तेरे दर को

 तेरे दर को

 

 तेरे दर को छोड़ कर किस दर जाऊँ मैं।

</ style="text-align: center;">  सुनता मेरी कौन है, किसे सुनाऊँ मैं॥
जब से नाम भुलाया तेरा, लाखों कष्ट उठाये हैं।
न जाने इस जीवन के अन्दर कितने पाप कमाए हैं॥
हूँ शर्मिन्दा आपसे, क्या बतलाऊँ मैं......
मेरे दुष्ट कर्म ही मुझको, तुमसे न मिलने देते हैं।
जब मैं चाहूँ दर्शन पाना, रोक तभी वे लेते हैं॥
छींटा दो प्रभु ज्ञान का, शरण में आऊँ मैं......
मोह मिथ्या में रहकर स्वामी, नाम तिहारा भूला था।
जिसको समझा था सुख मैंने, दुःख का गाोरख धन्धा था॥
मोह माया को छोड़ कर शरण खड़ा हूँ मैं.......
बीत चुकी सो बीत चुकी अब, शरण तिहारी आया हूँ ।
दर्शन भिक्षा पाने को, दो नयन कटोरे लाया हूँ॥
मन में अपने ज्ञान का दीप जलाऊँ मैं....
सुनता मेरी कौन है किसे सुनाऊँ मैं॥ तेरे दर को.....
ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा - सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें।

धन्यवाद

Comments

Popular posts from this blog

बालक और राजा का धैर्य

सती कुसुम श्री (भाग - 11)

चौबोली रानी (भाग - 24)

सती नर्मदा सुंदरी की कहानी (भाग - 2)

हम अपने बारे में दूसरे व्यक्ति की नैगेटिव सोच को पोजिटिव सोच में कैसे बदल सकते हैं?

मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 18 अक्टूबर, 2022 के प्रवचन का सारांश

जैन धर्म के 24 तीर्थंकर व उनके चिह्न

बारह भावना (1 - अथिर भावना)

रानी पद्मावती की कहानी (भाग - 4)

चौबोली रानी (भाग - 28)