रोम-रोम से नेमिकुंवर

 रोम-रोम से नेमिकुंवर 


रोम-रोम से नेमिकुंवर के, उपशम रस की धारा, 

राग द्वेष सब तुमने त्यागे, वेश दिगम्बर धारा। -2

ब्याह करन को आए, संग बाराती लाए, 

पशुओं को बंधन में देखा, दयासिंधु लहराए, 

धिक्-धिक् जग की स्वारथ वृत्ति, कहीं न सुख लखाया,

रोम-रोम से नेमिकुंवर के........ 

राजुल अति अकुलाए, नौ भव की याद दिलाए,

नेमि कहे जग में न किसी का, कोई कभी हो पाए, 

राग रूप अंगारों द्वारा, जलता है जग सारा।

रोम-रोम से नेमिकुंवर के........ 

नौ भव का सुमिरन कर नेमि, आतम तत्व विचारे, 

शाश्वत सुख चैतन्य राज की, महिमा चित्त में धारे, 

लहराता वैराग्य सिंधु अब, भाये भावना बारह।

रोम-रोम से नेमिकुंवर के........ 

राजुल के प्रति राग नशा है, मुक्ति वधु को ब्याहे, 

नग्न दिगम्बर दीक्षा लेकर, आतम ध्यान लगाते, 

भव बंधन का नाश करेंगे, पावे सुख अपारा।

रोम-रोम से नेमिकुंवर के........ 

नेमि कुंवर गिरनारी चले, मुक्ति वधु को ब्याहे,

रंग राग से भिन्न निराले, शुद्धात्म को चाहे,

भाये भावना बारह, समझे जगत असारा।

रोम-रोम से नेमिकुंवर के........ 

शुद्धात्म चिंतन करे, वेश दिगंबर धारे,

निज चैतन्य सुधारस पीते, पीते नहीं अघावे,

पंचमहाव्रत अरु समिति, पंचेन्द्रिय जय धारा।

रोम-रोम से नेमिकुंवर के........ 

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा - सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

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