राजुल जी का बारह मासा

राजुल जी का बारह मासा


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राग मरहटी (झड़ी)

मैं लूँगी श्री अरिहंत, सिद्ध भगवंत, साधु सिद्धांत चार का शरणा, 

निर्नेम नेम बिन हमें जगत क्या करना।।

आषाढ़ मास (झड़ी)

सखि आया आषाढ़ घनघोर, मोर चहुँ ओर, मचा रहे शोर, इन्हें समझाओ।

मेरे प्रीतम की तुम पवन परीक्षा लाओ।

हैं कहाँ बसे भरतार, कहाँ गिरनार, महाव्रत धार, बसे किस बन में,

क्यों बाँध मोड़, दिया तोड़, क्या सोची मन में।

(झर्वटें)

जा जा रे पपैया जा रे, प्रीतम को दे समझा रे।

रही नौ भव संग तुम्हारे, क्यों छोड़ दई मंझधारे।।

(झड़ी)

क्यों बिना दोष, भये रोष, नहीं सन्तोष, यही अफसोस, बात नहीं बूझी।

दिये जादों छप्पन कोड़ि, छोड़ क्या सूझी।

मोहि राखो शरण मंझार, मेरे भर्तार, करो उद्धार, क्यों दे गए झुरना।

निर्नेम नेम बिन हमें जगत क्या करना।।

श्रावण मास (झड़ी)

सखि श्रावण संवर करे, समन्दर भरे, दिगम्बर धरे, सखि क्या करिये।

मेरे जी में ऐसी आवे, महाव्रत धरिये।

सब तजूं साज शृंगार, तजूं संसार, क्यों भव मंझार, में जी भरमाऊँ।

फिर पराधीन तिरिया का, जन्म न पाऊँ।।

(झर्वटें)

सब सुन लो राजदुलारी, दुःख पड़ गया हम पर भारी।

तुम तज दो प्रीति हमारी, कर लो संयम की तैयारी।।

(झड़ी)

अब आगया पावस काल, करो मत टाल, भरे सब ताल, महाजल बरसै।

बिन परसे श्री भगवन्त, मेरा जी तरसै।

मैंने तज दई तीज सलौन, पलट गई पौन, मेरा है कौन, मुझे जग तरना।

निर्नेम नेम बिन हमें जगत क्या करना।।

भादों मास (झड़ी)

सखि भादों भरे तलाब, मेरे चित चाव, करूँगी उछाह से सोलह कारण,

करूँ दस लक्षण के वरत, से पाप निवारण।। 

करूँ रोट तीज उपवास, पंचमी अकास, अष्टमी खास, निशल्य मनाऊँ।

तपकर सुगंध दशमी को कर्म जलाऊँ।।

(झर्वटें)

सखि दुद्धर रस की धारा, तजि चार प्रकार आहारा।

करूँ उग्र उग्र तप सारा, ज्यों होय मेरा निस्तारा।।

(झड़ी)

मैं रत्नत्रय व्रत धरूँ, चतुर्दशी करूँ, जगत से तिरूँ, करूँ पखवाड़ा।

मैं सबसे छिमाऊँ दोष, तजूँ सब राड़ा।।

मैं सातों तत्त्व विचार, कि गाऊँ मल्हार, तजूँ संसार, से फिर क्या करना।।

निर्नेम नेम बिन हमें जगत क्या करना।।

आसोज मास (झड़ी)

सखि आ गया मास कुवार, लो भूषण तार, 

मुझे गिरनार, की दे दो आज्ञा,मेरी पाणि पात्र, आहार की, है प्रतिज्ञा।

लो तार ये चूड़ामणि, रतन की कणी, 

सुनो सब जनी, खोल दो वैणी, मुझको अवश्य , परभात ही, दीक्षा लेनी।

(झर्वटें)

मेरे हेतु कमण्डल लावो, इक पीछी नई मंगावो।

मेरा मत न जी भरमावो, मत सूते कर्म जगावो।।

(झड़ी)

है जग में असाता कर्म, बड़ा बेशर्म, मोह के मर्म से, धर्म न सूझे।

इसके वश अपना, हित कल्याण, न बूझे।।

जहाँ मृग तृष्णा की धूर, है पानी दूर, भटकना भूर, कहाँ जल भरना।

निर्नेम नेम बिन हमें जगत क्या करना।।

कार्तिक मास (झड़ी)

सखि कार्तिक काल अनन्त, श्री अरहन्त, की सन्त महन्त, ने आज्ञा पाली।

धर योग, तजे भव भोग, की तृष्णा टाली।।

सजे चौदह गुण अस्थान, स्व पहचान, तजे मक्कान, अरु महल दीवाली।

लगा उन्हें मिष्ट जिनधर्म, अमावस काली।।

(झर्वटें)

उन केवल ज्ञान उपाया, जग का अन्धेर मिटाया।

जिसमें सब बिम्ब समाया, तन धन सब अथिर बताया।।

(झड़ी)

है अथिर जगत सम्बन्ध, अरी मतिमन्द, जगत में अन्ध, है धुन्ध पसारा।

मेरे प्रीतम ने सत् जान के, जगत बिसारा।।

मैं उनके चरण की चेरी, दे आज्ञा माँ मेरी, कटे भव फेरी, है इक दिन मरना।

निर्नेम नेम बिन हमें जगत क्या करना।।

 अगहन मास (झड़ी)

सखि अगहन ऐसी घड़ी, उदय में पड़ी, मैं रह गई खड़ी, दरस नहिं पाये।

मैंने सुकृत के दिन, बिरथा यों ही गँवाये।।

नहिं मिले हमारे पिया, न जप तप किया, न संयम लिया, अटक रही जग में।

पड़ी काल अनादि से पाप की बेड़ी पग में।। 

(झर्वटें)

मत भरियो मांग हमारी, मेरे शील को लागे गारी।

मत डारो अंजन प्यारी, मैं जोगन, तुम संसारी।।

(झड़ी)

हुए कन्त हमारे जती, मैं उनकी सती, पलट गई रती, धर्म नहिं खण्डू।

मैं अपने पिता के, वंश को, कैसे भण्डू।।

मैं मंडा शील सिंगार, अरी नथ तार, गये भर्तार, के संग आभरना।

निर्नेम नेम बिन हमें जगत क्या करना।।

पौष मास (झड़ी)

सखि लगा महीना पौह, ये माया मोह, जगत से द्रोह, के प्रीत करावै।

हरे ज्ञानावरणी ज्ञान, अदर्शन छावै।

पर द्रव्य से ममता हरे, तो पूरी परै, जु सम्बर करे, तो अन्तर टूटै।

अरु ऊँच नीच, कुल नाम की, संज्ञा छूटे।।

(झर्वटें)

क्यों ओछी उमर धरावै, जो सम्पति को बिलगावै।।

क्यों पराधीन दुःख पावै, जो संयम में चित लावै।।

(झड़ी)

सखी क्यों कहलावै दीन, क्यों हो छवि छीन, क्यों विद्या हीन मलीन कहावै।

 क्यों नारि नपुंसक जन्में, कर्म नचावै।।

वे तजे शील शृंगार, रुलै संसार, जिन्हें दरकार, नरक में पड़ना।

निर्नेम नेम बिन हमें जगत क्या करना।।

माघ मास (झड़ी)

सखि आ गया माघ बसन्त, हमारे कन्त, भये अरहन्त, वो केवल ज्ञानी।

उन महिमा, शील कुशील की, ऐसी बखानी।।

दिये सेठ सुदर्शन शूल, भई मखतूल, थे बरसे फूल, हुई जयवाणी।

वे मुक्ति गये और, भई कलंकित राणी।।

(झर्वटें)

कीचक ने मन ललचाया, द्रौपदी पर भाव धराया।

उसे भीम ने मार गिराया, यों करनी का फल पाया।।

(झड़ी)

फिर गहा दुर्योधन चीर, हुई दिलगीर, जुड़ गई भीर, लाज अति आवै।

गये पाण्डु जुए में हार, न पार बसावै।।

भये परगट शासन वीर, हरी सब पीर, बंधाई धीर, पकर लिये चरना। 

निर्नेम नेम बिन हमें जगत क्या करना।।

फागुन मास (झड़ी)

सखि आया फाग बड़ भाग, तो होरी त्याग, अठाई लाग के, मैनासुन्दर।

हरा श्रीपाल का कुष्ट, कठोर उदम्बर।।

दिया धवल सेठ ने डार, उदधि की धार, तो हो गए पार, वे उस ही क्षण में।

अरु जा परणी गुणमाल, न डूबे जल में।।

(झर्वटें)

मिली रैन मंजूषा प्यारी, जिन ध्वजा शील की धारी।

परी सेठ पे मार करारी, गया नर्क में पापाचारी।।

(झड़ी)

तुम लखो द्रौपदी सती, दोष नहिं रती, कहें दुर्मती, पद्म के बन्धन।

हुआ घातकी खण्ड ज़रूर, शील इस खण्डन।।

उन फूटे घड़े मंझार, दिया जल डाल, तो बे आधार, थमा जल झरना।

निर्नेम नेम बिन हमें जगत क्या करना।।

चैत्र मास (झड़ी)

सखि चैत्र में चिन्ता करे, न कारज सरे, शील से टरे, कर्म की रेखा।

मैंने शील से भील को, होता जगत गुरु देखा।।

सखि शील में सुलसां तिरी, सुतारा फिरी, सुलाखी करी, श्री रघुनन्दन।

अरु मिली शील परताप, पवन से अंजन।। 

(झर्वटें)

रावण ने कुमति उपाई, फिर गया विभीषण भाई।

छिन में जा लंक गमाई, कुछ भी नहीं पार बसाई।।

(झड़ी)

सीता सती अग्नि में पड़ी, तो उस ही घड़ी, वह शीतल पड़ी, चढ़ी जल धारा।

खिल गये कमल, भये गगन में, जय जय कारा।।

पद पूजे इन्द्र धरेन्द्र, भई शीतेन्द्र, श्री जैनेन्द्र, ने ऐसे वरना।

निर्नेम नेम बिन हमें जगत क्या करना।।

वैसाख मास (झड़ी)

सखि आई बैसाखी भेष, लई मैं देख, ये ऊरध रेख, पड़ी मेरे कर में।

मेरा हुआ जन्म यूं ही, उग्रसैन के घर में।।

नहिं लिखा करम में भोग, पड़ा है जोग, करो मत सोग, जाऊँ गिरनारी।

है मात पिता अरु भ्रात से, क्षमा हमारी।।

(झर्वटें)

मैं पुण्य प्रताप तुम्हारे, घर भोगे भोग अपारे।

जो विधि के अंक हमारे, नहिं टरें किसी के टारे।।

(झड़ी)

मेरी सखी सहेली वीर, न हो दिलगीर, धरो चितधीर, मैं क्षमा कराऊँ।

मैं कुल को तुम्हारे, कबहुँ न दाग लगाऊँ।।

वह ले आज्ञा उठ खड़ी, थी मंगल घड़ी, जा वन में पड़ी, सुगुरु के चरना।

निर्नेम नेम बिन हमें जगत क्या करना।।

जेठ मास (झड़ी)

अजी पड़े जेठ की धूप, खड़े सब भूप, वह कन्या रूप, सती बड़ भागन।

कर सिद्धन को प्रणाम, किया जग त्यागन।।

अजी त्यागे सब संसार, चूड़ियाँ तार, कमण्डलु धार, कै लई पिछौटी।

अरु पहर के साड़ी श्वेत, उपाड़ी चोटी।। 

(झर्वटें)

उन महा उग्र तप कीना, फिर अच्युतेन्द्र पद लीना।

है धन्य उन्हीं का जीना, नहीं विषयन में चित दीना।।

(झड़ी)

अजी त्रियावेद मिट गया, पाप कट गया, धरम मिल गया, बढ़ा पुरुषारथ।

करे धर्म अरथ फल भोग, रुचे परमारथ।।

वो स्वर्ग सम्पदा भुक्ति, जायेगी मुक्ति, जैन की उक्ति, में निश्चय धरना। 

निर्नेम नेम बिन हमें जगत क्या करना।।

(झड़ी)

जो पढ़े इसे नर नारि, बढ़े परिवार, सबै संसार, में महिमा पावें।

सुन सतियन शील कथान, विघ्न मिट जावें।।

 नहिं रहे सुहागिन दुःखी, होंय सब सुखी, मिटें बेरुखी, होय सब आदर।

वे होय जगत में, महा सतियों की, चादर।। 

(झर्वटें)

मैं मानुष कुल में आया, अरु जती यती कहलाया।

है कर्म उदय की माया, बिन संयम जन्म गंवाया।।

(झड़ी)

(मास, संवत्, कुल वंश, नाम)

है दिल्ली नगर सुवास, वतन है खास, फाल्गुन मास, अठाईं आठै।

हों उनके नित कल्याण, छपाकर बाँटें।।

अजी विक्रम अब्द उनीस, धार कै शीश, पै श्री जगदीश, का ले लो शरणा।

कहै दास नैनसुख, दोष पै दृष्टि न धरना।। 

मैं लूँगी श्री अरिहंत, सिद्ध भगवंत, साधु सिद्धांत चार का शरणा, 

निर्नेम नेम बिन हमें जगत क्या करना।।

 ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा - सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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