देवरति राजा की कथा

आराधना-कथा-कोश के आधार पर

देवरति राजा की कथा

देवरति नामक एक राजा अयोध्या में राज्य करते थे। उनकी रानी का नाम रक्ता था। वह बहुत सुन्दर थी। राजा सदा उसी के नाद में लगे रहते थे। वे बहुत विषयासक्त थे। शत्रु बाहर से आकर राज्य पर आक्रमण करते, उसकी भी उन्हें कुछ परवाह नहीं थी। राज्य की क्या दशा है, इसकी उन्होंने कभी चिंता नहीं की, जो धर्म और अर्थ पुरुषार्थ को छोड़कर अनीति से केवल काम का सेवन करते हैं, सदा विषयवासना के ही पास बने रहते हैं, वे नियम से कष्टों को उठाते हैं।

देवरति की भी यही दशा हुई। राज्य की ओर से उनकी ये उदासीनता मंत्रियों को बहुत बुरी लगी। उन्होंने राजा से राजकाज सम्हालने की प्रार्थना की, पर उसका फल कुछ नहीं हुआ। यह देखकर मंत्रियों ने विचारकर, देवरति के पुत्र जयसेन को अपना राजा नियुक्त किया और देवरति को उनकी रानी के साथ देश बाहर कर दिया। ऐसे काम को धिक्कार है, जिससे मान-मर्यादा धूल में मिल जाये और अपने को कष्ट सहना पड़े।

देवरति अयोध्या से निकलकर एक भयानक वन में पहुँचे। रानी को भूख ने सताया, पास खाने को एक अन्न का कण तक नहीं। अब वे क्या करें? इधर जैसे-जैसे समय बीतने लगा, रानी भूख से बैचेन होने लगी। रानी की दशा देवरति से नहीं देखी गई और वे देख भी कैसे सकते थे? उसी के लिए तो अपना राज-पाट तक उन्होंने छोड़ दिया था। 

आख़िर उन्हें एक उपाय सूझा। उन्होंने उसी समय अपनी जाँघ काटकर उसका माँस पकाया और रानी को खिलाकर उसकी भूख शांत की और प्यास मिटाने के लिए उन्होंने अपनी भुजाओं का खून निकालकर और उसे एक औषधि बताकर पिलाया। इसके बाद वे धीरे-धीरे चलते हुए यमुना के किनारे पर आ पहुँचे। देवरति ने रानी को तो एक झाड़ के नीचे बैठाया और स्वयं भोजन सामग्री लेने के लिए पास के एक गाँव में गये।

यहाँ पर एक छोटा-सा पर बहुत ही सुंदर बगीचा था। उसमें एक कोई अपंग मनुष्य चड़स खींचता हुआ गा रहा था। उसकी आवाज बहुत मधुर थी। इसलिए उसका गाना बहुत मनोहारी और सुनने वालों को प्रिय लगता था। उसके गाने की मधुर आवाज रक्ता रानी के भी कानों से टकराई। न जाने उसमें ऐसी कौन-सी मोहक शक्ति थी, जो उसने रानी को उसी समय मोह लिया और ऐसा मोहा कि उसे अपने निजत्व से भी भुला दिया। रानी सब लाज-शर्म छोड़कर उस अपंग के पास गई और उससे अपनी पाप-वासना उसने प्रगट की। वह अंपग कोई ऐसा सुंदर भी न था, पर रानी तो उस पर जी-जान से न्यौछावर हो गई।

सच है - ‘काम न देखे जात कुजात’। राजरानी की पाप-वासना सुनकर वह घबराकर रानी से बोला - मैं एक भिखारी और आप राजरानी, तब मेरी आपकी जोडी़ कहाँ? मुझे आपके साथ देखकर क्या राजा साहब जीवित छोड़ देंगे? मुझे आपके शूरवीर और तेजस्वी प्रियतम की सूरत देखकर कँपकँपी छूटती है। आप मुझे क्षमा कीजिये। उत्तर में रानी ने कहा - इसकी तुम चिंता न करो। मैं उन्हें तो अभी परलोक पहुँचाये देती हूँ। सच है, दुराचारिणी स्त्रियाँ क्या-क्या अनर्थ नहीं कर डालती। ये तो इधर बातें कर रहे थे कि राजा भी इतने में भोजन लेकर आ गये। उन्हें दूर से देखते ही कुलटा रानी ने मायाचारी से रोना आरम्भ किया। राजा उसकी यह दशा देखकर आश्चर्य में आ गये। हाथ के भोजन को एक ओर पटककर वे रानी के पास दौड़ते हुए आकर बोले - प्रिये, प्रिये, कहो! जल्दी कहो! क्या हुआ? क्या किसी ने तुम्हें कोई कष्ट पहुँचाया है? तुम क्यों रो रही हो? तुम्हारा आज अकस्मात् रोना देखकर मेरा सब धैर्य छूटा जाता है। बतलाओ, अपने रोने का कारण, जल्दी बतलाओ?

रानी एक लम्बी आह भरकर बोली - प्राणनाथ, आपके रहते मुझे कौन कष्ट पहुँचा सकता है? परंतु मुझे किसी के कष्ट पहुँचाने से भी जितना दुःख नहीं होता, उससे कहीं बढ़कर आज अपनी इस दशा का दुःख है। नाथ, आप जानते हैं कि आज आपकी जन्म दिन की वर्षगाँठ का दिन है। पर अत्यंत दुःख है कि पापी देव ने आज मुझे इस भिखारिणी की दशा में पहुँचा दिया। मेरे पास एक फूटी-कौड़ी भी नहीं है।

बतलाइए, मैं आज ऐसे उत्सव के दिन आपके जन्म दिन का क्या उत्सव मनाऊँ? सच है नाथ, बिना पुण्य के जीवों को अथाह शोक-सागर में डूब जाना पड़ता है। रानी की प्रेम-भरी बातें सुनकर राजा का गला भर आया, आँखों से आँसू टपक पड़े। उन्होंने बहुत प्रेम से रानी के मुँह को चूमकर कहा - प्रिये, इसके लिये कोई चिंता की बात नहीं। कभी वह दिन भी आयेगा, जिस दिन तुम अपनी कामनाओं को पूरी कर सकोगी। और न भी आये तो क्या? जबकि तुम जैसी भाग्यशालिनी जिसकी प्रिया है, उसे इस बात की कुछ परवाह भी नहीं है। जिसने अपनी प्रिया की सेवा के लिये अपना राजपाट तक तुच्छ समझा, उसे ऐसी-ऐसी छोटी बातों का दुःख नहीं होता। उसे यदि दुःख होता है, तो अपनी प्यारी को दुःखी देखकर! प्रिये, इस शोक को छोड़ो। मेरे लिए तो तुम ही सब कुछ हो। हाय! ऐसे निष्कपट प्रेम का बदला जान लेकर दिया जायेगा, इस बात की खबर या संभावना बेचारे देवरति को स्वप्न में भी नहीं थी। दैव की विचित्र गति है।

राजा के इस हार्दिक और सच्चे प्रेम का पापिनी रानी के पत्थर हृदय पर ज़रा भी असर न हुआ। वह ऊपर से प्रेम दिखाकर बोली - अस्तु, नाथ! जो बात हो नहीं सकती, उसके लिए पछताना तो व्यर्थ ही है। पर तब भी मैं अपने चित्त को सन्तुष्ट करने को इस पवित्र फूलों की माला द्वारा नाम-मात्र के ही लिए कुछ करती हूँ। यह कहकर रानी ने अपने हाथ में जो फूल गूँथने की रस्सी थी, उससे राजा को बाँध दिया। बेचारा वह तब भी यही समझा कि रानी कोई जन्म दिन की विधि करती होगी और यही समझ उसने खूब मजबूत बाँध जाने पर भी चूँ तक नहीं किया। जब राजा को बाँध दिया गया और उसके निकलने का कोई भय नहीं रहा तब रानी ने इशारे से उस अपंग को बुलाया और उसकी सहायता से पास ही बहने वाली यमुना नदी के किनारे ले जाकर बडे ऊँचे से राजा को नदी में धकेल दिया और स्वयं अब अपने दूसरे प्रियतम के पास रहकर अपनी नीच मनोवृत्तियों को सन्तुष्ट करने लगी।

नीचता और कुटापन की हद हो गई। जब पुण्य का उदय होता है तब कोई कितना ही कष्ट क्यों न दे या कैसी ही भंयकर आपत्ति का क्यों न सामना करना पड़े? तब भी वह रक्षित हो जाता है। देवरति का भी कोई ऐसा पुण्य-योग था, जिससे रानी के द्वारा नदी में डाल देने पर भी वह बच गया। कोई गहरी चोट भी उसे नहीं आई। वह नदी से निकल कर आगे बढ़ा। धीरे-धीरे वह मंगलपुर नामक शहर के निकट आ पहुँचा। देवरति कई दिनों तक बराबर चलते रहने से बहुत थक गया था। उसे बीच में कोई अच्छी जगह विश्राम करने को नहीं मिली थी, इसलिए अपनी थकावट मिटाने के लिए वह एक छायादार वृक्ष के नीचे सो गया। मानो वह सुख देने वाले जैन-धर्म की छत्र-छाया में ही सोया हो।

मंगलपुर का राजा श्रीवर्धन था। उसके कोई संतान नहीं थी। इसी समय उसकी मृत्यु हो गई। मंत्रियों ने यह विचार कर, कि पट्ट-हाथी को एक जल से भरा घड़ा दे कर उसे छोड़ा जाये और वह जिसका अभिषेक करे, वही अपना राजा हो, एक हाथी को छोड़ दिया। दैव की विचित्र लीला है। जो राजा है, उसे वह रंक बना देता है और जो रंक है, उसे संसार का चक्रवर्ती सम्राट बना देता है। देवरति का दैव जब उसके विपरीत हुआ तब तो उसे पथ-पथ का भिखारी बनाया और अनुकूल होने पर राज-योग मिलवा दिया। देवरति गहरी नींद में झाड़ के नीचे सो रहा था। हाथी उधर ही पहुँचा और उसने देवरति का अभिषेक कर दिया।

देवरति को बहुत आनन्द-उत्साह के साथ नगर में लाकर राज्य-सिंहासन पर बैठाया गया। सच है - जब पुण्य पास में होता है तब दुःख भी सुख के रूप में परिणत हो जाता है। इसलिए सुख की चाह करने वालों को भगवान् के बताए गऐ मार्ग द्वारा पुण्य-कर्म करना चाहिए। भगवान् की पूजा, पात्रों को दान, व्रत, उपवास ये सब पुण्य-कर्म हैं। इन्हें सदा करते रहना चाहिए।

देवरति पुनः राजा बन गये। पर पहले और अब के राजापन में बहुत फ़र्क था। अब वे स्वयं सब राज-काज देखा करते हैं। पहले से अब उनकी परिणति में भी बहुत अन्तर गया है। जो बातें पहले उन्हें बहुत अच्छी लगती थी और जिनके लिए उन्होंने राज्य-भ्रष्ट होना तक स्वीकार कर लिया था, अब वे ही बातें उन्हें अत्यन्त अप्रिय हो गई। अब वे स्त्री नाम से घृणा करते हैं। वे एक कुल-कलंकिनी का बदला सारे संसार की स्त्रियों को कुल-कलंकिनी कहकर लेते हैं। सच है - जो एक बार दुर्जनों द्वारा ठगा जाता है, वह फिर अच्छे पुरुषों के साथ भी वैसा ही व्यवहार करने लगता है। गर्म दूध का जला हुआ छाछ को भी फूँक-फूँककर पीता है। देवरति की भी अब विपरीत गति है। अब वे स्त्रियों को नहीं चाहते। वे अन्य सबको दान करते हैं, पर जो अपंग, लूला, लँगड़ा, होता है, उसे वे अन्न का एक कण तक देना पाप समझते हैं।

इधर रक्ता रानी ने बहुत दिन तक तो वहीं रहकर मजा-मौज की और बाद वह उस अपंग को एक टोकरे में रखकर देश-विदेश घूमने लगी। उस टोकरे को सिर पर रखे हुए वह जहाँ पहुँचती, अपने को महासती जाहिर करती और कहती कि माता-पिता ने जिसके हाथ मुझे सौंपा वही मेरा प्राण-नाथ है, देवता है। उसकी इस ठगाई से बेचारे लोग ठगे जाकर उसे खूब रुपया पैसा देते। 

इसी तरह भिक्षा-वृत्ति करती-करती रक्ता रानी मंगलपुर में आ निकली। वहाँ भी लोगों को उसके सतीत्व पर बहुत श्रद्धा हो गई। हाँ सच है - जिन स्त्रियों ने ब्रह्मा, विष्णु, महादेव सरीखे देवताओं को भी ठग लिया, तब साधारण लोग उनके जाल में फँस जायें इसका क्या आश्चर्य?

एक दिन ये दोनों गाते हुए राजमहल के सामने आये। इनके सुंदर गाने को सुनकर ड्योढ़ीवान ने राजा से प्रार्थना की - महाराज, सिंह-द्वार पर एक सती अपने अपंग पति को टोकरे में रखकर और उसे सिर पर उठाये खड़ी है। वे दोनों बहुत ही सुंदर गाना जानते हैं।

वे महाराज का दर्शन करना चाहते हैं। आज्ञा हो तो मैं उन्हें भीतर आने दूँ। इसके साथ ही सभा मे बैठे हुए अन्य प्रतिष्ठित कर्मचारियों ने भी उनको देखने की इच्छा जाहिर की।

राजा ने एक पर्दा डलवाकर उन्हें बुलवाने की आज्ञा दी।

सती सिर पर टोकरा लिए भीतर आई। उसने कुछ गाया। उसके गाने को सुनकर सब मुग्ध हो गये और उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। राजा ने उसकी आवाज़ सुनकर उसे पहचान लिया। उसने पर्दा हटवाकर कहा - अहा! सचमुच यह महासती है! इस का सतीत्व मैं बहुत अच्छी तरह जानता हूँ। इसके बाद ही उन्होंने अपनी सारी कथा सभा में प्रगट कर दी। लोग सुनकर दाँतों तले अँगुली दबा गये। उसी समय महासती रक्ता को शहर-बाहर करने का हुक्म हुआ। देवरति को स्त्रियों का ऐसा चरित्र देखकर बहुत वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने अपने पुत्र जयसेन को अयोध्या से बुलवाया और उसे ही इस राज्य का भी राज्य सौंपकर स्वयं श्री यमधराचार्य के पास जिन-दीक्षा ले गये, जो अनेक सुखों को देने वाली और दुःख़ों से मुक्त करने वाली है। साधु होकर देवरति ने खूब तपश्चचर्या की, बहुतों को कल्याण का मार्ग बतलाया और अंत में समाधि से शरीर त्यागकर वे स्वर्ग में अनेक ऋद्धियों के धारक हुए।

रक्ता रानी सरीखी कुलटा स्त्रियों का घृणित चरित्र देखकर और संसार, शरीर, भोगादिकों को इन्द्र-धनुष की तरह क्षणिक समझकर जिन देवरति राजा ने जिन-दीक्षा ग्रहणकर मुनिपद स्वीकार किया, वे गुणों के खज़ाने, मुनिराज मुझे मोक्ष-लक्ष्मी का स्वामी बनावें।

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