बाइसवें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जी (भाग - 5)

बाइसवें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जी (भाग - 5)

हरिवंश - भगवान नेमिनाथ की वंश परम्परा का परिचय

हरिवंश की परम्परा में सिंहकेतु, शूरसेन आदि अनेक मोक्षगामी राजा हुए। महाराजा शूरसेन के पौत्र अंधकवृष्टि शौरीपुर (सूर्यपुर) में राज्य करते थे। उन अंधकवृष्टि राजा के दस पुत्र थे। उनमें सबसे बड़े समुद्रविजय (श्री भगवान नेमिनाथ के पिता) और सबसे छोटे पुत्र वसुकुमार (श्रीकृष्ण के पिता) थे। इस प्रकार भगवान नेमिनाथ और श्रीकृष्ण चचेरे भाई थे।

दस पुत्रों के अतिरिक्त राजा अंधकवृष्टि की कुन्ती और माद्री नाम की दो पुत्रियाँ थी। जिनके पुत्र पाण्डव थे। पाण्डव व भगवान नेमिनाथ और श्रीकृष्ण मामा-बुआ के भाई थे।

राजा अंधकवृष्टि के छोटे भाई नरवृष्टि मथुरा में राज्य करते थे। उनका पुत्र था उग्रसेन और उग्रसेन का पुत्र था कंस।

भगवान नेमिनाथ और श्रीकृष्ण के दादा राजा अंधकवृष्टि के पूर्वभव

एक बार शौरीपुर नगर में एक मुनिराज पधारे। उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ और उनके निकट धर्मोपदेश सुनकर व अपने पूर्वभव जानकर राजा अंधकवृष्टि वैराग्य को प्राप्त हुए।

मुनिराज ने राजा अंधकवृष्टि के पूर्वभव बताते हुए कहा - अंधकवृष्टि पूर्वभव में अयोध्या में रुद्रदत्त नाम के ब्राह्मण थे। उनके एक मित्र थे सुरेन्द्रसेठ, जो कुबेर के समान सम्पत्तिवान और जैन धर्म के परम भक्त थे। जिनपूजा आदि कार्यों में वे प्रतिदिन दस स्वर्णमुद्राएँ, अष्टमी को बीस और चतुर्दशी को चालीस स्वर्णमुद्राएँ व्यय करते थे। एक बार सुरेन्द्रसेठ को 12 वर्ष के लिए परदेश जाना पड़ा। तब उन्होंने अपने मित्र रुद्रदत्त ब्राह्मण पर विश्वास करके उन्हें जिनमंदिर के पूजन आदि कार्यों के लिए बहुत-सी स्वर्णमुद्राएँ दी, परन्तु रुद्रदत्त ने वह धन पूजा आदि कार्यों के बदले जुआ आदि पापकार्यों में ख़र्च कर दिया। इस प्रकार विश्वासघात करके धर्म का द्रव्य पापकार्यों में व्यय करने जैसे महापापों का सेवन करके वह जीव अनेक बार नरक गया और तीव्र दुःख सहन किए।

बाद में वह रुद्रदत्त ब्राह्मण का जीव संसार में भटकता हुआ हस्तिनापुर में अति निर्धन मनुष्य हुआ। वह महारोगी, दुर्गन्धयुक्त और कुरूप था। घर-घर भटक कर भीख माँगने पर भी उसका पेट नहीं भरता था। ऐसा लगता था कि पापी जीवों को ‘नरक कैसा होता है’, यह दिखाने के लिए ही उसे कर्मों ने मनुष्यलोक में भेजा था। ऐसा होने पर भी उसके मोक्ष जाने की काललब्धि निकट आने की तैयारी हुई और उसके अनुकूल प्रसंग बना।

एक जैन मुनिराज आहार लेने के लिए उस नगरी में पधारे। दरिद्र रुद्रदत्त भी उनके पीछे-पीछे चलने लगा। श्रावकों ने मुनिराज को भक्तिपूर्वक आहारदान दिया .... और पश्चात् उनके पीछे-पीछे चलने वाले दरिद्र रुद्रदत्त को भी भरपेट भोजन कराया। वह सोचने लगा कि ‘अरे! जीवन में एक बार क्षण भर के लिए मुनिराज के साथ रहने पर मुझे इतना अच्छा भोजन मिला है, तो अब क्यों न इन्हीं के साथ रहूँ? शायद इसी से मेरा दारिद्र दूर हो जाए।’

ऐसा सोच कर वह मुनि के साथ वन में चला गया और प्रार्थना की कि ‘हे स्वामी! मुझे भी अपने साथ रख लीजिए।’ मुनिराज ने उसे निकट भव्य जानकर जैन-साधु की दीक्षा दे दी। अन्य मुनियों के साथ रह कर वह भी संयम, तप और शास्त्राभ्यास करने लगा। वास्तव में जैन धर्म कितना उदार है और उसकी उपासना का फल कितना महान् है! इसके पालन से पूर्व में किए गए महापाप भी एक क्षण में धुल जाते हैं। ऐसे जिनधर्म की उपासना करके रुद्रदत्त के जीव ने पूर्वभव की विराधना के समस्त पाप धो डाले और समाधिमरण करके वह ग्रैवेयक में ‘अहमिन्द्र’ हुआ। वहाँ से आकर वह जीव शौरीपुर में राजा अंधकवृष्टि हुआ है।

इस प्रकार पूर्वभव बतला कर उन केवली भगवान मुनिराज ने राजा अंधकवृष्टि से कहा - हे राजन्! मैं ही तुम्हें पूर्वभव में दीक्षा देने वाला मुनि था। तुम चरमशरीरी हो और बाइसवें तीर्थंकर नेमिनाथ का जीव तुम्हारे पौत्र के रूप में अवतरित होगा।

यह सुन कर नेमि प्रभु के दादा ने कहा - हे देव! पूर्वभव में आप मुझे धर्म प्राप्त कराने वाले परम उपकारी गुरु थे और वर्तमान में भी आपने धर्मोपदेश देकर मेरा कल्याण किया है। कहाँ पाप के फलस्वरूप बारम्बार नरक के दुःख और कहाँ तपस्या के बल पर ‘अहमिन्द्र’ का पद! दोनों में मैं अकेला ही कर्त्ता था और अकेला ही भोक्ता। अब मैं अकेला ही मोक्ष को जाऊँगा।

इस प्रकार वैराग्य सहित दीक्षा लेकर अंधकवृष्टि (भगवान नेमिनाथ जी के दादा) ने मोक्ष को प्राप्त किया।

क्रमशः

।।ओऽम् श्री नेमिनाथ जिनेन्द्राय नमः।।

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