बाइसवें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जी (भाग - 8)

बाइसवें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जी (भाग - 8)

कंस का पूर्वभव और उसका जन्म

जब शौरीपुर में राजा समुद्रविजय राज्य करते थे, तब मथुरा में कंस का राज्य था। यह कंस का जीव पूर्वभव में वसिष्ठ नाम का बाबा था, परन्तु जैन मुनियों के उपदेश से वह जैन साधु हो गया था और एक-एक महीने के उपवास करता था। तब मथुरा के राजा उग्रसेन ने अविचारी भक्ति से ऐसी आज्ञा दी कि इस मुनि का मासोपवास के पश्चात् पारणा मैं ही कराऊँगा, दूसरा कोई न कराए।

जब मुनिराज पारणे के लिए नगर में आए, तब नगर में हस्ति, अग्नि आदि उपद्रव होने से राजा उग्रसेन उनका पारणा नहीं करा सके। इस प्रकार मासोपवासी मुनि वसिष्ठ तीन बार पारणा किए बिना ही लौट गए। जब उन्हें पता चला कि उग्रसेन की आज्ञा के कारण ही ऐसा हो रहा है, तब उनके मन में राजा के प्रति वैरभाव जागृत हो उठा और विवेकशून्य होकर व धर्म से भ्रष्ट होकर ऐसा निदानबंध कर बैठे कि मैं अपने तप के प्रभाव से अगले जन्म में इस राजा का पुत्र बनूँ और इसका राज्य छीन कर इसे कारागार में डाल दूँ। इस बुरे संकल्प का बंध हो चुका था। वैरभाव से वह जीव उत्तम पुण्य को बेच बैठा और मरकर मथुरा नगरी के राजा उग्रसेन का पुत्र ‘कंस’ हुआ। उसके अशुभ लक्षण देख कर राजा उग्रसेन ने उसे मथुरा से निकाल दिया; वह फिरते-फिरते शौरीपुर में आया और राजकुमार वसुदेव का चाकर बन कर रहने लगा।

उस समय राजगृही नगरी में राजा जरासंध का शासन था। वह अर्धचक्रवर्ती (प्रतिवासुदेव) था। उसके शस्त्र-भण्डार में सुदर्शन चक्र उत्पन्न हुआ था। उसने तीन खण्ड के लगभग सभी राजाओं को जीत लिया था, परन्तु अभी सिंहरथ राजा को जीतना बाकी था। कुमार वसुदेव ने युक्तिपूर्वक राजा सिंहरथ को जीत लिया और बंदी बना कर अपने सेवक कंस द्वारा राजा जरासंध को सौंप दिया। इससे प्रसन्न होकर राजा जरासंध ने अपनी पुत्री ‘जीवयशा’ तथा आधा राज्य वसुदेव को देना चाहा, परन्तु वसुदेव ने स्वयं न लेकर वह कंस को दिलवा दिया। राज्य पाने के बाद कंस को ज्ञात हुआ कि वह तो मथुरा का राजकुमार है और पिता उग्रसेन ने बचपन में ही उसका परित्याग कर दिया था, तब उसके पूर्वभव के वैर के संस्कार जाग गए। उसने क्रोध में आकर अपने पिता उग्रसेन को बंदी बना कर कारागृह में डाल दिया और मथुरा पर अधिकार कर लिया।

उसने पूर्वभव में वसिष्ठ मुनि की पर्याय में जो पापनिदान बंध किया था, उसका यह फल सामने आया।

पश्चात् राजा कंस ने अपने उपकारी राजा वसुदेव को मथुरा बुला कर उनका सम्मान किया और अपनी बहिन देवकी का विवाह उनसे कर दिया।

क्रमशः

।।ओऽम् श्री नेमिनाथ जिनेन्द्राय नमः।।

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