सीता सती (भाग - 2)

धर्म की महान् सतियों की कहानियाँ

सीता सती (भाग - 2)

अयोध्या में सुखों को भोगते हुए समय व्यतीत होने लगा। एक रात को सीता ने स्वप्न में दो सिंहो को अपने मुख में प्रवेश करते हुए तथा आकाश मार्ग से गमन करते समय एक विमान से अपना अधः पतन होते हुए देखा। तब उसने प्रातः श्री रामचंद्र जी से इसका फल पूछा और उन्होंने बताया कि तुम्हारे दो उत्तम पुत्र होंगे और साथ ही कष्ट भी होगा।

उसके बाद सीता भगवत् पूजा में तत्पर हो गई। गर्भ की अवस्था में उसको तीर्थ स्थान की वंदना का विचार हुआ। कैलाश गिरी, सम्मेद शिखर, चंपानगर, गिरनार, पावापुरी, शत्रुंजय, मांगी तुंगी, गजपंथा, बावनगजा आदि निर्वाण क्षेत्र में पूजा का विशेष आयोजन किया गया।

तत्पश्चात् अयोध्या में कुछ ऐसी घटनाएं घटी कि जिन में किसी व्यक्ति ने दुराग्रह के कारण अपनी पत्नी को ताड़ित किया और कहा कि रामचंद्र तो सीता को एक वर्ष रावण के पास रहने के बाद भी अपने साथ रखे हुए हैं, किंतु मैं ऐसा नहीं करूंगा। इस लोक अपवाद के कारण राजा रामचंद्र ने सीता को त्याग देने का निश्चय किया।

उन्होंने मंत्री को बुलाकर कहा कि सीता को क्षेत्र की वंदना करने के बहाने से ले जाओ और उसे वन में छोड़ दो।

जब वन में सीता को छोड़ा तो सीता ने इसका कारण पूछा। वह कारण सुनकर मूर्छित हो गई और बाद में सचेत होने पर बोली कि कृतांतवत! तुम जाओ और श्री राम से कहना कि मिथ्या दृष्टिजनों के भय से राजा राम ने मेरा तो परित्याग कर दिया है, पर उनके बहकावे में आकर धर्म का परित्याग न कर दें।

उधर सीता बारह भावनाओं पर विचार करती हुई उस भयानक वन में पहुंची। वन में कोई मंडलेश्वर राजा वज्रजंघ हाथी को पकड़ने के विचार से आया हुआ था। सीता को देखकर उन्हें अपनी धर्म बहिन बनाकर वह अपने नगर में ले गया और अपनी बहिन प्रभावती के साथ उन्हें छोड़ दिया। दोनों धर्म कार्य में तत्पर रहती थी।

9 महीने बाद सीता ने दो पुत्रों को जन्म दिया। राजा वज्रजंघ ने महान उत्सव किया। उसने उन दोनों पुत्रों के नाम लवकुश और मदनांकुश रखे।

बाल्यावस्था में वे दोनों आनंदपूर्वक कीड़ा करते हुए सबको प्रसन्न करते थे। धीरे-धीरे उनका शैशव काल बीत गया। दोनों को शास्त्र व शस्त्र विद्या में निपुण किया। तत्पश्चात् कुछ दिनों में वे दोनों राजा वज्रजंघ को पुण्डरीकिणी नगरी में भेज कर अपने सामर्थ्य से अनेक देशों को जीतने के लिए गए और उन्हें जीत कर महामंडल की लक्ष्मी से विभूषित होते हुए पुण्डरीकिणी नगरी में वापिस आ गए।

कुछ ही दिनों में उनको देखने के लिए वहां नारद जी आ पहुंचे। नारद जी ने दोनों को आशीर्वाद दिया और पूछा कि तुम तो रामचंद्र जी और लक्ष्मण जी जैसे दिखाई देते हो। जानते हो, यह राम और लक्ष्मण कौन हैं? तब नारद ने राम और लक्ष्मण से संबंधित सीता के हरण से लेकर उसके परित्याग तक की कथा लव-कुश को सुना दी।

उसको सुनते ही उन्हें क्रोध उत्पन्न हो गया और अपनी चतुरंगिणी सेना के साथ अयोध्या के लिए निकल पड़े। अयोध्या पहुंचकर नगर के बाहर पड़ाव डाल दिया और दूत को भेज कर युद्ध के लिए ललकारा।

राम और लक्ष्मण अपनी सेना के साथ लव और कुश के सामने पहुंच गए। लव राम के साथ युद्ध करने लगा और कुश लक्ष्मण के साथ युद्ध करने लगा। लव ने युद्ध में राम के एक-एक करके सात रथों को नष्ट कर दिया। कुश भी लक्ष्मण के साथ डटकर युद्ध करते रहे और उसने लक्ष्मण को मूर्छित कर दिया। जब लक्ष्मण को होश आया तो उसने क्रोध में चक्ररत्न को ग्रहण किया। तब सीता को भय उत्पन्न होने लगा।

लक्ष्मण ने चक्र को छोड़ दिया लेकिन चक्र सात बार उसकी परिक्रमा करके स्थिर हो गया। तब नारद जी ने लक्ष्मण को बताया कि ये दोनों सीता के पुत्र हैं। तब लक्ष्मण बहुत खुश हुआ और राम के समीप आया और उन्हें बताया कि ये दोनों सीता के ही पुत्र हैं।

राम और लक्ष्मण ने दोनों को हृदय से लगा लिया और आशीर्वाद दिया। सीता वापिस पुण्डरीकपुर चली गई। लव-कुश राम और लक्ष्मण के साथ अयोध्या नगर आ गए।

एक दिन मंत्रियों ने राम से कहा कि महा सती सीता को राजभवन में ले आएं। इस पर राम बोले कि सीता के शील को न जानकर उस पर शंकित होकर उसका परित्याग नहीं किया गया है, किंतु लोक निंदा के भय से उसका परित्याग किया है।

सीता इन सब घटनाओं के कारण विरक्त हो चुकी थी। अब उसने दीक्षा लेने का निश्चय कर लिया था। इसलिए उसने राम का आदेश स्वीकार कर लिया और पुष्पक विमान पर चढ़कर अयोध्या आ गई और रात में महेंद्र उद्यान में ठहर गई।

प्रातःकाल जिन पूजन किया और उस उद्यान में कुण्ड को खोदकर उसे चंदन गोशीर्ष आदि अनेक प्रकार के इंधनों से पूर्ण कर अग्नि से प्रज्ज्वलित किया और अपने आसन से उठकर सबके सामने उस अग्नि में प्रवेश करते हुए कहा कि यदि मैंने किसी अन्य पुरुष के विषय में मन, वचन व काया से दुष्प्रवृत्ति की हो तो यह अग्नि मुझे भस्म कर दे।

सीता पंच परमेष्ठियों का ध्यान करते हुए उस अग्नि कुंड में प्रविष्ट हो गई। यह देखकर राम मूर्च्छित हो गए, लक्ष्मण व्याकुल हो गए, लव-कुश आश्चर्यचकित हो गए। समस्त जनता ‘हा सीता! हा सीता!’ कहकर हाहाकार कर उठी।

तभी उस उद्यान में देवों का विमान आकर रुक गया और उन्होंने वह अग्निकुंड तालाब बना दिया। तालाब के भीतर उस देव ने हजारों पत्तों वाले कमल की रचना की और उसकी कर्णिका के मध्य में सिंहासन को स्थापित करके उसके ऊपर सीता को विराजमान किया। देव ने उस सिंहासन के ऊपर मणिमय मंडप का निर्माण किया।

उसके बाद हुए पंचाश्चर्य को देखकर सब लोगों को बहुत आनंद हुआ। इस प्रकार देवों से पूजित हुई सीता के पास जाकर रामचंद्र जी ने क्षमा मांगी। सीता ने कहा कि तुम्हारे प्रति मेरा क्षमा भाव ही है, किंतु जिन कर्मों ने यह सब करवाया है, उनके प्रति मेरा क्षमा भाव नहीं है। इसलिए उनको नष्ट करने के लिए अब मैं तपश्चरण की शरण लूंगी।

इस प्रकार कहते हुए सीता ने अपने केश लोंच किये। यह दृश्य देखकर रामचंद्र जी मूर्छित हो गए। मूर्च्छा के दूर होने पर सबने जिन भगवान का दर्शन किया, जिससे उनका मोह नष्ट हो गया। तब उन्होंने आर्तध्यान से रहित होकर जिन भगवान की पूजा व स्तुति की और सीता से क्षमा मांग कर नगर में वापस आ गए।

आर्यिका सीता ने 62 वर्ष तक तप किया। उसके बाद उन्होंने 33 दिन तक समाधि धारण करके शरीर को छोड़ा। वह अच्युत स्वर्ग में प्रतीन्द्र बनाकर उत्पन्न हुई। इस प्रकार वह सीता सती शील के प्रभाव से देवों द्वारा पूजित हुई।

धन्य है महासती सीता!!

फूल कभी दो बार नहीं खिलता, जन्म कभी दो बार नहीं मिलता।

यूं मिलने को मिल जाते हैं जन्म हजारों, मगर जिनधर्म बार-बार नहीं मिलता।।

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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