ये जग है इक मेला

ये जग है इक मेला


धुन - चल उड़ जा रे पंछी

ये जग है इक मेला, यहाँ से इक दिन सबको जाना।

तेरा सारा कुटुंब कबीला, साथ न तेरा देंगे,

मरते ही तेरी सारी कमाई, झट से बाँट ये लेंगे,

जिनको तू कहता है अपना, वे तुझको भूलेंगे,

इस दुनिया की रीत यही है, इसी को कहते ज़माना........

तेरे अच्छे कर्म ही भैया, संग तेरे जाएंगे,

घरवाले और जगवाले तो मरघट तक जाएंगे,

तेरी अस्थि तक वो भैया, घर में न लाएंगे,

इतना ही इनका रिश्ता-नाता, इतना ही साथ निभाना........

कितने ही राजा महाराजा, इस दुनिया में आए,

लेकिन मौत के आगे अपना, ज़ोर चला न पाए,

मुट्ठी बाँध के आने वाले, मुट्ठी खोल के जाएं,

चाहे कोई रंक हो चाहे, हो कोई महाराजा.......

जान बूझ कर आँख मूँद कर, क्यों करता नादानी,

बचपन तेरा बीत चुका और, ढलती जाए जवानी,

वक्त है अब भी जाग जा भैया, मत कर ये मनमानी,

जप ले प्रभु का नाम तू बंदे, मत बन तू बेगाना........

सर्वेषां भक्तिः भवतु।

सर्वेषां शान्तिः भवतु।

सर्वेषां पूर्णम् भवतु।

 ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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