बाइसवें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जी (भाग - 7)
बाइसवें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जी (भाग - 7)
रोहिणी की कुक्षि से 9वें बलभद्र का जन्म
अपने पिता द्वारा राज्याभिषेक किए जाने के बाद महाराजा समुद्रविजय शौरीपुर का राज्य-संचालन करने लगे। उनका सबसे छोटा दसवाँ भाई वसुकुमार अति रूपवान था। वह जब नगर में घूमने निकलता तो नगर की स्त्रियाँ उसके सुन्दर रूप पर मोहित हो जाती और अपने गृहकार्य भी भूल जाती। वे अपने बच्चों को निराश्रय छोड़ कर वसुकुमार को देखने के लिए दौड़ पड़ती।
नगरजनों ने यह आपत्ति महाराजा समुद्रविजय के समक्ष प्रगट की, जिससे महाराज ने युक्तिपूर्वक वसुकुमार को राजमहल में रोक कर नगर में जाना बंद करा दिया। एक बार जब द्वारपाल ने उसे महल से बाहर नहीं जाने दिया, तब उसे पता चला कि - अरे! मुझे तो नज़रकैद की भांति राजमहल में बंद कर दिया गया है। इससे दुःखी होकर वह नगर छोड़ कर चला गया और छल-कपट से ऐसी अफवाह फैला दी कि ‘वह स्वयं चिता में जल कर मर गया।’
वसुकुमार के वियोग से समुद्रविजय अत्यन्त दुःखी हुए, परन्तु निमित्त ज्ञानियों ने कहा कि आप दुःखी न होवें। वसुकुमार जीवित है और अमुक वर्ष बाद आपसे उसका मिलाप होगा।
कुमार वसुदेव मगध देश के राजगृही नगर में गया। वहाँ से एक विद्याधर उसे विजयार्द्ध पर्वत पर ले गया। फिर वह चम्पापुर गया। उसे जगह-जगह राजकन्याओं सहित अनेक प्रकार के वैभव की प्राप्ति हुई। अंत में वह रोहिणी के स्वयंवर में गुप्त वेश में पहुँचा और रोहिणी ने उसे वरमाला पहनाई। वहाँ आए हुए राजा अपमानित होकर लड़ने लगे, पर कुमार वसुदेव से कोई नहीं जीत सका। अन्त में जब राजा समुद्रविजय लड़ने के लिए तैयार हुए, तो उन्हें देख कर कुमार वसुदेव ने उनके चरणों में एक बाण फेंका। उस बाण के साथ एक चिट्ठी थी, जिसमें लिखा था कि ‘हे पूज्यवर! आपका छोटा भाई वसुदेव आपके चरणों में नमस्कार करता है।’
यह चिट्ठी पढ़ते ही ‘अहा! मेरा भाई जीवित है और आज मुझसे उसका मिलाप हुआ है’ - ऐसे अति हर्षपूर्वक राजा समुद्रविजय अपने अस्त्र डाल कर अपने भाई से मिले। सबने आनन्दपूर्वक शौरीपुर में प्रवेश किया। कुछ समय पश्चात् ‘शंखमुनि’ का जीव स्वर्ग से आकर कुमार वसुदेव की रानी रोहिणी की कुक्षि से पुत्र रूप में अवतरित हुआ, जो ज्योतिषियों के अनुसार 9वाँ बलभद्र होगा। ये वही ‘शंखमुनि’ थे, जिन्होंने वसुदेव के निर्धन नन्दिसेन की पयार्य के पूर्वभव में उन्हें आत्महत्या करने से रोका था।
क्रमशः
।।ओऽम् श्री नेमिनाथ जिनेन्द्राय नमः।।
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