तेरे दर को
तेरे दर को
तेरे दर को छोड़ कर किस दर जाऊँ मैं।
</ style="text-align: center;"> सुनता मेरी कौन है, किसे सुनाऊँ मैं॥जब से नाम भुलाया तेरा, लाखों कष्ट उठाये हैं।
न जाने इस जीवन के अन्दर कितने पाप कमाए हैं॥
हूँ शर्मिन्दा आपसे, क्या बतलाऊँ मैं......
मेरे दुष्ट कर्म ही मुझको, तुमसे न मिलने देते हैं।
जब मैं चाहूँ दर्शन पाना, रोक तभी वे लेते हैं॥
छींटा दो प्रभु ज्ञान का, शरण में आऊँ मैं......
मोह मिथ्या में रहकर स्वामी, नाम तिहारा भूला था।
जिसको समझा था सुख मैंने, दुःख का गाोरख धन्धा था॥
मोह माया को छोड़ कर शरण खड़ा हूँ मैं.......
बीत चुकी सो बीत चुकी अब, शरण तिहारी आया हूँ ।
दर्शन भिक्षा पाने को, दो नयन कटोरे लाया हूँ॥
मन में अपने ज्ञान का दीप जलाऊँ मैं....
सुनता मेरी कौन है किसे सुनाऊँ मैं॥ तेरे दर को.....
ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा - सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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