वीतरागी देव तुम्हारे

 वीतरागी देव तुम्हारे


(धुनः कसमें वादे प्यार वफा सब----)


वीतरागी देव तुम्हारे, जैसा जग में देव कहाँ।

मार्ग बताया है जो जग को, कह न सके कोई और यहाँ।।

वीतरागी देव तुम्हारे-----


हैं सब द्रव्य स्वतन्त्र जगत में, कोई न किसी का काम करे।

अपने अपने स्व चतुष्टय में, सभी द्रव्य विश्राम करें।

अपनी अपनी..... -2 

अपनी अपनी सहज गुफा में, रहते हैं पर से मौन यहाँ।।

वीतरागी देव तुम्हारे-----


भाव शुभाशुभ का भी करता, बनता जो दीवाना है।

ज्ञायक भाव शुभाशुभ से भी, भिन्न न उसने जाना है।

अपने से......-2 

अपने से अनजान, तुझे भगवान बताते, देव यहाँ।।

वीतरागी देव तुम्हारे-----


पुण्य भाव भी ‘पर’ आश्रित हैं, उससे धर्म नहीं होता।

ज्ञान भावमय निज परिणति से, बन्धन कर्म नहीं होता।

निज आश्रय से.....-2 

निज आश्रय से ही मुक्ति है, कहते हैं जिनदेव यहाँ।।

वीतरागी देव तुम्हारे-----

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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