निर्ग्रन्थता की भावना
निर्ग्रन्थता की भावना
धुन - दे दी हमें आज़ादी
निर्ग्रन्थता की भावना अब हो सफल मेरी,
बीते अहो आराधना में हर घड़ी मेरी।
कल के विराधन तत्व का, बहु दुःख उठाया,
आराधना का यह समय अति पुण्य से पाया।
मिथ्या प्रपंचों में उलझ अब क्यों करूँ देरी,
निर्ग्रन्थता की भावना अब हो सफल मेरी,
बीते अहो आराधना में हर घड़ी मेरी।
जब से लिया चैतन्य के आनन्द का आस्वाद,
रमणीक भोग भी लगें मुझको सभी निःस्वाद।
ध्रुवधाम की ही ओर दौड़े परिणति मेरी,
निर्ग्रन्थता की भावना अब हो सफल मेरी,
बीते अहो आराधना में हर घड़ी मेरी।
पर मैं नहीं कर्ता ये मुझको भासता कुछ भी,
अधिकार में दीखे नहीं जग में अरे कुछ भी।
निज अंतरंग में ही दिखे रमता हमेंमेरी,
निर्ग्रन्थता की भावना अब हो सफल मेरी,
बीते अहो आराधना में हर घड़ी मेरी।
क्षण क्षण कषायों के प्रसंग ही बने जहाँ,
मोहीजनों के संग में सुख शांति हो कहाँ।
जग संगति से तो बढ़े दुःखमय भ्रमण फेरी,
निर्ग्रन्थता की भावना अब हो सफल मेरी,
बीते अहो आराधना में हर घड़ी मेरी।
अब तो रहूँ निर्जन वनों में गुरुजनों के संग,
शुद्धात्मा के ध्यान में हो परिणति असंग।
निज भाव में ही लीन हो मेटूँ जगत फेरी,
निर्ग्रन्थता की भावना अब हो सफल मेरी,
बीते अहो आराधना में हर घड़ी मेरी।
सुखों की अपेक्षा हो नहीं निद्र्वन्द्व हो जीवन,
संतुष्ट निज में ही रहूँ नित आप सम भगवन्।
हो आप सम निर्मुक्त मंगलमय दशा मेरी,
निर्ग्रन्थता की भावना अब हो सफल मेरी,
बीते अहो आराधना में हर घड़ी मेरी।
अब तो सहा जाता नहीं बोझा परिग्रह का,
विग्रह का मूल लगता है विकल्प विग्रह का।
स्वाधीन स्वाभाविक सहज हो परिणति मेरी,
निर्ग्रन्थता की भावना अब हो सफल मेरी,
बीते अहो आराधना में हर घड़ी मेरी।
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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