बाइसवें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जी (भाग - 4)
बाइसवें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जी (भाग - 4)
भगवान नेमिनाथ जी के पूर्वभव
भगवान नेमिनाथ जी का तीसरा व दूसरा पूर्वभव - हस्तिनापुर में सुप्रतिष्ठ राजा और ‘अहमिन्द्र’ की पर्याय
उस समय भरतक्षेत्र के हस्तिनापुर में राजा श्रीचन्द्र राज्य करते थे। भगवान नेमिनाथ का जीव अच्युतेन्द्र की आयु पूर्ण होने पर राजा श्रीचन्द्र के यशस्वी पुत्र के रूप में उत्पन्न हुआ, जिसका नाम था - सुप्रतिष्ठ। जब यह राजकुमार युवावस्था को प्राप्त हुआ, तब उसका राज्याभिषेक करके महाराजा श्रीचन्द्र ने जिन दीक्षा धारण की। राजा सुप्रतिष्ठ न्याय-नीतिनिपुण और आत्मज्ञानी थे। उनकी रानी का नाम सुनन्दा था। उनके राज्य में सर्वत्र धर्मात्माओं एवं विद्वानों का सम्मान होता था। वे भक्तिपूर्वक मुनिवरों की सेवा करते थे। एक बार उन्होंने यशोधर मुनिराज को आहारदान दिया। उस समय देवों ने प्रसन्न होकर उनके आँगन में दुंदुभिवादन, रत्नवृष्टि आदि पंचाश्चर्य प्रगट किए थे।
एक दिन राजा सुप्रतिष्ठ चाँदनी रात्रि में अपने महल की छत पर खड़े होकर आकाश की शोभा निहार रहे थे और विचार रहे थे कि जिस प्रकार असंख्य तारामण्डली से जगमगाता हुआ यह स्वच्छ आकाश शोभायमान है, उसी प्रकार असंख्य आत्मगुणों के आनन्दकारी प्रकाश से मेरा यह चैतन्य-गगन सुशोभित हो रहा है। यह शोभा अंतर के स्वानुभूतिरूप अतीन्द्रिय चक्षुओं से दृष्टिगोचर होती है।
राजा सुप्रतिष्ठ ऐसा आत्मचिन्तन कर रहे थे कि इतने में... अचानक खर्र्… की ध्वनि के साथ आकाश में प्रकाश की तेज रेखा दिखाई दी। अरे! यह क्या हुआ? आकाश से उल्कापात हुआ और एक विशाल तारा खिर गया। यह देखते ही राजा की विचारधारा में भी चमक-सी हुई। उनका चित्त संसार की अस्थिरता को देख कर विरक्त हुआ और वे विचारने लगे कि गगन से यह तारा तो खिर गया, परन्तु मेरा चैतन्य-गगन इतना ध्रुव है कि उसमें से निजगुण का एक भी तारा कभी खिरता नहीं है, इसलिए अनन्त गुणों के शाश्वत वैभव से भरपूर मेरी आत्मा ही मुझे शरणभूत है। इस संसार में अन्य कोई भी संयोग स्थिर या शरणभूत नहीं है। इस प्रकार वैराग्य प्राप्त करके राजा सुप्रतिष्ठ ने सुमंदर मुनिराज के समक्ष जिन दीक्षा धारण कर ली।
सुप्रतिष्ठ मुनिराज रत्नत्रय धारण करके आत्मध्यानपूर्वक परिणामविशु़द्ध करने लगे। उनको बारह अंग का ज्ञान उदित हुआ और दर्शनविशुद्धि आदि 16 उत्तम भावनाओं को भा कर तीर्थंकर प्रकृति का बंध हुआ। अब एक भव पश्चात् तीर्थंकर होकर मोक्ष प्राप्त करना निश्चित हो गया। अंत समय में एक मास का सल्लेखना व्रत धारण करके उन्होंने समाधिमरण किया और ‘जयन्त’ नामक अनुत्तर विमान में ‘अहमिन्द्र’ हुए।
सिद्धपद के समीप ऐसी उस ‘अहमिन्द्र’ की पर्याय में भगवान नेमिनाथ के जीव ने 33 सागर पर्यन्त दिव्य सुखों का अनुभव किया। यद्यपि उनके पास आत्मजनित और पुण्यजनित - ऐसे दोनों प्रकार के उत्तम सुख थे, तथापि उनमें से वे आत्मजनित सुख को ही उपादेय मानते थे और पुण्यजनित सुख को तुच्छ एवं क्षणभंगुर जानते थे अर्थात् वे ऐसे सुख को दुःख ही समझते थे।
वे जानते थे कि स्वर्गलोक के इस पुण्य के बीच में मैं सदा रहने वाला नहीं हूँ, परन्तु अपने आत्मसुख के साथ तो मैं सदा तन्मयरूप से रहूँगा। ऐसे भेद-विज्ञान के कारण वे स्वर्गलोक के बाह्य सुखों में लीन नहीं हुए और पूर्व के पुण्यकर्मों की भी निर्जरा करके मोक्ष की साधना की तथा आगे बढ़ते रहे।
इस प्रकार मोक्ष की साधना में आगे बढ़ते-बढ़ते उन ‘अहमिन्द्र’ का भरतक्षेत्र में तीर्थंकर रूप में अवतरित होने का समय निकट आ गया था।
अगले प्रकरण में हम महाराजा समुद्रविजय की वंश परम्परा का परिचय करेंगे, जहाँ भगवान नेमिनाथ स्वर्ग से चयकर अवतरित होने वाले हैं।
क्रमशः
।।ओऽम् श्री नेमिनाथ जिनेन्द्राय नमः।।
Comments
Post a Comment