छहढाला(40)
अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत
छहढाला(40)
अनर्थदण्डव्रत के भेद और उनका लक्षण
काहूँकी धनहानि, किसी जय हार न चिन्तै;
देय न सो उपदेश, होय अघ बनज कृषि तैं ॥ १२ ॥ (उत्तरार्द्ध)
कर प्रमाद जल भूमि वृक्ष पावक न विराधै;
असि धनु हल हिंसोपकरण नहिं दे यश लाधै।
राग-द्वेष-करतार, कथा कबहुँ न सुनीजै;
और हु अनरथ दंड, हेतु अघ तिन्हें न कीजै ॥ १३ ॥
अन्वयार्थः-१- (काहूकी) किसी के (धनहानि ) धन के नाश का, (किसी) किसी की (जय) विजय का अथवा (हार) किसी की हार का (न चिन्तै) विचार न करना उसे अपध्यान-अनर्थदंडव्रत कहते हैं। २-(वनज) व्यापार और (कृषि तैं) खेती से (अघ) पाप (होय) होता है; इसलिये (सो) उसको (उपदेश) उपदेश (न देय) न देना, उसे पापोपदेश-अनर्थदंड व्रत कहा जाता है। ३-(प्रमाद कर) प्रमाद से विना प्रयोजन (जल) जलकायिक, (भूमि) पृथ्वीकायिक, (वृक्ष) वनस्पति- कायिक, (पावक) अग्निकायिक और वायुकायिक जीवों का (न विराधै) घात न करना, सो प्रमादचर्या-अनर्थदंडव्रत कहलाता है। ४-(असि) तलवार, (धनु) धनुष्य, (हल) हल आदि (हिंसोपकरण) हिंसा होने में कारणभूत पदार्थों को (दे) देकर (यश) यश (नहि लाधै) न लेना, सो हिंसादान-अनर्थदंडव्रतकहलाता है। ५- (राग-द्वेष-करतार) राग और द्वेष उत्पन्न करने वाली (कथा) कथाएँ (कबहूँ) कभी भी (न सुनीजें) नहीं सुनना, सो दुःश्रुति अनर्थदंडव्रत कहा जाता है। (और हु) तथा अन्य भी (अघहेतु) पाप के कारण (अनरथ दंड) अनर्थदंड हैं (तिन्हैं) उन्हें भी (न कीजें) नहीं करना चाहिये।
भावार्थः--किसी के धन का नाश, पराजय अथवा विजय आदि का विचार न करना, सो पहला अपध्यान-अनर्थदंडव्रत कहलाता है।
(१) हिंसारूप पापजनक व्यापार तथा खेती आदि का उपदेश न देना वह पापोपदेश-अनर्थदंडव्रत है।
(२) प्रमादवश होकर पानी ढोलना, जमीन खोदना, वृक्ष काटना, आग लगाना-इत्यादि का त्याग करना अर्थात् पांच स्थावर-काय के जीवों की हिंसा न करना उसे प्रमादचर्या-अनर्थदंडव्रत कहते हैं।
(३) यश प्राप्ति के लिये, किसी के माँगने पर हिंसा के कारणभूत हथियार न देना, सो हिंसादान-अनर्थदंडव्रत कहलाता है।
(४) राग-द्वेष उत्पन्न करने वाली विकथा और उपन्यास या शृंगारिक कथाओं के श्रवण का त्याग करना सो दुःश्रुति-अनर्थदंडव्रत कहलाता है ।। १३ ।।
अनर्थदंड दूसरे भी बहुत-से हैं। पाँच तो स्थूलता की अपेक्षा से अथवा दिग्दर्शनमात्र हैं। वे सब पापजनक हैं इसलिये उनका त्याग करना चाहिये। पापजनक निष्प्रयोजन कार्य अनर्थदंड कहलाता है।
निश्चय सम्यग्दर्शन-ज्ञानपूर्वक, पहले दो कषायों का अभाव हुआ हो, उस जीव को सच्चे अणुव्रत होते हैं, निश्चय सम्यग्दर्शन न हो उसके व्रत को सर्वज्ञदेव ने बालव्रत कहा है ।
1 - बिना प्रयोजन मन-वचन-काय की अशुभ प्रवृत्तियों का त्याग करना कौन-सा व्रत है? (अनर्थदण्डत्याग अणुव्रत)
2- किसी के धन का नाश या जय-पराजय का विचार न करना कौन-सा व्रत है? (अपध्यान अनर्थदण्डत्याग अणुव्रत)
3- हिंसाजनक व्यापार तथा खेती आदि का उपदेश न देना किस अनर्थदण्डत्यागव्रत के अन्तर्ग्त आता है?(पापोपदेश)
4- बिना प्रयोजन एकेन्द्रिय जीव का घात न करना किस अनर्थदण्डत्यागव्रत के अन्तर्गत आता है? (प्रमादचर्या)
5- किसी के मांगने पर हिंसा के उपकरण दे कर यश न लेना किस अनर्थदण्डत्यागव्रत के अन्तर्गत आता है? (हिंसादान)
6- राग-द्वेष उत्पन्न करने वाली कथाएं न सुनना किस अनर्थदण्डत्यागव्रत के अन्तर्गत आता है? (दुःश्रुति)
7 - अनर्थदण्ड किस कर्म का कारण है? (पापजनक कर्म का)
8 -अनर्थदण्ड कर्म कैसा है? (हेय)
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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