धारण किए गए नियमों की नियमावली
धारण किए गए नियमों की नियमावली
अपने मन से धारण किए गए नियमों में शिथिलता क्यों आ जाती है?
अभी हमारे मन में इतनी दृढ़ता नहीं आई कि हम जो नियम भगवान के सामने खड़े होकर मन में धारण करते हैं, उसका निर्बाध रूप से पालन कर सकें।
यह तो वही बात है कि अपना पेपर खुद ही बनाना, खुद ही लिखना और खुद ही जाँचना। अब यह हमारी मर्ज़ी पर निर्भर हो जाता है कि हम स्वयं को फेल करें या पास करें।
यदि नियम में कोई ढील रह जाए, तो हम भी अपने नियम में स्वयं को छूट देकर पास होने का प्रयत्न करते हैं।
एक बार एक महिला आचार्य सुनील सागर जी महाराज के पास गई और एक ऐसा प्रश्न पूछने लगी जिसका धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं था।
क्या आप भी जानना चाहते हो कि उसने क्या प्रश्न किया?
हाँ।
तो सुनो।
उसने पूछा कि महाराज जी! मिठाई में क्या-क्या आता है?
महाराज जी ने पूछा कि तुम ऐसा क्यों पूछ रही हो?
उसने कहा - बात असल में यह है कि मैं 2 वर्ष पहले बाहुबली जी गई थी। उनके त्याग और तपस्या को देखकर मैं इतनी द्रवीभूत हुई कि मेरे मन में भी कुछ त्याग करने का भाव आया और मैंने उनकी विशाल प्रतिमा के सामने खड़े होकर एक छोटी सी प्रतिज्ञा की कि मैं आज से मिठाई का त्याग करती हूँ।
कुछ समय तो मन में दृढ़तापूर्वक पालन किया। फिर बार-बार मन में यह विचार आने लगा कि मुझे यह तो मालूम ही नहीं है कि मिठाई के त्याग में क्या छोड़ना है और क्या खाना है? गुड़, शक्कर भी मिठाई में आते हैं क्या?
घी में और चाशनी में बने हुए पदार्थ ही मिठाई में आते हैं या रबड़ी, खीर और रसगुल्ला आदि भी मिठाई की श्रेणी में आते हैं?
जब रसगुल्ला देखती हूँ तो मन में नियम तोड़ कर उसे खाने का भाव आने लगता है।
मिठाई छोड़ने के नियम से पुण्य तो पता नहीं मिलेगा या नहीं, नियम की दृढ़ता के भंग होने से पाप का बंध अवश्य हो रहा है।
तब महाराज ने कहा कि देखो! बहुत से लोग भावावेश में नियम तो ले लेते हैं, पर बाद में असमंजस में पड़ जाते हैं। न उनसे निभाते बनता है और न छोड़ते बनता है। कोई नियम लेने के साथ-साथ उसी समय कुछ सीमाएं भी बांध लेनी चाहिए।
अब तुम्हारी ही बात ले लो। तुमने नियम तो ले लिया कि ‘मिठाई का त्याग’, पर क्या तुमने नियम लेते समय यह निर्धारित किया था कि
मैं केवल बाज़ार की बनी हुई मिठाई न खाने का नियम लेती हूँ?
क्या तुमने घी व चाशनी से बनी मिठाई का ही नियम लिया था या सभी प्रकार की मिठाई का?
तुमने मीठे का नियम लिया था या मिठाई का?
मीठे का नियम नहीं लिया तो तुम बूरा, शक्कर तो खा सकती हो, पर उससे बनी मिठाई नहीं खा सकती।
दूध से बनी मिठाई को छोड़ कर अन्य प्रकार की मिठाई का त्याग करती हूँ।
‘तो अब क्या करूँ, महाराज जी?’
अब तो भगवान बाहुबली ही बताएंगे कि तुमने कैसा नियम लिया था? यदि यही नियम तुमने गुरु के सान्निध्य में लिया होता, तो वे तुमसे पहले ही ये सभी प्रश्न पूछ लेते और सही प्रकार से नियम दिलवाते।
गुरु से लिए गए नियम में कोई चूक हो भी जाए, तो वे प्रायश्चित आदि दिलवा कर तुम्हें पाप बंध से भी बचा लेते हैं। अभी तुम इतने परिपक्व नहीं हुए हो कि स्वयं नियम लेने की बारीकियां समझ सको और उन पर दृढ़ रह सको।
गुरु केवल नियम ही नहीं दिलवाते, अपितु परोक्ष रूप से नियम पालन की दृढ़ता भी प्रदान करते हैं क्योंकि नियम में चूक होने से गुरु की अवमानना का भी भय रहता है।
अतः भविष्य में नियम लेते समय सावधान रहो और नियम पालन करने की भी नियमावली बना कर चलो, तभी तुम्हारा नियम पुण्य बंध का हेतु बनेगा।
आचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज के प्रवचन से उद्धृत।
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
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धन्यवाद।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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