भगवान महावीर स्वामी (58)
तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (58) इन्द्रभूति-गौतम के अतिरिक्त उनके दो भाई अग्निभूति और वायुभूति तथा शुचिदत्त, सुधर्म, मांडव्य, मौर्यपुत्र, अकम्पन, अचल, मेदार्य एवं प्रभास, - ऐसे कुल 11 गणधर महावीर प्रभु के थे। अब, वे गौतमस्वामी वीर प्रभु के समवसरण में अचानक कैसे आ पहुँचे? उसकी रोमांचक कथा सुनो। ऋजुकूला नदी के तट पर वीर प्रभु को केवलज्ञान हुआ, समवसरण की रचना हुई, किन्तु 66 दिन तक दिव्यध्वनि नहीं खिरी; विहार करते-करते प्रभु राजगृही में विपुलाचल पर पधारे। छियासठ दिन बीत जाने पर भी भगवान का उपदेश क्यों नहीं हुआ? भगवान तो तीर्थंकर हैं, इसलिए दिव्यध्वनि के उपदेश द्वारा तीर्थप्रवर्तन हुए बिना नहीं रह सकता; किन्तु इतना विलम्ब क्यों? भव्यजीव वाणी सुनने के लिये प्यासे चातक की भाँति आतुर हो रहे हैं। अन्त में इन्द्र का धैर्य समाप्त हुआ; उसने दिव्यज्ञान से देखा कि तीर्थकर देव के धर्मोपदेश के समय जिसकी अनिवार्य उपस्थिति होनी चाहिए, ऐसा कोई गणधर इस सभा में उपस्थित नहीं है। वह गणधर होने वाला जीव तो इस समय वेद-वेदान्त में पारंगत महापण्डित के रूप में गौतमग्राम (गुणावा नगरी) में बैठा है; ऐसा ...