सती अंजना की कहानी (भाग - 2)
सती अंजना की कहानी (भाग - 2)
पिछले भाग में हमने पढ़ा कि कैसे पवनंजय अपनी भूल की क्षमा मांगने सबसे छिप कर अंजना सुंदरी के पास एक रात के लिए आते हैं।
कुछ दिनों के बाद अंजना सुंदरी को गर्भ के चिह्न दिखाई देने लगे तब सासू मां ने पूछा कि यह कर्म किसने किया?
तब अंजना सुंदरी ने सारा वृतान्त अपनी सासू मां को बताया कि किस तरह रात्रि में पवनंजय आए थे और प्रातः वापस चले गए। तब सासू मां केतुमति नहीं मानी।
अंजना सुंदरी ने पवनंजय की दी हुई मुद्रिका और दो कड़े भी दिखाए, लेकिन फिर भी उसकी सासू मां ने उसकी बात की सत्यता को नहीं माना। वह कहने लगी कि वह तो तुम्हें कभी देखता भी नहीं था। जब वह संग्राम के लिए गया था तो कैसे तुम्हें मर जाने को कहा था। तुम पापिन हो, आदि अनेक प्रकार से प्रताड़ना देने लगी।
सासू माँ ने क्रोधित हो कर उसे उसके पिता के पास महेन्द्रपुर भेजने का आदेश दिया।
अंजना सुंदरी का मन दुःख से भर गया। वह अपनी सखि वसंत माला के साथ महेन्द्रपुर आ गई। महेन्द्रपुर में द्वारपाल ने उन्हें अन्दर आने से रोक दिया लेकिन जब सखी वसंत माला ने सारी बात द्वारपाल को बताई, तो वह द्वारपाल महल के अंदर राजा महेंद्र के पास पहुंचा और कहा कि आपकी पुत्री अंजना सुंदरी आई है। उन्हें ससुराल से निकाल दिया गया है क्योंकि वह गर्भवती है। उनकी सासू मां ने उनके ऊपर लांछन लगाया है कि यह गर्भ किसी और का है। पवनंजय तो इसकी तरफ देखता भी नहीं था।
राजा महेंद्र भी सोच में पड़ गए क्योंकि वह भी जानते थे कि अंजना सुंदरी और पवनंजय में आपस में कोई पति-पत्नी जैसा व्यवहार नहीं था। इसलिए उन्होंने भी लज्जा के कारण बिना मिले ही अपनी पुत्री को नगर से निकलने का आदेश दे दिया। अपने पुत्र को आज्ञा दी कि उसे रथ में बिठाकर नगर के बाहर छोड़ दे।
उसके लिए कहीं भी स्थान नहीं था। अंजना और उसकी सखि वसंत माला एक घने जंगल में पहुंची। जंगल में बहुत-से पशु थे। दोनों धीरे-धीरे चलकर एक पहाड़ के पास पहुंची। अंजना से इतने अपमान के बाद चला भी नहीं जा रहा था। वह अपनी सखी को पकड़-पकड़ कर चल रही थी। जंगल में वह एक पहाड़ के निकट पहुंची। वहां पर एक गुफा दिखाई दी तो दोनों अंजना सुंदरी और उसकी सखी वसंत माला उस गुफा के द्वार पर खड़ी हो गई और भय के कारण इधर-उधर देखने लगी। तभी उन्हें कुछ ही दूरी पर एक ऋद्धि धारी मुनिराज दिखाई दिए, जो एक पवित्र शिला पर पद्मासन में विराजमान थे।
दोनों मुनिराज के समीप गई और दर्शन करके वहां बैठ गई। मुनिराज ने कहा - यह सब कर्मों के उदय से हो रहा है। अंजना सती तुम्हें ससुराल और पिता से आश्रय नहीं मिला। बिना कुछ बताए ही मुनिराज को सब पता चल गया था। यह देखकर वह आश्चर्यचकित हो गई। तब वसंत माला ने मुनिराज से पूछा - हे मुनिराज! किस कारण से अंजना के पति अंजना से उदास रहे और किस कारण वे पुनः अनुरागी हुए? कौन मंदभागी अंजना के गर्भ में आया है, जिससे अंजना पर सबको संदेह हुआ?
तब मुनिराज ने कहा - हे पुत्री! सुनो, अंजना के गर्भ में उत्तम बालक आया है। सो पहले तुम बालक के पूर्व भव सुनो। उसके बाद अंजना के पूर्व भव सुनना कि अंजना को किस कारण ऐसे दुःखों को भोगना पड़ा।
जम्बू द्वीप के भरत क्षेत्र में मन्दर नगर था। वहाँ प्रियनन्दी राजा अपनी पत्नी जया और पुत्र दमयंत के साथ रहता था। पुत्र का स्वभाव बहुत ही अच्छा, दयावान, शीलवान, संतोषवान, कल्याणरूप और महासौभाग्य से युक्त था। एक समय वह अपने मित्र के साथ क्रीड़ा कर रहा था। उसी समय एक महा मुनिराज दिखाई दिए, जो अपने ज्ञान और स्वाध्याय में लीन थे। दमयंत अपनी क्रीड़ा छोड़कर मुनि के पास पहुंच गया और उनसे धर्म का व्याख्यान सुनकर उसने नियमों और व्रतों को धारण किया। वह नवधा भक्ति के साथ मुनियों को आहार देने लगा। कुछ समय बाद समाधि मरण कर स्वर्ग में देव पद को प्राप्त हुआ।
वहां से च्युत होकर दान, नियम आदि के प्रभाव से वह जम्बूद्वीप में मृगांक नगर में हरिश्चंद्र राजा व रानी प्रियंगुलक्ष्मी के यहां सिंहचंद नाम का पुत्र हुआ। वह अनेक गुणों व कला में प्रवीण था और साधुओं की सेवा करता था। पुनः समाधि मरण करके वह देव हुआ। वहां मनोवांछित सुखों को भोगा।
वहां से चलकर भरत क्षेत्र में विजयार्द्ध पर्वत पर अरूणपुर नगर के राजा सुकण्ठ और रानी कनकोदरी के यहां सिंहवाहन नाम का पुत्र हुआ। वह अनेक गुणों से सम्पन्न था और रूपवान था। बड़े होकर सिंहवाहन ने श्री विमलनाथ भगवान के समवशरण में आत्मज्ञान एवं संसार से वैराग्य को प्राप्त कर, अपने पुत्र को राज्य देकर मुनि धर्म अंगीकार किया और अपने स्वरूप में निश्चल हुए।
22 परिषह सहते हुए अपनी आयु पूर्ण करके वे सातवें लान्तव स्वर्ग में ऋद्धिधारी देव हुए। जैसा रूप चाहें वैसा बनाएं, जहां चाहें वहां जाएं, ऐसी विद्या प्राप्त करके भी वे स्वर्ग के सुख में मग्न नहीं हुए और वहां से चलकर अंजना के गर्भ में आए हैं। ऐसे चरम शरीरी अविनाशी जीव इसी भव में मोक्ष को प्राप्त होंगे।
अब अंजना को किस कारण पति का वियोग एवं कुटुंब परिवार से अनादर प्राप्त हुआ, वह सुनो।
अंजना सुंदरी ने पूर्व भव में कनकोदरी रानी की पर्याय में श्री जिनेंद्र भगवान की मूर्ति अपनी सौतन के ऊपर क्रोध कर के क्षणमात्र के लिए मंदिर से बाहर निकाल दी थी, जिससे वह दर्शन न कर पाए। उसी समय एक संयम श्री आर्यिका उनके घर आहार को आई। मूर्ति का अविनय देख कर उन्होंने आहार नहीं लिया और कनकोदरी रानी को अज्ञानी समझ कर उपदेश दिया और कहा कि देव-शास्त्र-गुरु का अविनय करना अत्यंत दुःख का कारण है। इस पर उसने दुःखों से डरकर सम्यक् दर्शन एवं श्रावक के व्रतों को धारण किया। श्री जिनेंद्र भगवान की प्रतिमा मंदिर में विराजमान कर अष्ट द्रव्य से पूजा की। इस तरह कनकोदरी रानी समाधि मरण करके स्वर्ग में गई। स्वर्ग से चलकर राजा महेंद्र और रानी मनोवेगा की पुत्री राजकुमारी अंजना सुंदरी हुई।
तुमने पूर्व भव में जिनेंद्र देव की प्रतिमा को एक क्षण के लिए मंदिर से बाहर रखा था। उस पाप से पति का वियोग एवं कुटुंब से अनादर पाया है। तब मुनिराज ने कहा - हे पुत्री! तुम कर्म के उदय से दुःख को प्राप्त हुई, इसलिए आगे से ऐसा निंद्य कर्म मत करना। संसार समुद्र से तिराने वाले जिनेंद्र भगवान की भक्ति करो। जैन धर्म का पालन करो। साधु और त्यागियों की भक्ति करो। तुमने ऐसे पाप कर्म किए थे, जिनके कारण नीच गति में जाती, परंतु आर्यिका श्री ने कृपा कर तुम्हें धर्म का उपदेश दिया सो तुमको कुगति के मार्ग से बचा लिया। यह बालक तुम्हारे गर्भ में आया है, यह जगत का महाकल्याण करने वाला है। इस पुत्र के प्रभाव से तुम परम सुख को प्राप्त होगी और थोड़े ही दिनों में तुम्हारा अपने पति से मिलन होगा। इसलिए हे अंजना! तुम अपने मन में दुःखी मत होओ। प्रमाद को छोड़कर शुभ क्रिया करो। इस प्रकार मुनिराज के वचन सुनकर अंजना और सखि वसंत माला उसी गुफा में रहने लगे।
एक समय रात्रि में गुफा के द्वार पर सिंह आ गया और वह दहाड़ने लगा, तो अंजना और उसकी सखी दोनों घबरा गए। अंजना हृदय में भगवान का ध्यान करती रही। तब गंधर्व देव मणिचूल ने अष्टापद का रूप बनाकर सिंह को भगा दिया। इस तरह उनकी रक्षा हुई।
तब गंधर्व देव ने बहुत आनंद से भगवान मुनिसुव्रत नाथ के गुणों की भक्ति की, स्तुति की। अंजना सती ने ऐसी राग भरी भक्ति कभी नहीं सुनी थी। इन दोनों ने मुनि का ध्यान कर मुनिसुव्रत नाथ भगवान की प्रतिमा विराजमान कर सुगंधित द्रव्यों से उनकी पूजा की। इस तरह भगवान की भक्ति करते हुए उनका समय व्यतीत होने लगा।
कुछ समय बाद अंजना ने एक महापराक्रमी पुत्र को जन्म दिया। जब उसे गोद में उठाया तो वह कहने लगी कि यहाँ पर न तो इसका नाना है, न दादा है, ना ही पिता है। इसका जन्मोत्सव कौन मनाएगा? लेकिन मैं तुम्हें प्यार दुलार करूँगी और वह लोरी सुनाने लगी।
एक दिन आकाश मार्ग से अंजना के मामा राजा प्रतिसूर्य अपने विमान से जा रहे थे, तो उनका विमान वहां रुक गया। उन्होंने देखा कि जंगल में अंजना पुत्री एक गुफा में अपने नवजात पुत्र के साथ रह रही है। वे भी उनके साथ वहां रहने लगे और पुत्र का लालन-पालन करने लगे।
एक बार राजा प्रतिसूर्य ने क्रीड़ा करते हुए बालक को उठाया और बताया कि यह बालक समचतुरस्थ संस्थान एवं वज्रवृषभनाराच संहनन का धारक वज्र स्वरूप है, जो बालक उनकी गोद से उछल कर पहाड़ पर गिर पड़ा लेकिन उसके गिरने से पहाड़ चूर्ण-चूर्ण हो गया। जब इसमें बाल्य अवस्था में ऐसी अद्भुत शक्ति है, तो यौवन अवस्था की शक्ति का क्या कहना? यह निश्चय से चरम शरीरी एवं तद्भव मोक्षगामी है। यह फिर दोबारा शरीर धारण नहीं करेगा। इसकी यही पर्याय सिद्ध पद का कारण है।
इस प्रकार अंजना के मामा राजा प्रतिसूर्य बालक को नमस्कार कर, तीन प्रदक्षिणा देकर, सबको विमान में बिठाकर अपने स्थान पर आ गए। बालक का जन्मोत्सव मनाया गया और उसका नाम श्री शैल (हनुमान) रखा गया।
उधर पवनंजय रावण के कहने पर वरुण से युद्ध करके उसे पराजित करके और खरदूषण को बचाकर लाए। वरुण ने भी रावण की आज्ञा का पालन किया और सबसे विदा लेकर पवनंजय अपने नगर वापिस आ गए।
पवनंजय के आने पर उनका भव्य स्वागत किया गया, लेकिन अंजना को न पाकर उन्होंने सबसे पूछा कि अंजना कहां है? तब पूरा वृत्तांत सुनकर उनको बहुत ठेस लगी और उसे ढूंढने के लिए वह महेंद्र नगर पहुंच गए। लेकिन राजा महेंद्र ने बताया कि अंजना यहां पर नहीं है। उनका हृदय टूट गया और वह उन्हें जंगल-जंगल ढूंढने लगे।
ढूंढते-ढूंढते एक स्थान पर उनका विमान अटक गया तो उन्होंने विमान से नीचे देखा। वहाँ उन्हें राजा प्रतिसूर्य मिले जो कि अंजना के मामा थे। उन्होंने अंजना के बारे में सारा वृतान्त सुनाया और ऐसा बता दिया कि उनके पुत्र का जन्म हुआ है। यह भी बताया कि तुम्हारा पुत्र वज्र के समान शरीर वाला है, इसलिए उसका नाम श्री शैल (हनुमान) रखा है। वे दोनों इस समय हमारे नगर में अति आनंद से हैं।
राजा प्रतिसूर्य ने बड़े आदर के साथ दोनों को मिलवाया। इस तरह हनुमान और अंजना से मिलकर पवनंजय आनंदित हो गए। बड़े हर्ष के साथ वे उनके साथ वहां पर रहे। उस स्थान का नाम हनुरूद्वीप था।
पवनंजय और अंजना ने कहा कि हम अपने नगर आदित्यपुर जाना चाहते हैं। मामा प्रतिसूर्य ने जाने का इंतजाम करके तीनों को विदा किया। वे बड़े हर्ष के साथ अपने नगर में आए। राजा प्रह्लाद और रानी केतुमती ने अपनी बेटे-बहू और अपने पौत्र का स्वागत किया। फिर पुत्र पवनंजय और अंजना सती ने माता-पिता के चरण स्पर्श किये। उन्होंने उसे गले से लगाकर अपने दुर्व्यवहार की क्षमा मांगी। इस तरह सती अंजना सुंदरी का दुःख दूर हुआ।
पुण्यबंध से जीव स्वर्ग में जाता है और पाप बंध से नरक में वास करता है। जो कोई पुण्य-पाप दोनों से ममता छोड़कर आत्मा को ध्याता है, वह मोक्ष में वास पाता है।
सती अंजना सुंदरी ने अपने दुःखों को समतापूर्वक सहन किया और कभी अपने परिजनों को उसका कारण नहीं माना। वह जान गई थी कि यह सब मेरे पूर्व जन्म के किए हुए पाप कर्म का ही फल था।
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
विनम्र निवेदन
यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें।
धन्यवाद।
--
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
Comments
Post a Comment