जयमाला
जयमाला (देव शास्त्र गुरु पूजा)
भव वन में जी भर घूम चुका, कण-कण को जी भर-भर देखा।
मृग-सम मृग-तृष्णा के पीछे, मुझ को न मिली सुख की रेखा।
अनित्य भावना
झूठे जग के सपने सारे, झूठी मन की सब आशायें ।
तन-जीवन-यौवन अस्थिर हैं, क्षण भंगुर पल में मुरझायें ।
अशरण भावना
सम्राट महाबल सेनानी, उस क्षण को टाल सकेगा क्या !
अशरण मृत काया में हर्षित, निज जीवन डाल सकेगा क्या ?
संसार भावना
संसार महा दु:ख सागर के, प्रभु ! दु:ख मय सुख-आभासों में ।
मुझको न मिला सुख क्षण भर भी, कंचन-कामिनि-प्रासादों में ।
एकत्व भावना
मैं एकाकी एकत्व लिये, एकत्व लिये सब ही आते ।
तन-धन को साथी समझा था, पर ये भी छोड़ चले जाते ॥
अन्यत्व भावना
मेरे न हुये ये मैं इनसे, अति भिन्न अखंड निराला हूँ ।
निज में पर से अन्यत्व लिये, निज सम रस पीने वाला हूँ ।
अशुचि भावना
जिस के शृंगारों में मेरा, यह मँहगा जीवन घुल जाता ।
अत्यन्त अशुचि जड़ काया से, इस चेतन का कैसा नाता ।
आस्रव भावना
दिन रात शुभाशुभ भावों से, मेरा व्यापार चला करता ।
मानस, वाणी और काया से, आस्रव का द्वार खुला रहता ।
संवर भावना
शुभ और अशुभ की ज्वाला से, झुलसा है मेरा अन्तस्तल ।
शीतल समकित किरणें फूटें, संवर से जागे अन्तर्बल ।
निर्जरा भावना
फिर तप की शोधक वह्नि जगे, कर्मों की कड़ियां टूट पड़ें ।
सर्वाङ्ग निजात्म प्रदेशों से, अमृत के निर्झर फूट पड़ें॥
लोक भावना
हम छोड़ चलें यह लोक तभी, लोकान्त विराजें क्षण में जा ।
निज लोक हमारा वासा हो, शोकांत बनें फिर हम को क्या ।
बोधिदुर्लभ भावना
जागे मम दुर्लभ बोधि प्रभो! दुर्नयतम सत्वर टल जावे ।
बस ज्ञाता दृष्टा रह जाऊं, मद-मत्सर-मोह विनश जावे ॥
धर्म भावना
चिर रक्षक धर्म हमारा हो, हो धर्म हमारा चिर साथी ।
जग में न हमारा कोई था, हम भी न रहें जग के साथी ।
चरणों में आया हूँ प्रभुवर! शीतलता मुझ को मिल जावे ।
मुरझाई ज्ञान-लता मेरी, निज अन्तर्बल से खिल जावे ।
सोचा करता हूँ भोगों से, बुझ जावेगी इच्छा ज्वाला ।
परिणाम निकलता है लेकिन, मानो पावक में घी डाला ।
तेरे चरणों की पूजा से, इन्द्रिय सुख की ही अभिलाषा ।
अब तक न समझ ही पाया प्रभु ! सच्चे सुख की भी परिभाषा ।
तुम तो अविकारी हो प्रभुवर! जग में रहते जग से न्यारे ।
अतएव झुके तव चरणों में, जग के माणिक मोती सारे ।
स्याद्वाद मयी तेरी वाणी, शुभनय के झरने झरते हैं
उस पावन नौका पर लाखों, प्राणी भव-वारिधि तिरते हैं ।
हे गुरुवर ! शाश्वत सुख-दर्शक, यह नग्न स्वरूप तुम्हारा है ।
जग की नश्वरता का सच्चा, दिग्दर्शन करने वाला है ।
जब जग विषयों में रच पच कर, गाफिल निद्रा में सोता हो ।
अथवा वह शिव के निष्कंटक, पथ में विष-कंटक बोता हो ।
हो अर्ध निशा का सन्नाटा, वन में वनचारी चरते हो ।
तब शांत निराकुल मानस तुम, तत्वों का चिन्तन करते हो ।
करते तप शैल नदी तट पर, तरु तल वर्षा की झड़ियों में ।
समता रस पान किया करते, सुख दु:ख दोनों की घड़ियों में ।
अन्तर ज्वाला हरती वाणी, मानों झड़ती हों फुलझड़ियां ।
भव बन्धन तड़ तड़ टूट पड़ें, खिल जावें अन्तर की कलियां ॥
तुम-सा दानी क्या कोई हो, जग को दे दी जग की निधियाँ ।
दिन रात लुटाया करते हो, सम-शम की अविनश्वर मणियां ।
हे निर्मल देव ! तुम्हें प्रणाम, हे ज्ञान दीप आगम! प्रणाम !
हे शांति त्याग के मूर्तिमान, शिव पथ-पंथी गुरुवर! प्रणाम ।
ॐ ह्रीं देव शास्त्र गुरुभ्यो अनर्घपद प्राप्तये महार्घम्।
इस जयमाला में वर्णित बारह भावनाओं का प्रतिदिन पाठ करने से जीवन में वैराग्य की वृद्धि होती है।
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा - सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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