शांतिधारा के महत्वपूर्ण शब्दों के अर्थ
शांतिधारा के महत्वपूर्ण शब्दों के अर्थ
द्रावय - अनुसरण करो, नमोऽर्हते भगवते श्रीमते - श्रीमान अर्हन्त भगवान् को नमस्कार हो, मम पापं खण्डय -खण्डय - मेरे पापों को खण्ड-खण्ड करो, जहि दह - छोड़ो दहन करो, श्रीरस्तु वृद्धिस्तु तुष्टिरस्तु पुष्टिरस्तु शांतिरस्तु - लक्ष्मीवान होवे, विकास होवे, संतोष होवे, संवर्धन होवे, शांति होवे, कान्तिरस्तु कल्याणमस्तु - कान्ति होवे, कल्याण होवे, मंगलप्रद हो, कार्य-सिद्ध्यर्थ - कार्य सिद्धि के लिए, सर्वविध्ननिवारणार्थं - तथा सर्व विध्नों को दूर करने के लिए, श्रीमद्भगवदर्हत्सर्वज्ञ-परमेष्ठिपरमपवित्राय नमो नमः - श्री युक्त/प्रतिष्ठित/भगवान् अर्हन्त सर्वज्ञ परमेष्ठी परम/श्रेष्ठ पवित्रता की प्राप्ति के लिए नमस्कार हो, श्रीशान्तिभट्टारकपादपद्मप्रसादात् सद्धर्म श्री-बल आयुः आरोग्य ऐश्वर्य अभिवृद्धिः अस्तु - श्री शान्ति के करने वाले ऐसे श्रद्धेय के चरण कमल के प्रसाद से समीचीन धर्म, बल, आयु, निरोग, ऐश्वर्य की वृद्धि होवे, सद्धर्म-स्वशिष्य-परशिष्यवर्गाः प्रसीदन्तु नः - हम सब समीचीन धर्म वाले स्व शिष्य समूह और पर शिष्य समूह प्रसन्न होवे।
ओऽम् वृषभादयः श्रीवर्द्धमानपर्यन्ताश्च चतुर्विंशत्यर्हन्तो भगवन्तः सर्वज्ञाः परममंगलनामधेयाः - श्री वृषभनाथ से वर्द्धमान पर्यंत चौबीस अर्हन्त भगवान्, सर्वज्ञ, परम मंगल नाम वाले, इहामुत्र च सिद्धिं तन्वन्तु - इस लोक और परलोक की सिद्धि को बढ़ावें, सद्धर्मकार्येषु इहामुत्र च सिद्धिं प्रयच्छन्तु नः - समीचीन कार्यों में इस लोक व परलोक की सिद्धि को हम सबको देवें।
ओऽम् नमोऽर्हते भगवते श्रीमते श्रीमतपार्श्वतीर्थङ्कराय श्रीमद् रत्नत्रय-रूपाय दिव्यतेजोमूर्तये प्रभामण्डलमण्डिताय द्वादशगण-सहिताय अनन्त-चतुष्टय-सहिताय - अरिहंत भगवान् को नमस्कार, लक्ष्मीवान श्रीमान् पार्श्वतीर्थंकर, श्रीमान रत्नत्रय रूप, दिव्यतेज मूर्ति प्रभा मंडल से सुशोभित, द्वादशगण सहित, अनन्त चतुष्टय सहित, समवसरणकेवलज्ञान-लक्ष्मी-शोभिताय - समवशरण केवलज्ञान लक्ष्मी से सुशोभित, अष्टादशदोषरहिताय - अठारह दोष रहित षट्चत्वारिंशद् गुण-संयुक्ताय - छयालीस गुण सहित, परमपवित्राय सम्यग्ज्ञानाय - परम पवित्र सम्यग्ज्ञान, स्वयम्भुवे - स्वयम्भू के लिए, सिद्धाय बुद्धाय परमात्मने - सिद्ध बुद्ध परमात्मा के लिए, परमसुखाय त्रैलोक्यमहिताय - परम सुख त्रैलोक्य पूज्य, अनंत-संसार-चक्रप्रमर्दनाय - अनंत संसारचक्र का प्रमर्दन करने वाले, अनंत-ज्ञानदर्शनवीर्यसुखास्पदाय - अनंत ज्ञान दर्शन वीर्य सुख को प्राप्त करने वाले, त्रैलोक्यवशंकराय - तीनों लोकों को वश में करने वाले, सत्यज्ञानाय - सत्य ज्ञान के धारक, सत्यब्रह्मणे - सत्य ब्रह्म रूप, उपसर्गविनाशनाय - उपसर्ग के विनाशक, घातिकर्मक्षयङ्कराय - घातिकर्म के क्षय करने वाले, अजराय - बुढ़ापा रहित, अभवाय - जन्म रहित, अस्माकं - हमारी, व्याधिं ध्नन्तु - पीड़ा नष्ट करें, श्रीजिनाभिषेकपूजनप्रसादात् - श्री जिन अभिषेक पूजन के प्रसाद से, सेवकानां - सेवकों का, सर्वदोषरोगशोकभयपीड़ा विनाशनं भवतु - सभी दोष, रोग, शोक, भय, पीड़ा का विनाश होवे।
ओऽम् नमोऽर्हते भगवते - अरिहंत भगवान् को नमस्कार हो, प्रक्षीणाशेष-दोष-कल्मषाय - जिन्होंने सम्पूर्ण दोष रूपी पाप को नष्ट कर दिया है, दिव्य-तेजोमूर्तये - दिव्य तेज की मूर्ति, श्रीशान्तिनाथाय - ऐसे शान्तिनाथ जो शान्ति के करने वाले हैं, सर्वविध्नप्रणाशनाय - सर्वविध्न नाशक तथा, सर्वरोग अपमृत्युविनाशनाय - सभी रोग, अकस्मात् दुर्घटना से होने वाली मृत्यु के नाशक, सर्वपरकृतक्षुद्रोपद्रव-विनाशनाय - सभी दूसरों के द्वारा किए गए क्षुद्र उपद्रव के नाशक, सर्वारिष्टशान्तिकराय - सभी पीड़ाओं की शान्ति करने वाले, सर्व विघ्नशान्तिं कुरु कुरु - मेरे सभी विध्नों की शान्ति करो करो, तुष्टिं पुष्टिं च कुरु कुरु स्वाहा - सन्तोष, संवर्धन करो करो, मम कामं - मेरी कामना छिन्धि छिन्धि, भिन्धि भिन्धि - खण्ड खण्ड हो जाए, नष्ट हो जाए नष्ट हो जाए, बलिकामं - नैवेद्य/रसना एवं अन्य काम सम्बन्धी इच्छा, क्रोधं पापं वैरं च - क्रोध, पाप और वैर, अग्निवायुभयं - अग्नि व वायु का भय, सर्वशत्रुविध्नं - सभी शत्रु सम्बन्धी विध्न, सर्वोपसर्गं - सभी उपसर्ग, सर्व विध्नं - सभी विध्न, सर्व-राजभयं - सभी राज्य भय, सर्वचौरदुष्टभयं - सभी चोर, दुष्ट भय, सर्वसर्प-वृश्चिकसिंहादिभयं - सभी सर्प, बिच्छू, सिंहादि का भय, सर्वग्रहभयं - सभी ग्रहों का भय, सर्वदोषं व्याधिं डामरं च - सभी दोष और भयानक रोग, सर्वात्मघातं परघातं च - सभी आत्मघातक और पर घातक मंत्र, सर्वशूलरोगं कुक्षिरोगं अक्षिरोग शिरोरोगं ज्वररोगं च - सभी तीव्र पीड़ा और पेट के रोग, नेत्र रोग, शिरोरोग, ज्वर रोग, सर्वनरमारिं - सभी मनुष्य संबंधी महामारी, सर्व-गजाश्च-गोमहिषाजमारिं - सभी हाथी, घोड़ा, गाय, भैंस, बकरा की महामारी, सर्व सस्यधान्य-वृक्षलता-गुल्मपत्रपुष्पफलमारिं - सभी अनाज, धान, वृक्ष, लता, वृक्ष के झुंड, पत्र, पुष्प, फल संबन्धी संक्रामक रोग, सर्वराष्ट्रमारिं - सभी राष्ट्र में व्याप्त महामारी, सर्वक्रूरवेताल-शाकिनीडाकिनीभयानि - सभी दुष्ट वेताल पिशाचनी, भूतनी के भय, सर्ववेदनीयं - सभी वेदनीय यानी वेदना सम्बन्धी कर्म, सर्वमोहनीयं - सभी विषयासक्ति सम्बन्धी कर्म, सर्वापस्मारिं - सभी मिर्गी के रोग, अशुभकर्मजनितदुःखानि - अशुभ कर्म से उत्पन्न हुए दुःख, दुष्टजनकृतान् मन्त्रतन्त्रदृष्टि-मुष्टिछलछिद्रदोषिन् - दुष्ट जन के द्वारा किए हुए मंत्र-तंत्र, दृष्टि सम्बन्धी, मूठ सम्बन्धी छल छिद्र दोष, सर्वदुष्टदेव-दानव-वीर-नरनाहर-विष-भयानि - सभी दुष्ट देव, दानव, वीर, नर, नाहर, सिंह, जादू की शक्ति से किए गए दोष, सर्वाष्टकुलीन-नागजनित-विष-भयानि - सभी अष्टकुली सर्प से उत्पन्न विष संबंधी भय, सर्वस्थावरजंगमवृश्चिक-सर्पादिकृतदोषान् - सभी स्थावर, त्रस, बिच्छू, सर्पादि के द्वारा किए गए दोष, सर्वसिंह-अष्टापदादिकृत-दोषान् - सभी सिंह, अष्टापद आदि द्वारा किए गए दोष, परशत्रुकृतमारणोच्चाटनविद्वेषणमोहन-वशीकरणादिदोषान् - पर शत्रु के द्वारा किए गए मारण, उच्चाटन, विद्वेषण, मोहन, वशीकरण आदि दोष, चक्रविक्रमसत्त्वतेजोबलशौर्यवीर्यशान्तीः पूरय पूरय - सेना, वीरता, सत्ता, तेज, बल, शौर्य, वीर्य आदि की शान्ति करो पूर्ण करो, सर्वजीवानन्दनं कुरु कुरु - सभी जीवों को आनन्द प्रदान करो, जनानन्दनं भव्यानन्दनं - सभी मनुष्यों को आनन्द सभी भव्यों को आनन्द, गोकुलानंदनं सर्वाराजानन्दनं - सभी गौपालक को आनन्द सभी राजाओं को आनन्द, सर्वग्राम-नगर-खेड़ा-कर्वट-मण्ड-पत्तन-द्रोणमुख-संवाहनानन्दनं कुरु कुरु स्वाहा - सभी ग्राम, नगर, खेड़ा, कर्वट, मण्ड, ,पत्तन, द्रोणमुख, संवाहनों में आनन्द करो।
यत्सुखं त्रिषु लोकेषु - जो सुख तीनों लोकों में, व्याधिव्यसन वर्जितम् - व्याधि व्यसन से रहित कहा है, अभयं क्षेममारोग्यं - वह अभय, क्षेम, आरोग्य, स्वस्तिरस्तु विधीयते - कल्याण करने वाला होवे, ऐसा जानना चाहिए।
श्री शान्तिरस्तु शिवमस्तु जयोस्तु नित्यमारोग्यमस्तु - शान्ति होवे, कल्याण होवे, जय होवे हमेशा आरोग्य लाभ होवे, अस्माकं - हमारी, तुष्टिरस्तु पुष्टिरस्तु समृद्धिरस्तु कल्याणमस्तु सुखमस्तु अभिवृद्धिरस्तु दीर्घायुरस्तु - सन्तोष होवे, संवर्धन होवे, समृद्धि होवे, कल्याण होवे, सुख होवे, अभिवृद्धि होवे, दीर्घ आयु होवे, कुल-गोत्रधनानि सदा सन्तु - कुल-गोत्र-धन हमेशा होवे, सद्धर्मश्रीबलायु-आरोग्यैश्चर्याभिवृद्धिरस्तु - समीचीन धर्म, लक्ष्मी, बल, आयु, आरोग्य और ऐश्वर्य से वृद्धि होवे।
आयुर्वल्लीविलासं - आयु रूपी लता का विकास हो, सकल-सुख-फलैद्रार्घयित्वाश्चनल्पं - सम्पूर्ण सुख के फलों के द्वारा शीघ्र अत्यधिक विस्तार होकर, धीरं वीरं गभीरं - धीर वीर महत्ता के, निरुपममुपनयत्वात-नोत्वच्छकीर्तिम् - उपमा रहित स्थान को प्राप्त हो, स्वच्छ कीर्ति, सिद्धिं वृद्धिं समृद्धिं - सिद्धि, वृद्धि, समृद्धि, प्रथयतु - विस्तार को प्राप्त होवे, तरणिः स्फूर्यदुच्चैः प्रतापं - जैसे सूर्य की जाज्वल्यमान कान्ति/प्रकाश ऊंचाई पर होती है वैसी, जगतामुत्तमा शान्तिधारा - जगत् में उत्तम शान्तिधारा, सिद्धिं वृद्धिं समृद्धि कान्तिं शान्तिं समाधिं - सिद्धि, वृद्धि, समृद्धि, कान्ति, शान्ति, समाधि का, वितरतु - बिखरे अथवा विस्तार होवे।
भगवान् जिनेन्द्रः - भगवान् जिनेन्द्र, सम्पूजकानां - सम्यक् प्रकार से पूजा करने वालों की, प्रतिपालकानां - धर्मायतनों की रक्षा करने वालों की, यतीन्द्र सामान्य तपोधनानां - मुनीन्द्र आचार्य तथा सामान्य तपस्वी मुनियों की तथा, देशस्य राष्ट्रस्य पुरस्य राज्ञः - देश, राष्ट्र, नगर और राजा की, शान्तिं करोतु - शान्ति करो।
।। इति बृहत् शान्तिधारा।।
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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