध्याऊँ॥

निज में निज को देखूँ, निज में ही समा जाऊँ॥ - 2 प्रभुवर .......

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा - सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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