अँखियों के झरोखों से
अँखियों के झरोखों से
अँखियों के झरोखों से, देखा मैंने जो सामने।
गुरु दूर नजर आए, बड़ी दूर नजर आए ॥
बंद करके झरोखों को, जरा बैठा मैं ध्यान में।
मन में प्रभु मुस्काए, मन में प्रभु मुस्काए ॥
अँखियों के झरोखों से ...................................
प्रभु भक्ति में प्रभु ध्यान में, मन खोने लगा है।
संसार के दुःख जाल में, हंस-रोने लगा है ॥
जिनवर के भरोसे पर, सब बैठा हूँ भूलकर,
यूँ ही उम्र गुज़र जाए, ले के नाम गुज़र जाए ॥
अँखियों के झरोखों से ...................................
मैं जब से अपने गुरु के रंगों में रंगा हूँ।
सोई हुई मेरी आशा, मैं कहता हूँ जगी हैं।
अपनी मुक्ति का ये सपना, कहीं कोई न तोड़ दे।
मन सोच के घबराए, यही सोच के घबराए ॥
अँखियों के झरोखों से ...................................
माना इस काल में, मुक्ति तो नहीं है।
पर हार कर चुप बैठना, युक्ति तो नहीं है।
मेरी मुक्ति का ये विरवा, मैं जाऊँगा रोप के।
संभव है किसी भव में, मेरी मुक्ति हो जाए ॥
अँखियों के झरोखों से ...................................
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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