समाधि भक्ति

समाधि भक्ति

 

तेरी छत्रछाया भगवन् ! मेरे शिर पर हो। 

मेरा अंतिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो।।

अहो अकिंचन मैं हूं मेरा, इस जग में क्या है ?

मेरे गुण तो मेरे भीतर, बाहर में क्या है।।

यह रहस्य परमात्म कला का, पूर्ण उजागर हो।

मेरा अंतिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो।।

तेरी छत्रछाया भगवन्...

मैं पवित्र हूं, मैं प्रसन्न हूं, पूर्ण स्वस्थ हूं मैं।

ज्ञानवान हूं ध्यानवान हूं, आत्मस्थ हूं मैं।।

आत्मक्रिया चिंतन-मंथन में, निज मन तत्पर हो।

मेरा अंतिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो।।

तेरी छत्रछाया भगवन्....

बिन भोगे ही भव भोगों को, त्यागा धन्य वही।

भोग बुरे लख जिनने त्यागे, वे सब धन्य मही।।

मोह रहित जप, ज्ञान सहित तप, त्याग निरन्तर हो।

मेरा अंतिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो।।

तेरी छत्रछाया भगवन्....

भव-भव में मुनिराज बनूं मैं, यही भावना है।

भव-भव में जिनधर्म गहूं मैं, यही भावना है।।

बाल ब्रह्मचारी मुनि होऊं, रत्नत्रय वर दो।

मेरा अंतिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो।।

तेरी छत्रछाया भगवन्....

मैं तप धारुं, मैं श्रुत धारुं, सम्यक् व्रत धारुं।

धर्मध्यान में रत होकर के, शुक्ल ध्यान धारूं।।

शुक्लध्यान में कर्म जलाऊं, जाना शिवपुर हो।

मेरा अंतिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो।।

तेरी छत्रछाया भगवन्...

मैं कैसा हूं केवलज्ञानी ! जैसा तुम जानो।

मैं वैसा हूं अंतर्यामी ! जैसा तुम मानो।।

वीतराग सर्वज्ञ हितैषी, तुम अविनश्वर हो।

मेरा अंतिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो।।

तेरी छत्रछाया भगवन्....

उत्तम त्यागी वे हैं जिनने, अर्जन नहीं किया।

मध्यम त्यागी वे हैं जिनने, अर्जित त्याग किया।।

जघन्य त्यागी सौंप संपदा, संत दिगम्बर हो।

मेरा अंतिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो।।

तेरी छत्रछाया भगवन्....

भव अनंत के भ्रमण चक्र को, आज रोकता हूं।

देव शास्त्र गुरुवर के चरणों,माथ टेकता हूं।।

अब निर्दोष तपस्या का फल, सिद्ध परम पद हो।

मेरा अंतिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो।।

तेरी छत्रछाया भगवन्...

ना जाने कब तेरे दर से, चलना हो जाए।

किस विधि फिर से दर्शन पाना, दुर्लभ हो जाए।।

उत्तमार्ध प्रतिकर्म करूं मैं, सर्व दोष हर लो।

मेरा अंतिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो।।

तेरी छत्रछाया भगवन्...

चन्द्रप्रभ भगवान हमारे, हमको चारित दो।

चरण कमल की करुं वंदना, मन पवित्र कर दो।।

श्री सम्मेद शिखर का दर्शन, हमको फिर-फिर हो।

मेरा अंतिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो।।

तेरी छत्रछाया भगवन्...

नंदीश्वर के दर्शन पाऊं, पंचमेरू जाऊं।

श्री विदेह में तीर्थंकर के, समवशरण जाऊं।।

उड़ जाऊं निर्वाण लक्ष्य तक, प्रभुवर वह पर दो।

मेरा अंतिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो।।

तेरी छत्रछाया भगवन्...

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा - सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

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