ठण्डा पानी
ठण्डा पानी (प्रेरणादायक लघु नाटिका)
पात्र परिचय —
माँ - उम्र 60 वर्ष, अधपके बाल, क्रीम रंग की साढ़ी पहने हुए
बड़ा बेटा शीतल प्रसाद- उम्र 30 वर्ष, सफेद रंग का कुर्ता-पायजामा पहने हुए
बेटी रसना रानी - उम्र 25 वर्ष, गुलाबी रंग का सलवार कमीज़ पहने हुए
दूसरा बेटा गेंदामल - उम्र 22 वर्ष, पीली कमीज़, काली पैंट पहने हुए, हर समय कुछ सूंघते हुए
तीसरा बेटा दर्शन कुमार - उम्र 20 वर्ष, प्रिंटिड कमीज़ और जींस पहने हुए, आँखों पर काला चश्मा
चौथा बेटा कर्ण प्रसाद - उम्र 18 वर्ष, नीली कमीज़, काली पैंट पहने हुए, कानों में इयर फोन लगाए हुए
पड़ोसिन देवकी - उम्र 25 वर्ष, हरी साढ़ी पहने हुए
कमरे का दृश्य -
एक ओर खाट बिछी हुई है, जिस पर दरी, चद्दर और एक तकिया रखा है, साढ़ी, सूई धागे, फाॅल। दूसरी ओर पानी से भरा मटका और उस पर एक गिलास रखा है। एक चूल्हा, उस पर एक रोटियों का कटोरदान, जिसमें 5 रोटियाँ रखी हैं, एक डोंगे में सब्जी, पास ही पांच थालियां, पांच कटोरियां, पांच चम्मच और एक कड़छी रखी है।
सूत्रधार - आज हम आपको एक प्रेरणादायक लघु नाटिका दिखाने जा रहे हैं - ठण्डा पानी
(माँ खाट पर हाथ में कोई साढ़ी लेकर सूई धागे से उस पर फाॅल लगाने का अभिनय करती हुई, देवकी का प्रवेश)
देवकी - ताई जी! राम राम।
माँ - राम राम बेटी! तू राम खिलावन की बहू देवकी है न!
देवकी - हाँ ताई जी!
माँ - आज यहाँ का रास्ता कैसे भूल गई?
देवकी - नहीं ताईजी! भूली नहीं हूँ। मैं तो आपको एक बात बताने आई हूँ, पर आप तो हर समय किसी न किसी काम में ही लगी रहती हो। जब देखो!, कभी झाड़ू लगा रही होती हो, कभी कपड़े धो रही होती हो, कभी खाना बना रही होती हो। आपके तो चार-चार बेटे हैं और एक बेटी भी तो है। उनसे काम क्यों नहीं करवाती?
माँ - क्या करूँ, बेटी? लड़के तो सारा दिन बाहर ही रहते हैं। यों नहीं कि सुबह-सुबह पानी ही भरवा दें। बस! आते ही 'खाना दे दो, पानी दे दो'। लड़की को तो अपने मेकअप से ही फुरसत नहीं मिलती। ठीक है, स्कूल में पढ़ाने जाती है, पर शादी के बाद तो घर सम्भालना ही पड़ेगा। कुछ सीखेगी नहीं, तो मुझे ही सुनना पड़ेगा। जब से बच्चों के पिता का वियोग हुआ है, मैं तो इनकी सेवा में ही लगी रहती हूँ। हाँ! तू बता, क्या बताने आई है?
देवकी - ताई जी! मैंने सुना है कि अपने शहर में एक बहुत बड़े स्वामी जी आए हैं। उनके प्रवचन बहुत अच्छे होते हैं और दिन में 2 बजे से चार बजे तक तो सिर्फ महिलाओं के लिए ही बोलते हैं।
माँ - अच्छा!
देवकी - हाँ ताई जी! इस समय औरतें भी घर के काम से खाली हो जाती हैं न! कह रहे हैं कि जो एक बार उनके प्रवचन सुन ले, तो उसकी तो ज़िन्दगी ही बदल जाती है।
माँ - तू गई थी क्या सुनने?
देवकी - नहीं, ताई जी! अकेले तो घर वाले जाने नहीं देते। क्यों न अपने आसपास की औरतों को इकट्ठा कर लें और सब साथ में चलें। आप भी चलो न! आपके साथ तो भेज भी देंगे।
माँ - हाँ! ठीक है। सुरेश की बहू को भी कह दे। जग्गे की बहू से भी पूछ ले। और हाँ। उनसे कह देना कि पुरानी-सी चप्पल पहन कर चलें। इन सत्संगों में चप्पल चोर और जेबकतरे बहुत घूमते रहते हैं।
देवकी - हाँ ताई जी! कह दूंगी।
माँ - हाँ बेटी! अपने सामान की तो खुद ही रखवाली करनी पड़ती है। तुझे क्या बताऊँ? एक दिन मैं बाज़ार में चप्पल लेने चली गई। मैंने दुकानदार से कहा - अच्छी-सी चप्पल दिखा दे। वह तो वही पुरानी चप्पलें दिखाने लगा। मैंने उससे कहा कि पिछली बार भी तूने यही चप्पल दिखाई थी। क्या बात है? नया माल नहीं आया क्या? तो पता है, वह क्या बोला? वह बोला कि माताजी! आजकल शहर में सत्संग होने कम हो गए हैं न! इसलिए नई चप्पलें आनी कम हो गई हैं। लो बताओ! लोग सत्संग से चप्पलें चुराते हैं और दुकानों पर बेच देते हैं।
(देवकी हंसने लगती है।)
देवकी - तो ठीक है ताई जी! मैं उनको बुलाकर लाती हूँ। तब तक आप भी तैयार हो जाओ।
(माँ उसी साढ़ी पर फिर से थोड़ा-सा हाथ फेरती है। इतने में उसका बड़ा बेटा शीतल आ जाता है।)
शीतल - माँ कहीं जा रही हो क्या?
माँ - हाँ बेटा शीतल! वह देवकी आई थी बुलाने। मैं स्वामी जी का प्रवचन सुनने जा रही हूँ।
शीतल - माँ! एक गिलास पानी तो देती जाओ।
(तभी पीछे से देवकी की आवाज़ आती है।)
देवकी - ताई जी! आ जाओ। हम आ गए हैं। देर न करो, वरना वहाँ बैठने की जगह नहीं मिलेगी।
माँ - हाँ, चलो। अरे शीतल! तू घर पर ही रहना और पानी लेकर पी लेना। सबके लिए रोटी बनाकर रख दी है। खा लेना। मैं 1 घण्टे में आ जाऊँगी।
(शीतल बिना पानी पीए वहीं बिछी हुई खाट पर तेट जाता है। तभी दूसरा बेटा गेंदामल, तीसरा बेटा दर्शन कुमार, चौथा बेटा कर्ण प्रसाद भी आ जाते हैं।)
(वे कोने में पानी से भरी बाल्टी के पास जाकर अपने हाथ और मुँह धोने का अभिनय करते हैं)
गेंदामल - शीतल भैया! माँ नहीं दिखाई दे रही। कहीं गई हैं क्या?
शीतल - हाँ गेंदा! वे मोहल्ले की औरतों के साथ स्वामी जी का प्रवचन सुनने गई हैं।
दर्शन कुमार - (चश्मा उतारते हुए) - हैं! फिर हमें खाना कौन देगा?
शीतल - दर्शन! माँ कह कर गई हैं कि सबके लिए रोटी बनाकर रख दी है। खा लेना। मैं 1 घण्टे में आ जाऊँगी।
कर्ण प्रसाद - (कानों से इयर फोन निकालते हुए) माँ भी न! यह नहीं देखती कि हम काम करके थके मांदे आएंगे और यहाँ कोई खाना देने वाला भी नहीं है। माँ तो खूब सारा घी डाल कर देती हैं। अब हम कहाँ ढूंढते फिरेंगे कि घी कहाँ रखा है।
शीतल - कर्ण! कोई बात नहीं। अभी रसना बहिन आ जाएगी। वही परोस देगी सबको खाना।
(रसना गुनगुनाती हुई मंच पर प्रवेश करती है, एक हाथ में पर्स लटका हुआ है और दूसरे से दुप्पटे का किनारा पकड़े हुए है।)
रसना - अरे वाह! यहाँ तो महफिल जमी हुई है। पर माँ कहीं दिखाई नहीं दे रही। तुमने खाना खा लिया क्या?
दर्शन कुमार - अरे! कहाँ खाया? अब तू आ गई है, तो चल! जल्दी से हमें भी खाना दे दे और तू भी खा ले।
(रसना का मुँह बन जाता है। वह गुस्से में पर्स खाट पर पटकती है और चूल्हे की ओर बढ़ जाती है, जहाँ खाने का कटोरदान रखा है।)
(रसना पाँच थालियां रखती है, उनमें एक-एक कटोरी व चम्मच रखती है और खाना परोसने का अभिनय करती है।)
(सभी खाना खाने का अभिनय करते हैं।)
रसना - आज खाने में बिल्कुल भी स्वाद नहीं आया। माँ होती तो गर्म-गर्म खाना मिलता।
(माँ का मंच पर प्रवेश)
माँ - आ गए तुम सब! खाना खा लिया सबने! शीतल! तूने पानी तो पी लिया था न!
शीतल - माँ! तुमने पानी दिया ही कब था? अब ऐसा करो, खाना तो हमने खा लिया जैसे-तैसे। अब ठण्डा-ठण्डा पानी पिला दो।
माँ - अरे! हद हो गई। मैं भी तो धूप में चल कर आई हूँ। आते ही तुमने पानी देने को कह दिया। यूँ तो नहीं कि तुम मुझे पानी का गिलास लाकर देते। आज स्वामी जी भी अपने प्रवचन में यही कह रहे थे कि तुम सारा दिन घरवालों की सेवा में लगी रहती हो। कभी उन्होंने भी तुम्हें पानी को पूछा है क्या? अब तुम अपना उद्धार करो। अंत समय में घरवाले नहीं, तुम्हारा किया हुआ धर्म ही काम में आएगा। अरे गन्दे! तू ही पिला दे मुझे पानी।
गेंदामल - माँ! आप भी कैसी बात करती हो। माँ, कितनी बार कहा है कि मेरा नाम गन्दा नहीं, गेंदामल है। मुझमें से बहुत अच्छी सुगन्ध आती है। भला आज तक मैंने कभी घड़े को हाथ भी लगाया है। बल्कि ऐसा करो। शीतल भैया के लिए ठण्डा-ठण्डा पानी लाओ, तो उसमें थोड़ा-सा गुलाब का एसेंस भी डाल लेना। बिना खुशबू का पानी भी कोई पानी होता है।
(अब तो सबके कान खड़े हो गए।)
माँ- रसना बेटी! चल तू ही ला दे ठण्डा-ठण्डा और खुशबूदार पानी सबके लिए।
रसना - (अपने हाथों पर नेलपाॅलिश को देखते हुए) माँ अब यह सब तो मुझसे होगा नहीं। पर हाँ! ठण्डे-ठण्डे और खुशबूदार पानी में थोड़ा-सा मीठा भी डाल लेना। पानी ठण्डा और खुशबूदार हो और मीठा न हो, तो क्या स्वाद आएगा?
(जीभ को अंदर-बाहर करते हुए मुँह बनाती है)
माँ- दर्शन बेटा! चल तू ही ला दे ठण्डा-ठण्डा, खुशबूदार और मीठा पानी सबके लिए।
दर्शन कुमार - माँ! मैं तो बहुत थक गया आज।
माँ- दर्शन बेटा! ऐसा भी क्या काम कर लिया तूने आज, जो सबको पानी भी नहीं पिला सकता। मुझे देख न! सारा दिन काम में लगी रहती हूँ, फिर भी कोई मेरी सेवा नहीं करता।
दर्शन कुमार - माँ! वो आज मैं दोस्तों के साथ क्रिकेट मैच देखने गया था न! सच में माँ! बहुत मज़ा आया। फिर सब होटल में चाय पीने चले गए। फिर हमने प्लान बनाया कि चलो! हम भी मैदान में जाकर क्रिकेट में अपना हाथ आजमाते हैं। बस! रन बनाने में जो भागना पड़ा न! उसी से थक गया। बाॅलिंग तो मैंने की ही नहीं।
माँ- अच्छा! तो यह बात है। मेरे साथ पानी भरने के लिए तो तुझे टाइम नहीं होता, और क्रिकेट मैच देखने और खेलने के लिए टाइम भी है और ताकत भी।
स्वामी जी ठीक ही कह रहे थे -
अपने-अपने सुख पाने को, व्याकुल हर इक बंदा है।
अपने अपने को सब चाहें, जग का गोरखधंधा है।
बस! तुझे तो देखने की ललक लगी रहती है। यह देख लूँ, वह देख लूँ।
दर्शन कुमार - ओह! माँ! देखने से याद आया। आपने जो किचन में लाल, हरे, पीले रंग की शीशीयाँ जमा कर रखी हैं न! उनमें से लाल रंग भी मीठे, ठण्डे और ख़ुशबूदार पानी में मिला देना। पानी देखने में भी तो सुन्दर लगना चाहिए न!
(कर्ण एक ओर खड़ा अपने मोबाइल में कुछ बटन दबा रहा है)
माँ- तूने तो कुछ करना-धरना है नहीं। कर्ण बेटा! तू वहाँ खड़ा-खड़ा क्या कर रहा है? तू तो सबसे लाडला बेटा है न! जा! तू ही सबको ठण्डा, मीठा, ख़ुशबूदार और लाल रंग वाला पानी बना कर पिला दे।
कर्ण - माँ! देख तो रही हो। मैं तो अपने मोबाइल में बिजी हूँ। कितने कर्णप्रिय गाने आ रहे हैं। तुम ही उठ कर बना लो न! और हाँ उसमें बर्फ के टुकड़े डालना न भूलना। जब गिलास को हिला-हिला कर ठण्डा, मीठा, ख़ुशबूदार और लाल रंग वाला पानी पिएंगे, तो उसमें से मधुर ध्वनि निकलेगी। उसे सुनने में बहुत मज़ा आएगा।
सब बच्चे - हाँ माँ। अब तो सब्र नहीं हो रहा। बस अब जल्दी से बर्फ के टुकड़े डाल कर ठण्डा, मीठा, ख़ुशबूदार और लाल रंग वाला पानी पिला ही दो।
माँ- अरे निकम्मों! मैंने सारी उम्र तुम्हारी ही ख़्वाहिशें पूरी की हैं। जो तुमने चाहा, वही दिया। पर तुम्हारा मन कभी तृप्त नहीं हुआ। स्वामी जी ने बताया है कि इन्द्रियों की लालसा कभी पूरी नहीं हो सकती बल्कि बढ़ती ही जाती हैं। इन्हें नियन्त्रण में रखना सीखोगे, तभी परमात्मा की भक्ति में मन लगेगा। मन तो पागल हाथी के समान है। कभी इस दिशा में भागता है और कभी उस दिशा में। वह समझाने से नहीं, धमकाने से मानेगा। जाओ! अब मैं तुम्हें कोई बर्फ के टुकड़े डाल कर ठण्डा, मीठा, ख़ुशबूदार और लाल रंग वाला पानी पिलाने वाली नहीं हूँ। वह रहा मटका और वह रहा गिलास। प्यास लगी हो तो खुद उठकर पानी पी लो। मैं तुम्हारी नौकर नहीं हूँ। अब तक जो किया, वह किया। अब तुम मुझसे कोई उम्मीद मत करना। मैं तो चली आराम करने।
(यह कह कर माँ परदे के पीछे चली जाती है।)
पाँचों बच्चे - हाय राम!
(कह कर वहीं धम्म से बैठ जाते है, परदा गिरता है।)
सूत्रधार - क्यों? कैसा रहा? स्वामी जी ठीक ही कह रहे थे। जब तक हम इन्द्रियों के कहे अनुसार चलते रहेंगे, ये हमें नचाती रहेंगी। इन पर नियन्त्रण करना सीख जाएंगे, तभी धर्मध्यान का मार्ग दिख़ाई देगा।
बोलो आत्म धर्म की जय
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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विनम्र निवेदन
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