रे मन मुसाफिर
रे मन मुसाफिर
पारुल जैन, दिल्ली द्वारा संकलित एवं प्रेषित सुन्दर भजन
रे मन मुसाफिर निकलना पड़ेगा,
काया का घर खाली करना पड़ेगा।
भाड़े के क्वाटर को क्या तू संभाले,
इक दिन तुझे उसका मालिक निकाले,
इसका किराया भी भरना पड़ेगा,......
रे मन मुसाफिर निकलना पड़ेगा,.....
काया का घर खाली करना पड़ेगा,...
आयेगा नोटिस ज़मानत न होगी,
तेरे पास कोई अमानत न होगी,
होकर के कैद तुझे जाना पड़ेगा,
रे मन मुसाफिर निकलना पड़ेगा,
काया का घर खाली करना पड़ेगा,...
यमराज की तू अदालत चढ़ेगा,
पूछेगा हाकिम तो तू क्या कहेगा,
पापों की अग्नि में जलना पड़ेगा,
रे मन मुसाफिर निकलना पड़ेगा,
काया का घर खाली करना पड़ेगा,...
सतायेंगे कर्म फिरेगा तू रोता,
लाख चैरासी में खायेगा गोता,
घर-घर जनम और मरना पड़ेगा,
रे मन मुसाफिर निकलना पड़ेगा,
काया का घर खाली करना पड़ेगा,...
रे मन मुसाफिर...
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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