सीता सती (भाग - 1)

धर्म की महान् सतियों की कहानियाँ

सीता सती (भाग - 1)

मिथिला पुरी में राजा जनक की रानी विदेहा के पुत्र-पुत्री का युगल जन्म हुआ। पूर्व भव की शत्रुता के कारण एक देव उनके पुत्र भामण्डल को हर कर ले गया। रानी विदेहा पुत्र के हरण किए जाने पर विलाप करती थी। राजा जनक और राजा दशरथ ने पृथ्वी पर बालक को ढूंढा, परंतु वह कहीं नहीं मिला।

उनकी पुत्री ‘जानकी’ बाल-क्रीड़ा कर परिवार को आनंदित करती थी। पुत्री जानकी महागुणवान, रूपवान, अत्यंत मनोज्ञ, सुंदर लक्षणों से सहित थी। वह पृथ्वी के समान क्षमा को धारण करने वाली थी, इसीलिए जगत में ‘सीता’ कहलाई। मुख पर चंद्रमा के समान सुंदर भौंहें, महाश्याम सुंदर केशों का समूह धारण किए हुए सीता संसार में सबसे सुंदर थी।

उसके रूप, गुण, विनय आदि को देखकर राजा जनक ने विचार किया कि जैसे रति कामदेव के ही योग्य है, वैसे ही यह राजकुमारी सीता, सबकी प्यारी, गुणवती सीता अयोध्या नगरी के राजा दशरथ के बड़े पुत्र राजकुमार राम के ही योग्य है, क्योंकि श्री रामचंद्र जी श्रेष्ठ महापुरुष, महासौभाग्यवंत, अति प्रतापी, अती गुणवान ऐसे शलाका पुरुष हैं और पृथ्वी पर अपने गुणों के कारण प्रसिद्ध हैं।

लेकिन अन्य राजाओं ने इसका विरोध किया। तब राजकुमारी सीता का स्वयंवर करने की घोषणा की गई। सभी देशों के राजकुमार और राजाओं को निमंत्रण दिया गया। राजा जनक ने घोषणा की कि जो राजकुमार शिव धनुष की प्रत्यंचा को चढ़ाएगा, उसके गले में सीता द्वारा वरमाला पहनाई जाएगी।

क्रम-क्रम से आकर राजकुमार धनुष की ओर गए। कुछ राजाओं की तो आँखें ही उसकी चकाचौंध देखकर बंद हो गई। कोई भयंकर सर्प की फुंकार से दूर भाग गए। तब श्री रामचंद्र जी धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए खड़े हुए और धनुष को हाथ में लेकर उसे चढ़ा कर खींचने लगे।

तब महाप्रचंड शब्द हुआ। पृथ्वी कम्पायमान होने लगी। आकाश से पुष्पों की वर्षा हुई। देव नाचने लगे और महारानी सीता ने राजा राम के निकट आकर उन्हें वरमाला पहना दी। इस प्रकार मिथिला पुरी में सीता जी और श्री राम का विवाह परम उत्सव के साथ धूमधाम से हो गया। राजा दशरथ अपने पुत्रों और पुत्रवधुओं के साथ अपने महल अयोध्या आ गए।

कुछ समय बाद राजा दशरथ का मन वैराग्य की तरफ हो गया और उनका पुत्र भरत भी बैरागी होकर मुनि बनना चाहता था। तब भरत को वैरागी बनने से कैसे मना करूँ - इस प्रकार की व्याकुलता होने पर रानी कैकई ने सोचा कि मैं राजा से दो वर मांग लूं। वह राजा दशरथ से अपने पुत्र भरत के लिए राज्य मांगती है और राम को वन जाने के लिए कहती है।

लक्ष्मण भी श्री राम के प्रेम से पूर्ण उनके साथ वन जाने की अनुमति मांगते हैं। सीता अपने पति को वन गमन करते देख अपने साथ ससुर से आशीर्वाद लेकर अपने पति के साथ चल देती है। धन्य है महा पतिव्रता सीता!

इस तरह सबसे विदा लेकर श्री राम, लक्ष्मण और सीता वन की तरफ गमन करते हैं।

महासती सीता के गमन के कारण खेतों में कई प्रकार के अन्न व हरियाली दिखाई दे रही है। सरोवर में कमल खिल गए हैं। पेड़-पौधे रमणीक दिखाई देते हैं। नगरवासी सबकी वंदना करते हैं।

इस प्रकार वे वन-वन भटकते रहे और अंत में दंडक वन में जाकर निवास करने लगे।

वर्षाकाल समाप्त होते ही शरद ऋतु का आगमन हुआ। भरत क्षेत्र के दक्षिण दिशा की तरफ लवण समुद्र के उत्तर की तरफ एक राक्षस द्वीप था, जिसे पाताल लंका कहते थे। वहां का राजा रावण तीन खंड का अधिपति था। उसकी बहन चंद्रनखा और बहनोई खर-दूषण था।

एक समय चंद्रनखा घूमते-घूमते उस वन में आ गई, जहां लक्ष्मण भ्रमण कर रहे थे। वह लक्ष्मण पर मोहित हो गई। लक्ष्मण ने राक्षसी चंद्रनखा का अपमान कर दिया।

वह रोते हुए अपने भाई रावण के पास गई और अपने अपमान का बदला लेने के लिए उत्साहित करने लगी। रावण ने छल कपट से राम और लक्ष्मण को दूर भेज कर सीता का हरण किया और उसे पुष्पक विमान में बिठाकर लंका की तरफ ले गया।

रास्ते में जटायु पक्षी ने उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह रावण के हाथों घायल हो गया। सीता महासती महाशोक से ग्रस्त होकर आर्तरूप विलाप करती रही। रावण ने साधुओं के निकट व्रत लिया था कि यदि परस्त्री मुझे नहीं चाहेगी, तो मैं उसे अपना नहीं बनाऊंगा।

उधर राम और लक्ष्मण सीता को जंगल-जंगल दुःखी होकर ढूंढने लगे, तब उन्हें जंगल में जटायु पक्षी को वेदना से तड़पते हुए देखा। राम ने उसे णमोकार मंत्र सुनाया और श्री राम के प्रभाव से वह समाधि मरण कर देवगति को प्राप्त हुआ।

रावण सीता को लेकर विमान के ऊंचे शिखर पर बैठ कर अपने महल लंका पुरी में ले गया। सीता वहां पहुंचकर मन में विचार करती है कि जब तक श्री रामचंद्र जी की कुशल मंगल की सूचना नहीं मिलेगी, तब तक मेरा चारों प्रकार के आहार पानी का त्याग है। पति के कुशल समाचार सुनने के बाद ही मैं आहार पानी ग्रहण करूंगी।

रावण सीता को अशोक उपवन में रखकर अपने राजभवन में चला गया। रावण सीता को प्रसन्न करने के लिए कई प्रकार के छल कपट करता, अनेक प्रकार के वचनों से उसे प्रसन्न करना चाहता, लेकिन मां सती सीता का कोई शील नहीं डिगा सका।

उधर श्री राम और लक्ष्मण ने सीता को ढूंढते हुए लंका में प्रवेश किया। उन्होंने हनुमान, अंगद और सुग्रीव की मदद से सती सीता को छुड़ाने के लिये युद्ध किया। उस भयंकर राम-रावण युद्ध में राम की विजय हुई।

जब सीता को यह सूचना दी गई कि श्री राम उसे लेने आ गए हैं तो पहले उसे यह स्वप्न-सा लगा। जब राम सीता के समीप आए, तब उन्होंने देखा कि सीता का शरीर दुर्बल हो गया था, केश बिखर गए थे, चेहरा मुरझा गया था।

वह पति को देखकर महा हर्ष को प्राप्त हुई। आंसुओं से भरे नेत्रों से उसने पति का स्वागत किया। महासती सीता और राम का मिलन देख कर देव भी प्रसन्न हो गए और आकाश  से पुष्पों की वर्षा होने लगी। देवगण श्री राम व सती सीता के गुणों का गान करने लगे - अहो! धन्य है महासती सीता का शील। इनकी अचलता, धीरता, गम्भीरता, शील व्रत की दृढ़ता, उनके निर्मल परिणाम धन्य हैं। सतियों में श्रेष्ठ है यह महासती सीता, जिसके मन में भी और स्वप्न में भी कभी राम को छोड़कर अन्य पुरुष की इच्छा नहीं आई।

लक्ष्मण ने आकर सीता के चरणों में नमस्कार किया। भाई भामंडल बहिन के समीप आए और उसे देखकर सीता ने कहा - भाई! तू कैसा है? युद्ध में तुमने महापराक्रम दिखाया है।

इस तरह हनुमान, विभीषण, नल, नील, अंगद, जामवंत, सुग्रीव आदि ने सीता के चरणों में पुष्पों की मालाएँ भेंट की। सती सीता, श्री रामचंद्र जी और लक्ष्मण विमान में बैठकर अयोध्या की तरफ चल दिए। अयोध्या पहुंच कर सबका भव्य रूप से स्वागत हुआ।

क्रमशः

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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