कर्मों के बंधन तोड़ो (लघु नाटिका)
कर्मों के बंधन तोड़ो (लघु नाटिका)
कक्षा के कमरे का दृश्य - 1 ब्लैक बोर्ड, 1 कुर्सी, 1 मेज, दरी, मेज पर घड़ी, पेन, किताब, चॉक, डस्टर।
पात्र - गुरुजी, ज्ञानचन्द, दर्शन कुमार, मोहिनी (लड़की), अंतरा (लड़की) वेदना (लड़की), आयुष, नामवर व गोत्र कुमार
सूत्रधार —
कर्मों के बंधन तोड़ो
जिनवर से नाता जोड़ो।
धर्म प्रेमियों! आपस में प्रेम करो, धर्म प्रेमियों!
आज हम आपको एक प्रेणादायक लघु नाटिका दिखाने जा रहे हैं - *कर्मों के बंधन तोड़ो*
आइए हम आपको अष्ट कर्मों का लेखा-जोखा समझाते हैं और पात्रों का परिचय देते हैं।
(पात्र परिचय — एक-एक पात्र मंच पर आता है और हाथ जोड़ता हुआ दूसरी ओर चला जाता है।)
ये हैं -
गुरु जी — सफेद धोती, कुर्ता, टोपी हाथ में रजिस्टर लेकर आता है
ज्ञानचन्द — हाथ में स्कूल बैग, ब्राउन पैंट, सफेद कमीज़ पहनकर आता है
दर्शनकुमार — हाथ में स्कूल बैग, डार्क ब्राउन पैंट, सफेद कमीज़ पहनकर आता है
मोहिनी — हाथ में स्कूल बैग, सफेद सलवार -चमकदार गुलाबी कमीज़ पहनकर आती है
अंतरा — हाथ में स्कूल बैग, सफेद सलवार - डार्क ब्राउन कमीज़ पहनकर आती है
वेदना — हाथ में स्कूल बैग, सफेद सलवार - हलकी नीली कमीज़ पहनकर आती है
आयुष — हाथ में स्कूल बैग, सफेद पैंट, सफेद कमीज़ पहनकर आता है
नामबर — हाथ में स्कूल बैग, नीली पैंट, सफेद कमीज़ पहनकर आता है
गोत्रकुमार — हाथ में स्कूल बैग, काली पैंट, सफेद कमीज़ पहनकर आता है
जीवन कुमार — हाथ में स्कूल बैग, ग्रे पैंट, सफेद कमीज़ पहनकर आता है,
आइये! आइये हम भी चलते हैं गुरुजी की कक्षा में .....
(सूत्रधार मंच के पृष्ठ भाग में चला जाता है और गुरुजी हाथ में रजिस्टर लेकर धीरे-धीरे मंच पर आते हैं, और मेज पर पड़े सामान को यथास्थान रखने का उपक्रम करते हैं, अपने हाथ पर बंधी घड़ी में टाइम देखते हैं। तभी एक लड़का रोनी-सी सूरत लेकर अन्दर आता है।)
लड़का - गुरुजी, मैं अन्दर आ सकता हूँ क्या?
गुरुजी - अरे! जीवनकुमार! आओ, बहुत जल्दी आ गये। अभी तो विद्यालय का समय भी आरम्भ नहीं हुआ, और यह रोनी सूरत क्यों बनाई हुई है? क्या हुआ है?
जीवन कुमार - प्रणाम गुरुजी। गुरुजी, मेरा मन कल से बहुत व्याकुल हो रहा है।
गुरुजी - (हाथ उठा कर) आशीर्वाद, बेटा! सदा ज्ञान वृद्वि हो।! तुम क्यों व्याकुल हो? मुझे बताओ, शायद मैं तुम्हारी कोई सहायता कर सकूँ।
जीवन कुमार - गुरुजी! कल आपने कक्षा में पढ़ाया था न कि यह जीव संसार में अकेला आया है और अकेला ही जाएगा। मैं जब घर गया, तो यही सोचता रहा कि मेरे माता-पिता की मृत्यु हो चुकी है, भाई-बहन कोई है नहीं, कहीं वह जीव मैं ही तो नहीं हूँ, जो अकेला आता है और अकेला ही जाता है। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा, इसी लिये मैंने सोचा कि आज कक्षा आरम्भ होने से पहले जाऊँगा और अकेले में आपसे इस का उत्तर पूछूँगा।
गुरुजी - (मुस्कुराते हुए) बैठो, जीवनकुमार बैठो! तुम व्यर्थ ही परेशान हो रहे हो। इस बात का यह अर्थ नहीं है कि तुम संसार में अकेले हो। देखो, इस अकेलेपन का एक बहुत गहरा आध्यात्मिक और व्यावहारिक अर्थ है।
जीवन कुमार - वह क्या गुरुजी? कृपया मुझे विस्तार से समझाएं।
गुरुजी - (पुस्तक को खोलते हुए) देखो! इस पुस्तक में भी लिखा है कि जब मनुष्य जन्म लेता है, तो वह अपनी यात्रा अकेले ही शुरू करता है। माता-पिता, भाई-बहन, मित्र - ये सब हमें इस संसार के सफर में मिलते हैं। वे हमारे सहयात्री (co-travelers) हैं, लेकिन हमारा कर्म, हमारा भाग्य, और हमारी आत्मा की यात्रा पूरी तरह हमारी अपनी होती है। एक इन्द्रिय से लेकर पांच इन्द्रिय जीवों तक, सभी जीव अपने-अपने कर्मोदय के कारण शरीर धारण करते हैं, सुख-दुःख का वेदन अर्थात् अनुभव करते हैं और आयुकर्म समाप्त होने पर इस नश्वर देह का परिवर्तन करके दूसरी गति में दूसरा शरीर धारण कर लेते हैं। जीव का कभी मरण नहीं होता। यह तो भ्रांति है कि हम शरीर के मरण को अपना मरण और शरीर के जन्म को अपना जन्म मान लेते हैं।
जीवनकुमार - (ध्यान से सुनते हुए) अच्छा! तो इसका मतलब यह है कि मुझे अकेले नहीं रहना है, सहयात्रियों के साथ रहना है।
गुरुजी - बिल्कुल ! इस का अर्थ यही है कि तुम्हें अपने जीवन की जिम्मेदारी खुद लेनी होगी। जब तुम कोई अच्छा या बुरा कर्म करते हो, तो उसका फल केवल तुम्हें ही भुगतना पड़ता है, तुम्हारे माता-पिता या मित्र को नहीं। इसी प्रकार, जब विपत्ति आती है, तो धैर्य और आंतरिक शक्ति तुम्हें अपने भीतर से ही ढूंढनी पड़ती है।
जीवन कुमार - अच्छा, गुरुजी! यह कर्मोदय का क्या अर्थ है?
गुरुजी - हां! हम जो कर्म अपने जीवनकाल में करते हैं, उनका, पुण्य कर्म या पाप कर्म के रूप में, हमारी आत्मा के साथ बंध हो जाता है, उन्हीं के उदय से हमें अच्छी या बुरी गति में जन्म मिलता है।
जीवन कुमार - गुरुजी! मुझे कर्म बंध के बारे में बताओ न!
गुरुजी - हां! हां! अभी सबको आने दो, आज की कक्षा के अध्ययन का विषय ही यह है।
(तभी कुछ बच्चों के आने की आवाज़ आती है, जो एक दूसरे से बात करते हुए हाथ में बैग लेकर आते हैं।)
बच्चे - (समवेत स्वर में) गुरुजी! क्या हम अंदर आ सकते हैं?
गुरुजी - हां! हां! आओ बच्चों।
बच्चे - गुरुजी! प्रणाम।
गुरुजी - (हाथ उठा कर) आशीर्वाद! सदा ज्ञान वृद्वि हो।!
(सब बच्चे दरी पर लाइन लगा कर बैठ जाते हैं।)
(गुरुजी रजिस्टर खोलकर सबकी हाजिरी लगाते हैं।)
गुरुजी - चलो! कक्षा आरम्भ करने से पहिले तुम्हारी उपस्थिति दर्ज कर लें।
ज्ञानचन्द
ज्ञानचन्द - उपस्थित हूँ श्रीमान्।
गुरुजी - दर्शन कुमार
दर्शन कुमार - उपस्थित हूँ श्रीमान्।
गुरुजी - मोहिनी
मोहिनी - उपस्थित हूँ श्रीमान् ।
गुरुजी - अंतरा
अंतरा - उपस्थित हूँ श्रीमान् ।
गुरुजी - वेदना
वेदना - उपस्थित हूँ श्रीमान् ।
गुरुजी - आयुष
आयुष - उपस्थित हूँ श्रीमान्।
गुरुजी - नामवर
नामवर - उपस्थित हूँ श्रीमान्।
गुरुजी - गोत्र कुमार
गोत्र कुमार - उपस्थित हूँ श्रीमान्।
(स्वगत) - हां, जीवन की उपस्थिति तो मैंने पहले ही लगा ली है।
(गुरुजी रजिस्टर बंद करते हैं।)
गुरुजी - हां तो बच्चों! हम आज का अध्याय आरम्भ करते हैं, आज के पाठ का विषय है -
(पुस्तक को खोलते हुए साथ-साथ ब्लैक बोर्ड पर भी लिखते जाते हैं) अष्टकर्म कौन-से हैं और उनका बंध कैसे होता है? ये 8 कर्म हैं -
(बच्चे भी अपनी कॉपी पर नोट करते हैं, और पुस्तक भी निकालते हैं, जीवन के पास कॉपी है, पर पुस्तक नहीं है।)
जीवन - (अपने पास बैठे ज्ञानचन्द से कहता है ) मुझे भी अपनी पुस्तक में से पढ़ने दो न!
ज्ञानचन्द - अरे! मैं क्यों दिखाऊं अपनी पुस्तक। तुम अपनी क्यों नहीं लाए, बोर्ड पर लिखा तो है, वहीं से देख लो।
(गुरुजी बातों की आवाज सुन कर पीछे मुड़ते हैं और जीवन कुमार से पूछते हैं)
गुरुजी - क्यों? क्या हो गया? तुम्हारी पुस्तक कहां है? चुपचाप कॉपी पर क्यों नहीं लिख रहे हो?
जीवन कुमार - गुरुजी! आज मैं जल्दी विद्यालय आने के चक्कर में अपनी पुस्तक घर में ही भूल आया, मैं अकेला रहता हूँ न! घर का काम भी करना पड़ता है, तो कोई याद दिलाने वाला भी नहीं है।
गुरु जी - (ज्ञानचन्द से) बेटा ज्ञानचन्द! यदि आज इसके पास पुस्तक नहीं है, तो तुम अपनी पुस्तक में से पढ़ने दो, वरना नुकसान तो तुम्हारा भी होगा न!
ज्ञानचन्द - मेरा नुकसान! कैसे, गुरुजी!
गुरुजी - हां! सभी ध्यान से सुनो। आज हम अष्टकर्मों के विषय में पढ़ने जा रहे हैं। अष्टकर्म यानि ऐसे 8 कर्म, जो जीव कोे निरन्तर बंधन में डालते रहते हैं। इनमें से आयुकर्म को छोड़कर शेष 7 कर्म तो प्रतिदिन, प्रतिपल बंधते रहते हैं।
(ब्लैक बोर्ड पर लिखते हुए) इनमें से पहला कर्म है -
1. ज्ञानावरणीय कर्म।
क्या है?
सभी बच्चे - ज्ञानावरणीय कर्म।
गुरुजी - अब इस समय देखा जाए, तो जीवन का ज्ञानावरणीय कर्म का उदय चल रहा है, जिसके कारण वह अपनी पुस्तक नहीं लाया और ज्ञानचन्द उसको अपनी पुस्तक से पढ़ने नहीं दे रहा। इसमें जीवन तो कर्म के उदय का फल भोग ही रहा है और क्या तुम जानते हो कि ज्ञानचन्द को कौन सा कर्म बंध रहा है?
सभी बच्चे - नहीं गुरुजी! हम नहीं जानते, कृपया बताओ न।
गुरुजी - ज्ञानचन्द! तुम अपनी पुस्तक इसे देखने से रोकते हो, तो तुम्हारे भीतर ईर्ष्या या प्रमाद का भाव आ रहा है, जिससे तुम्हारे ज्ञान के ऊपर आवरण डालने वाले नवीन कर्म का तीव्र बंध हो रहा है।
ज्ञानचन्द - (डरते हुए) गुरुजी! यह तो बड़ा अनर्थ हो जायेगा। मैंने तो सोचा भी नहीं था कि केवल पुस्तक न दिखाने से मेरे ज्ञान का नुकसान हो जायेगा।
गुरुजी - कभी जीवन ने भी किसी को अपनी पुस्तक से पढ़ने नहीं दिया होगा, तो उसे आज यह दिन देखना पड़ा। यदि ज्ञानचन्द आज अपनी पुस्तक से पढ़ने नहीं देगा, तो इसे भी ज्ञानावरणीय कर्म का बंध होगा और कभी न कभी यही स्थिति उसके साथ भी घटित होगी।
ज्ञानचन्द - सच में गुरुजी! फिर तो आज से मैं किसी के ज्ञान में बाधा नहीं पहुँचाऊँगा और सभी को अपना ज्ञान दूंगा। लो जीवन कुमार! तुम भी मेरी पुस्तक में से देखो और जो गुरुजी लिखवा रहे हैं, उसे लिखो।
गुरुजी - (मुस्कुराते हुए) बहुत अच्छे! बच्चों! यही मैं समझाना चाहता था। ज्ञान बांटने से बढ़ता है और छुपाने या दूसरों को रोकने से स्वयं का ज्ञान भी मंद हो जाता है।
ज्ञानचन्द - गुरुजी! इसका अर्थ यह हुआ कि जब हम किसी को पढ़ने से रोकते हैं या किसी की पढ़ाई में बाधा डालते हैं, तब ज्ञानावरणीय कर्म का बंध होता है?
गुरुजी - बिल्कुल सही समझे, ज्ञानचन्द!
(बोर्ड पर लिखते हुए)
(पुस्तक को खोलते हुए) 1. ज्ञानावरणीय कर्म - जो ज्ञान को आवरण से ढक दे अर्थात् यह ज्ञान को ढकने वाला कर्म है, जिसके उदय से हमें केवल ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती।
(अब जीवन अपने दूसरी ओर बैठे दर्शनकुमार की कॉपी में देखने लगता है)
दर्शनकुमार - क्यों भाई! मेरी कॉपी में क्या देखते हो? बोर्ड से देखकर लिखो न! (ऐसा कहते हुए वह अपनी कॉपी पर हाथ रख लेता है)
गुरुजी - (पीछे मुड़कर देखते हुए) अरे दर्शन! यह क्या शोर कर रहे हो?
दर्शन - गुरुजी! देखो न! जीवन बोर्ड से पढ़कर तो लिख नहीं रहा, मेरी कॉपी से नकल कर रहा है, मैं तो नहीं दिखाता इसे।
गुरु - क्यों भई जीवन! क्या यह सच बोल रहा है?
जीवन - हां गुरु जी! मेरी दूर की नजर कमजोर है, पास का तो मैं साफ देख लेता हूँ, लेकिन बोर्ड पर लिखा हुआ मुझे ठीक से दिखाई नहीं देता। इसलिए इसकी कॉपी में देख रहा था।
गुरु- दर्शन! तुम भी वही गलती कर रहे हो जो ज्ञानचन्द ने की थी।
यह दूसरा कर्म कहलाता है - दर्शनावरणीय।
इसके उदय से जीवन की दूरदृष्टि बाधित हो गई है और यदि तुम इसे अपनी काॅपी में से देखकर नहीं लिखने दोगे, तो तुम्हें भी दर्शनावरणीय कर्म का बंध हो जायेगा और यही स्थिति तुम्हारी भी होगी।
दर्शन - अच्छा गुरुजी! फिर तो मैं आज से कभी किसी के देखने में बाधा नहीं बनूँगा।
गुरुजी - हां! जब हम मंदिर जी में भगवान के दर्शन करते हैं, तो कभी किसी के आगे खड़े होकर उसके दर्शन में बाधा नहीं बनना चाहिए। तो यह दूसरा कर्म क्या है?
सभी बच्चे - दर्शनावरणीय कर्म
गुरुजी - (बोर्ड पर लिखते हुए)
(पुस्तक को खोलते हुए) 2. दर्शनावरणीय कर्म - जो दर्शन पर आवरण डाल दे। यह दर्शन अर्थात् आत्मा की पहचान को ढकने वाला कर्म है।
(सभी बच्चे अपनी कॉपी पर लिखते हैं)
(तभी वेदना की आवाज़ आती है।)
वेदना- हाय!...... हाय!......
(वह हाय!...... हाय!......कहते हुए खड़ी हो जाती है।
(सभी उसकी तरफ देखते हैं)
गुरुजी - क्या हुआ वेदना बेटी?
वेदना - गुरुजी! पता नहीं, मेरे पांव पर कोई कीड़ा काट गया है, शायद।
गुरुजी - कोई बात नहीं, उसे हल्के हाथ से परे हटा दो, शायद तुमने कभी किसी को पीड़ा दी होगी, तभी तुम्हारे शरीर को पीड़ा सहन करनी पड़ी। जानते हो, यह भी एक कर्म है, जो प्रतिपल आत्मा को बंधन में डालता है, इसका नाम है - वेदनीय कर्म।
(वेदना कीड़े को हाथ से परे करने का अभिनय करती है।)
गुरुजी - पर बच्चों! यह वेदनीय कर्म दो प्रकार का होता है।
वेदना - वे कौन-कौन से हैं, गुरुजी !
गुरुजी - वे हैं - साता वेदनीय कर्म, असाता वेदनीय कर्म।
जब हमें सुख का वेदन अर्थात् अनुभव होता है, तो साता वेदनीय कर्म का उदय होता है और दुःख का वेदन होता है, तो असाता वेदनीय कर्म का उदय होता है।
वेदना - गुरुजी! इनसे बचने का भी कोई उपाय है क्या?
गुरुजी - इससे बचने का तो एक ही उपाय है -
होकर सुख में मग्न न फूलूँ, दुःख में कभी न घबराऊँ।
(बोर्ड पर लिखते हुए)
(पुस्तक को खोलते हुए) ३. वेदनीय कर्म - यह कर्म हमें सुख-दुःख का अनुभव कराता है।
(बच्चे भी अपनी काॅपी पर नोट करते हैं।)
गुरुजी - हां, तो बच्चों! चौथा कर्म है - मोहनीय कर्म ।
मोहिनी बेटी! क्या तुम बता सकती हो कि जब हमें कोई व्यक्ति या वस्तु अच्छी लगती है तो हमें उसके प्रति क्या अनुभव होता है?
मोहिनी - हाँ गुरुजी! हमें उस वस्तु से राग हो जाता है, इच्छा होती है कि वह हमेशा हमारे पास रहे और अंत तक हमारे साथ बनी रहे।
गुरुजी - कितना बढ़िया जवाब दिया है। अब यह भी बता दो कि यदि वह वस्तु न मिले... तो क्या होता है?
मोहिनी - गुरुजी! फिर हमें क्रोध आता है, दुःख होता है... जो उसे हमसे अलग करता है, उसके प्रति द्वेष हो जाता है। जब वह वस्तु या व्यक्ति हमसे सदा के लिए दूर चला जाता है, तो हम कषाय करने लगते हैं।
गुरुजी - (बोर्ड पर लिखते हुए)
(पुस्तक को खोलते हुए) 4. मोहनीय कर्म - यह आत्मा को राग-द्वेष में बांधने वाला कर्म है।
अब तुम में से कौन बताएगा कि संसार में कोई जीव तो 100 वर्ष तक जीवित रहता है और कोई जन्म लेते ही मरण को प्राप्त हो जाता है, ऐसा क्यों?
आयुष (हाथ खड़ा करके) - मैं बताऊँ गुरुजी! यह तो आयु कर्म का फल दिखाई देता है।
गुरुजी - बहुत अच्छा उत्तर दिया है, आयु कर्म ही जीव की वर्तमान पर्याय में स्थित रहने की अवधि को निर्धारित करता है।
(पुस्तक को खोलते हुए) (बोर्ड पर लिखते हुए)
5. आयु कर्म - यह वर्तमान शरीर में जीवन की अवधि (उम्र) तय करता है।
नामवर - गुरु जी! आयु कर्म तो समझ में आ गया, पर सभी व्यक्ति एक जैसा शरीर, वर्ण, आदि लेकर पैदा नहीं होते, कोई लंबा है, कोई छोटा, कोई काला है, कोई ऊँची जाति में पैदा हो रहा है, कोई निम्न जाति में, ऐसा क्यों?
गुरुजी - बच्चों! यह सब नाम कर्म के उदय के कारण होता है।
(पुस्तक को खोलते हुए) (बोर्ड पर लिखते हुए)
6. नाम कर्म - यह शरीर, जाति, वर्ण आदि की स्थिति का निर्धारित करने वाला कर्म है।
जीवन - गुरुजी! यह अन्तर क्यों होता है?
गुरुजी - बेटा! यदि हम अच्छे कर्म करेंगे, दया भाव, सेवा भाव रखेंगे, तो हमारा अच्छा शरीर, ऊँची जाति इत्यादि में जन्म होगा और बुरे विचार रखेंगे, तो निम्न कोटि का शरीर और नीच जाति में जन्म होगा।
गोत्र कुमार - पर गुरुजी! उच्च कुल और नीच कुल किस कर्म के उदय से मिलते हैं, कोई जीव सज्जन कुल में पैदा हो रहा है, कोई दुर्जन कुल में।
गुरुजी - जाति के समान कुल भी हमारे अच्छे-बुरे परिणामों के आधार पर निश्चित होते हैं।
(बोर्ड पर लिखते हुए)
(पुस्तक को खोलते हुए) 7. गोत्र कर्म - यह कर्म उच्च या नीच कुल में जन्म निर्धारित करने वाला कर्म है।
अंतरा - गुरुजी! हम चाहते तो बहुत हैं कि हम अच्छे काम करें, अच्छे विचार रखें, पर न जाने कौन सी शक्ति है, जो हमें ऐसा करने से रोकती है?
गुरुजी - यदि हम दूसरों के अच्छे कामों में बाधा डालते हैं, तो हमें अंतराय कर्म का बंध होता है, जो हमारे अच्छे कामों में बाधा डालता है।
(पुस्तक को खोलते हुए) (बोर्ड पर लिखते हुए)
8. अंतराय कर्म - इस कर्म का उदय आत्मा की शक्ति और गुणों को रोकने वाला होता है।
क्यों जीवन? जो प्रश्न तुम मुझसे पूछ रहे थे कि जीव अकेला क्यों आता है और अकेला ही क्यों जाता है, तो उसका उत्तर यही है कि प्रत्येक जीव अपने-अपने परिणामों के अनुसार कर्म बांधता है और उनका फल भी उसे अकेले ही भोगना पड़ता है।
इन्हीं 8 कर्मों के उदय के कारण हमारी आत्मा विभिन्न योनियों में भटकती है और सुख-दुःख का अनुभव करती है, और कर्मों का उदय हमारे पूर्व जन्मों के कर्मों का परिणाम होता है।
जीवन - क्या ये सभी कर्म हमारी आत्मा का घात करते हैं?
गुरुजी - नहीं। इनमें से ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय और अंतराय ऐसे कर्म हैं, जो आत्मा के मूल गुणों का घात करते हैं, इनके द्वारा होने वाले कर्म बंधन को हम बढ़ा भी सकते हैं और सावधान रहें, तो कम भी कर सकते हैं। ये घातिया कर्म कहलाते हैं।
शेष चार कर्म आयु, नाम, गोत्र और वेदनीय अंत समय तक हमारे साथ रहते हैं, ये अघातिया कर्म कहलाते हैं। तुम्हें एक बात का पता है कि इन आठों कर्मों में मोहनीय कर्म सबसे खतरनाक है।
...क्योंकि किसी व्यक्ति या वस्तु के प्रति मोह या आसक्ति सभी कर्म बंधनों का मूल कारण है और इसका नाश करके ही जिनदीक्षा के भाव बनते हैं और केवलज्ञान की प्राप्ति करके हम मोक्ष महल में प्रवेश कर सकते हैं।
जीवन - गुरु जी! आज तो आपने हमारी आंखे खोल दीं, अब हम अपने प्रत्येक कार्य और विचार को सावधानी से करेंगे, अब हमें अकेले रहने में कोई भय नहीं लगेगा।
सभी बच्चे हाथ जोड़ कर खड़े हो जाते हैं और समवेत स्वर में ये पंक्तियां बोलते हैं -
बोलो भगवान महावीर स्वामी की जय, जैन धर्म की जय।
धुन . तुम्हीं मेरे मन्दिर ......
बचो कर्म बंधन से, सबको बचाओ।
यही भव भ्रमण का कारण, उन्हें समझाओ।
बचपन से बच्चों को ये, पाठ पढ़ाओ।
नैतिक गुणों से उनका, जीवन सजाओ।
सभी बच्चे - प्रणाम गुरुजी।
गुरुजी - (हाथ उठा कर) आयुष्मान भव, धर्मवृद्धि हो, ज्ञान वृद्धि हो।
(पटाक्षेप होता है)
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
विनम्र निवेदन
यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें।
धन्यवाद
Comments
Post a Comment