उत्तम आर्जव
उत्तम आर्जव
(परम पूज्य उपाध्याय श्री विशोकसागर महाराज की लेखनी से)
उत्तम आर्जव धर्म - कुटिलता या मायाचारी के अभाव को आर्जव धर्म कहते हैं।
वक्रवृत्तिं समालम्बयबन्धकैर्षन्चितं जगत्।
कौटिल्य कुशलैः पापैः प्रसन्नं कथ्यताशमैः।।
मायाचारी में कुशल, मलिन अभिप्राय वाले, पापी ठगों के द्वारा यह प्रसन्न स्वच्छ जगत बगुला जैसी भक्ति का अवलम्बन लेकर ठगा गया है।
मायाचारी लोग अपने मलिन विचारों के द्वारा किसी भी प्रसन्न व्यक्ति की प्रसन्नता को एक पल में खंडित कर देते हैं। वह उनके द्वारा उसी प्रकार ठगा जाता है, जिस प्रकार छोटी-छोटी मछलियाँ बगुले को भक्त मान कर उसके आस-पास आ जाती हैं और उसके मुख का ग्रास बन जाती हैं। वे बगुले के छल को समझ ही नहीं पाती कि वह वास्तव में भक्त की तरह ध्यान लगाए बैठा है या केवल भक्त होने का ढोंग कर रहा है।
योगस्यकामवाङ्मनो लक्षणस्या वक्रताऽर्जव मित्युच्यते।।
मन, वचन, काय - इन तीनों योगों को सरल रखना, छल कपट न करना आर्जव कहलाता है।
मायाचारोत्व इत्थीणं - मायाचारी स्त्रियों में स्वभावतः पाई जाती है। स्त्री पर्याय में कुछ कार्य छिपा कर ही किए जाते हैं, उन्हें सबके सामने प्रगट नहीं किया जा सकता, जैसे अपने अंगों को ढक कर रखना आदि। इसलिए ऐसा कथन कहा गया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि वे किसी से छल-कपट कर रही हैं।
आत्मनः कुटिल भावो माया विकृतिः।
आत्मा का कुटिल स्वभाव माया है। इसका दूसरा नाम विकृति है।
स्वहृदय प्रच्छादार्थमनुष्ठानं माया।
अपने हृदय के विचारों को छिपाने की जो चेष्टा की जाती है, उसे माया कहते हैं।
माया तैर्यग्योनस्य।
मायाचारी से तिर्यंच गति अर्थात् पशु योनि की प्राप्ति होती है।
नमन नमन में फेर है, अधिक नमे बेईमान।
दगाबाज़ दूना नमे, चीता, चोर, कमान।
जैसे चीता वार करने से पहले, चोर चोरी करने से पहले और कमान तीर चलाने से पहले नीचे झुक जाता है, उसी प्रकार दगाबाज़ और बेईमान अपनी दगाबाज़ी करने से पहले अधिक विनम्र दिखाई देते हैं। वे सबसे मीठी भाषा में बात करने लगते हैं।
गन्ने और जलेबी की मिठास में भी यही अन्तर है। गन्ना भी मीठा होता है और जलेबी भी मीठी होती है, पर दोनों की मिठास में भिन्नता है। गन्ने की मिठास अन्दर से उपजी हुई मिठास है, जिसका स्रोत जमीन है किन्तु जलेबी की मिठास ऊपर से डाली गई मिठास है। गन्ना सरल, सीधा है और उसकी मिठास स्वाभाविक है, किन्तु जलेबी का जीवन ही टेढ़ा-मेढ़ा है। उसकी मिठास वास्तविक कैसे हो सकती है?
हमें अपने हृदय में सरलता लाने के लिए बाँसुरी के समान बनना चाहिए।
बांसुरी में तीन गुण -
पहला गुण यह है कि वह बिना बुलाए नहीं बोलती।
दूसरा गुण यह है कि वह जब भी बोलती है, मीठा और मधुर ही बोलती है।
तीसरा गुण यह है कि बांसुरी के अन्दर कोई भी ग्रन्थि या गाँठ नहीं होती। वह आरपार पोली है।
जैसा बाहर से साफ़-सुथरा सरल जीवन है, वैसा ही अन्दर साफ़-सुथरा सरल जीवन है। जिसका जीवन ग्रन्थि या गाँठ से रहित एकदम सरल होता है, उसके जीवन में आर्जव धर्म आता है।
हमारे जीवन में तीन का बहुत महत्त्व है। तीन मूढ़ताओं से रहित सम्यग्दर्शन (देव-शास्त्र-गुरु), तीन भवन, तीन महारोग, तीन शल्य, तीन मकार, तीन आत्मा, तीन काल, तीन योग, तीन गुप्ति, तीन वेद, सच्चे देव के लक्षण भी तीन, मुनि के उपकरण भी तीन, पात्र भी तीन आदि।
सर्प बाहर कितना भी लहरा कर टेढ़ा-मेढ़ा चलता है किन्तु बिल में सीधा होकर ही प्रवेश करता है, उसी तरह हमारा जीवन, संसार में कितना भी टेढ़ा-मेढ़ा क्यों न बना रहे, परन्तु अपने आत्म-गृह में आने के लिए एकदम सीधा और ऋजु होना ही पड़ेगा। सरलता की परिणति का नाम आर्जव धर्म है।
ऋजुभावः आर्जवः - ऋजुता, सरलता (कुटिलता का अभाव) आर्जव धर्म है।
मोत्तूण कुडिल भावं णिम्मलहि दएण चरदि सो समणो।
अज्जव धम्मं तइयो तस्स दुसंभवदि णियमेण।।
जो मुनि कुटिल भाव को छोड़ कर निर्मल हृदय से आचरण करता है, उसे नियम से आर्जव धर्म होता है।
योगस्यावक्रता आर्जवम्।
योगों का वक्र न होना आर्जव है।
वक्रता के चार प्रकार हैं - बांस की जड़ के समान, मेढ़े के सींग के समान, गोमूत्र के समान और खुरपा के समान।
वाङ्मनः काय योगानामवकृत्वं तदार्जवम्।।
मन, वचन, काय रूप योगों की जो अवक्रता है, वही आर्जव धर्म है।
आर्जवं स्वर्ग सोपानं कौटिल्यादिविवर्जितम्।
कुटिलता से रहित आर्जव धर्म स्वर्ग का सोपान है।
जो चिंतेइ ण वंकं, ण कुणादि वंकं ण जंपदे वंकं।
ण म गोवदिणिय दोसं, अज्जव धम्मो हवे तस्स।।
जो मुनि (श्रावक) कुटिल विचार नहीं करता, कुटिल कार्य नहीं करता, कुटिल बात नहीं बोलता तथा अपने दोष नहीं छिपाता, उसके आर्जव धर्म होता है।
गुरु संग कपट, मित्र संग चोरी; या हो निर्धन, या हो कोढ़ी।।
जो गुरु के साथ कपट करता है या मित्र के साथ चोरी करता है, वह निर्धन हो जाता है। उसकी सारी अच्छाइयाँ समाप्त हो जाती हैं, प्रतिष्ठा-सम्मान गिर जाता है और अंततः वह कुष्ठ जैसे भयानक रोग से ग्रस्त हो जाता है।
जीवन है पानी की बूँद, कब मिट जाए रे....
होनी अनहोनी, कब क्या घट जाए रे....
उत्तम आर्जव अपनाओ, हृदय सरलता प्रगटाओ।
मायाचार है दुःखकारी, दुर्गति से भी डर पाओ।।
उत्तम आर्जव बिन, हो...हो...-2, क्या धर्म तू पाए रे....
जीवन है पानी की बूँद......
उत्तम आर्जव धर्म धरो, मन वच काय सरल करो।
हो जिससे तिर्यंच गति, उन कर्मों को शीघ्र हरो।।
उत्तम आर्जव ही, हो...हो...-2, निश्छलता लाए रे....
जीवन है पानी की बूँद......
जो देता है दगा-दगा, कोई न उसका सगा-सगा।
बिना सरलता के भैया, भाग्य है किसका जगा-जगा।।
सच्ची सरलता, हो...हो...-2, सद्गुरु सिखाए रे....
जीवन है पानी की बूँद......
उत्तम आर्जव है जहाँ, सरल सहज व्यवहार वहाँँ।
मायाचार नहीं जिनके, होगी पशु-पर्याय कहाँ।।
तीनों योगों को, हो...हो...-2, यह सरल बनाए रे....
जीवन है पानी की बूँद......
माया ठगिनी ठगती है, फिर भी अच्छी लगती है।
यह कैसा अज्ञान अरे! यह कैसा अज्ञान अरे!!
आर्जव धर्म हृदय लाओ, ज़रा सरलता प्रगटाओ।।
माया से मानव, हो...हो...-2, पशु योनि पाए रे....
जीवन है पानी की बूँद......
दगा किसी का सगा नहीं, न मानो तो कर के देखो।
जिस जिस ने भी किया दगा है, जाकर उसका घर देखो।
व्यक्ति दूसरों को गिराने के लिए गड्ढा खोदता है, परन्तु दूसरा उसमें गिरे या न गिरे, गिराने वाला स्वयं अवश्य गिर जाता है।
तन उजरा, मन सांवला, यह बगुला की टेक।
या सों तो कौआ भला, भीतर बाहर एक।।
उज्ज्वल वर्ण ग़रीब गति, एक टांग, मुख ध्यान।
देखत लागत भगत सम, निपट कपट की खान।।
मायां करोति यो मूढ़ः, इन्द्रियादिक सेवनम्।
गुप्तं पापं स्वयं तस्य व्यक्तं भवति कुष्ठवत्।।
जो अज्ञानी मनुष्य, इन्द्रिय आदि की सेवा में मायाचारी करता है, उसका गुप्त पाप कुष्ठ रोग के समान स्वयं प्रगट हो जाता है। जिस प्रकार कोढ़ी पुरुष का कोढ़ छिपाने पर भी बदबू आदि के कारण दृष्टिगोचर हो जाता है।
आर्जव सकल धर्म कारणं स्वर्ग मुक्ति सुख साधन हेतुम्।
प्राप्य यान्ति मुनयः सुरालयं त्वं सदा कुरु तमार्जव भावम्।।
आर्जव समस्त धर्मों का कारण है। स्वर्ग और मुक्ति सुख का कारण है। उस आर्जव धर्म को प्राप्त कर मुनिजन स्वर्गों को प्राप्त होते हैं।
साधना का आधार बिन्दु है - आर्जव धर्म।
आर्जव का अर्थ है - सरलता, विश्वास, वास्तविकता, ऋजुता, मन-वचन-काया की एकता। ये सभी आर्जव धर्म के पर्यायवाची नाम हैं।
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
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