दिन-रात मेरे स्वामी

दिन-रात मेरे स्वामी


दिन-रात मेरे स्वामी, मैं भावना ये भाऊँ । 

देहान्त के समय में, तुमको न भूल जाऊँ ॥ 

शत्रु अगर कोई हो, संतुष्ट उनको कर दूँ । 

समता का भाव धरकर, सबसे क्षमा कराऊँ ॥ 

त्यागूँ आहार-पानी, औषध-विचार अवसर । 

टूटें नियम न कोई, दृढ़ता हृदय में लाऊँ ॥ 

जागें नहीं कषायें, नहीं वेदना सतावें । 

तुमसे ही लौ लगी हो, दुर्यान को भगाऊँ ॥ 

आतम-स्वरूप अथवा, आराधना विचारन । 

अरहंत सिद्ध साधु, रटना यही लगाऊँ ॥ 

धरमात्मा निकट हों, चरचा धरम सुनावें । 

वह सावधान रक्खें, गाफिल न होने पाऊँ ॥ 

जीने की हो न वाँछा, मरने की हो न इच्छा । 

परिवार-मित्रजन से, मैं राग को हटाऊँ ॥ 

भोगे जो भोग पहिले, उनका न होवे सुमिरन । 

मैं राज्य-संपदा या, पद-इन्द्र का न चाहूँ ॥ 

रत्न-त्रयों का पालन, हो अन्त में समाधी । 

'शिवराम' प्रार्थना है, जीवन सफल बनाऊँ ॥

 ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा - सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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