जिनवाणी स्तुति
“जिनवाणी स्तुति”
मिथ्यातम नाशवे को, ज्ञान के परकाशवे को, आपा परभासवे को, भानु सी बखानी है।
छहों द्रव्य जानवे को, बंध विधि भानवे को, स्वपर पिछानवे को, परम प्रमानी है।
अनुभव बतायवे को, जीव के जतायवे को, काहू न सतायवे को, भव्य उर आनी है।
जहाँ तहाँ तारवे को, पार के उतारवे को, सुख विस्तारवे को, ये ही जिनवाणी है।
जा वाणी के ज्ञान से, सूझे लोकालोक, सो वाणी मस्तक धरूँ, सदा देत हूँ धोक।
हे जिनवाणी भारती, तोहि जपूं दिन रैन, जो तेरा शरणा गहे, सो पावे सुख चैन।
देव भजूँ अरिहन्त को, गुरु सेवा निर्ग्रन्थ,
दया धर्म पालो सदा, यही मोक्ष का पन्थ।
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा - सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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