कर्मों का फल

कर्मों का फल


इस जन्म में न मिले, परभव में मिलता है।

अपने-अपने कर्मों का फल सब को मिलता है।

हैं वो भाई दोनों ही, दुनिया के मेले में,

एक दर-दर का भिखारी, दूजा महलों में।

एक से पैदा हुए, नहीं भाग्य मिलता है, अपने-अपने कर्मों का........।

एक है पत्थर की मूरत, पूजा करते हैं।

दूजा फ़र्शों में जड़ा, जिस पर हम चलते हैं।

पर्वत और चट्टान से, इक साथ निकलता है, अपने-अपने कर्मों का........।

सीप दो हैं, एक की किस्मत निराली है,

एक में मोती भरा और दूजा खाली है,

एक ही सागर में इनको जन्म मिलता है, अपने-अपने कर्मों का........।

फूल इक मंदिर में प्रभु के चरणों में चढ़ता है,

दूसरा गिर कर पड़ा है, ख़ाक में मिलता है,

फ़ूल वह तो एक ही चमन में खिलता है। अपने-अपने कर्मों का........।

जैसी करनी वैसी भरनी, कर्म शुभ करना,

मोल ना लगता , ख़ज़ाना पुण्य का भरना, 

नेकियां करने से ही तो स्वर्ग मिलता है, अपने-अपने कर्मों का........।

'कर्म का फल' का अर्थ है— हमारे द्वारा किए गए कार्यों (सोच, वाणी और व्यवहार) का निश्चित परिणाम। प्रकृति का अटल नियम है कि जैसा बोओगे, वैसा ही काटोगे। जो भी अनुभव हमें आज मिल रहे हैं, वे अतीत के कर्मों का ही परिणाम हैं।

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा - सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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