कभी प्यासे को

 कभी प्यासे को पानी पिलाया नहीं 


कभी प्यासे को पानी पिलाया नहीं, बाद अमृत पिलाने से क्या फायदा। 

कभी गिरते हुए को उठाया नहीं, बाद आँसू बहाने से क्या फायदा। कभी प्यासे.......

मैं तो मंदिर गया, पूजा आरती की। पूजा करते हुए ये ख्याल आ गया। 

कभी माँ-बाप की सेवा की ही नहीं, सिर्फ पूजा के करने से क्या फायदा। कभी प्यासे......

मैं तो सत्संग गया, गुरुवाणी सुनी। गुरुवाणी को सुन कर, ख्याल आ गया। 

जन्म मानव का ले के, दया न करी, फिर मानव कहलाने से क्या फायदा। कभी प्यासे......

मैंने दान किया, मैंने जप तप किया, दान करते हुए ये ख्याल आ गया।

 कभी भूखे को भोजन कराया नहीं, दान लाखों का करने से क्या फायदा। कभी प्यासे......

गंगा नहाने हरिद्वार, काशी गया, गंगा नहाते ही मन में ख्याल आ गया। 

तन को धोया मगर, मन को धोया नहीं, फिर गंगा नहाने से क्या फायदा। कभी प्यासे.......

मैंने वेद पढ़े, मैंने शास्त्र पढ़े, शास्त्र पढ़ते हुए ये ख्याल आ गया। 

मैंने ज्ञान किसी को बांटा नहीं, फिर ज्ञानी कहलाने से क्या फायदा। कभी प्यासे......

मात-पिता के ही चरणों में चारों धाम हैं, आजा आजा यही मुक्ति का धाम है।

पिता-माता की सेवा की ही नहीं, फिर तीर्थों में जाने से क्या फायदा। कभी प्यासे......

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा - सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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