तीन भुवन के स्वामी मेरे
आनंद उर न समाए प्रभुवर, दर्शन पाया तेरा - २
वीतराग सर्वज्ञ प्रभु हम, सुनी नहीं जिनवाणी,
कर्ता धर्ता तुमको माना, कर बैठा नादानी, - २
तुम तो स्वामी गुरु जगत के, दूर हुआ तम मेरा,
आनंद उर न समाए --------
२) कण कण है स्वाधीन जगत का, तुमने प्रभु बतलाया,
निज पर के कर्तापन का भ्रम, जिनवर दूर भगाया, - २
सर्व विपद को दूर करे यह, जिनवर दर्शन तेरा,
आनंद उर न समाए ---------
३) तन मन कर्म रंग रागादिक, देते भिन्न दिखाई,
सम्यक ज्ञान कला उर जागी, निज प्रभुता मैं पाई - २
शुद्ध स्वरूप अगोचर तेरा, सफल हुआ भव मेरा
आनंद उर न समाए--------
४) सम्यक हुई प्रतीति प्रभुवर, तुम सम ही प्रभु मैं हूं,
हूँ गुण धाम सहज अभिराम, आनंद धाम सदा हूँ - २
निज में ही ध्याऊं मैं तुमको, अभिनंदन है तेरा ,
आनंद उर न समाए --------।
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा - सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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