बाइसवें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जी (भाग - 6)

बाइसवें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जी (भाग - 6)

अंधकवृष्टि की वंश परम्परा में छोटे पुत्र - वसुराज

अंधकवृष्टि के समुद्रविजय आदि दस पुत्र थे। उनमें से 9 पुत्र तो पूर्वभव में परस्पर भाई ही थे, जो दीक्षा लेकर मुनि हुए और स्वर्ग में उत्पन्न हुए थे। वहाँ से वे पुनः मध्यलोक में भाई बन कर अवतरित हुए थे, परन्तु दसवां पुत्र वसुराज (श्रीकृष्ण के पिता) पूर्वभव में नन्दिसेन नामक एक निर्धन मनुष्य था और दुःखों से व्याकुल होकर आत्महत्या का विचार बना रहा था। उस समय शंख और निर्नामक नाम के दो मुनिराजों ने उसे देखा। ये दोनों मुनिराज श्रीकृष्ण और बलभद्र के जीव थे। उन्होंने, नन्दिसेन को निकटभव्य जानकर तथा यह जानकर कि अगले भव में ये हमारे पिता होंगे, नन्दिसेन को आत्महत्या करने से रोका और धर्म का स्वरूप समझा कर जिन दीक्षा दी।

वे नन्दिसेन मुनि वैयावृत्य तप में प्रसिद्ध थे। उनको अनेक लब्धियाँ प्रगट हुई, जिनसे वैयावृत्य के लिए उपयोगी औषधि आदि पदार्थ उन्हें स्वयमेव प्राप्त हो जाते थे। इन्द्रसभा में भी उनके वैयावृत्य तप की प्रशंसा होती थी। जैन शासन में धर्मात्मा के वैयावृत्य तप की अपार महिमा है।

जो मनुष्य धर्मात्मा होने पर भी आपत्तिकाल में धर्मात्मा की उपेक्षा करता है और वैयावृत्ति के द्वारा उसके कष्ट दूर करने का प्रयास नहीं करता, इसका अर्थ है कि उसका चित्त कठोर है और उसे धर्म में रुचि नहीं है।

नन्दिसेन मुनि को धर्म के प्रति परम वात्सल्य था। वे मुनियों की परम सेवा करते थे, परन्तु वे एक भूल कर बैठे। वे निर्धनता व दुर्गन्धित शरीर से त्रस्त होकर मुनि बने थे। उस शल्य के कारण ऐसा निदान कर बैठे कि ‘धर्म के प्रताप से भविष्य में मुझे अति सुन्दर रूपवान शरीर मिले।’ इसलिए समाधिमरण करके वे स्वर्ग में उत्पन्न हुए और वहाँ से वह जीव अंधकवृष्टि का सबसे छोटा पुत्र वसुराज बना। उसका रूप अति सुन्दर था तथा श्रीकृष्ण और बलभद्र उसी के पुत्र होंगे।

अपने ज्येष्ठ पुत्र समुद्रविजय का राज्याभिषेक करके महाराज अंधकवृष्टि तो मुनि बन कर मोक्षगामी हो गए और महाराज समुद्रविजय शौरीपुर का राज्य-संचालन करने लगे। कहाँ वह अंधकवृष्टि का जीव सातवें नरक के घोर दुःख सहन कर रहा था और कहाँ मोक्ष के परम सुख का अधिकारी हो गया। चैतन्य में कोई ऐसी परम शक्ति है, जिसकी उपासना से जीवात्मा स्वयं परमात्मा हो जाता है।

हे भव्य जीवों! तुम भी ऐसे परम प्रतापवान जैन धर्म की भक्ति पूर्वक आराधना करो।

क्रमशः

।।ओऽम् श्री नेमिनाथ जिनेन्द्राय नमः।।

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