बाइसवें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जी (भाग - 9)
बाइसवें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जी (भाग - 9)
श्री कृष्ण का जन्म
एक बार राजा कंस के महल में उनके भाई ‘अतिमुक्तक’ मुनि आहार लेने आए, तब कंस की रानी ‘जीवयशा’ ने उन मुनि की तथा उनकी बहिन देवकी की हँसी उड़ाकर उनका अनादर किया। इससे क्रोधावेश में वे मुनि वचनगुप्ति का पालन करना भूल गए और उनके मुख से भविष्यवाणी हो गई कि ‘हे जीवयशा! तू अभिमान के कारण जिसकी हँसी उड़ा रही है, उस देवकी बहिन का पुत्र ही तेरे पति (कंस) और पिता (जरासंध) का घात करेगा।
जब राजा कंस को मुनि द्वारा की गई भविष्यवाणी का पता चला, तब वह भयभीत हो गया और देवकी बहिन के पुत्रों को जन्म लेते ही मार डालने के दुष्ट आशय से अपनी बहिन देवकी को अपने ही महल में रखने का वचन कुमार वसुदेव से ले लिया।
अभी तक देवकी को किसी संतान की प्राप्ति नहीं हुई थी। उन्हीं दिनों ‘अतिमुक्तक’ मुनि, जो देवकी के भी भाई थे, पुनः मथुरा नगरी में पधारे। देवकी ने उनसे विनयपूर्वक पूछा - हे स्वामी! हमें दीक्षा का अवसर कब प्राप्त होगा?
मुनिराज ने कहा - हे बहिन! तुझे तो पुत्र-प्राप्ति की इच्छा है, फिर भी तू मायाचारी से दीक्षा की बात किसलिए पूछती है? सुन! तुझे अनेक उत्तम पुत्र होंगे। उनमें से 6 पुत्रों का तो अन्य स्थान पर लालन-पालन होगा और वे बड़े होकर दीक्षा लेकर मोक्ष प्राप्त करेंगे। सातवाँ पुत्र चक्रवर्ती वासुदेव होकर पृथ्वी पर राज्य करेगा। यह सुन कर देवकी का मन संतुष्ट हो गया।
तत्पश्चात् देवकी के तीन बार युगल पुत्र हुए। पुण्यप्रताप से उन छहों चरमशरीरी पुत्रों की एक देव ने रक्षा की और उनके स्थान पर दूसरे मृतपुत्र रख दिए। कंस ने समझा कि देवकी के पुत्र मृत ही पैदा हुए हैं, तथापि दुष्ट भाव के कारण उसने उन नवजात मृत शिशुओं को पत्थर पर पछाड़ कर उनका मस्तक फोड़ दिया।
उन 6 पुत्रों के पश्चात् देवकी को पुनः सातवें पुत्र का गर्भधारण हुआ। इस बार ‘निर्नामक मुनि’ का जीव, जो भोगों का पापनिदान करके स्वर्ग में गया था, देवकी के गर्भ में आया और देवकी ने सातवें महीने में ही पुत्र को जन्म दिया - वह थे श्री कृष्ण। इस प्रकार पूर्वभव के शंख और निर्नामक मुनि यहाँ बलदेव और वासुदेव के रूप में अवतरित हुए।
क्रमशः
।।ओऽम् श्री नेमिनाथ जिनेन्द्राय नमः।।
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