छहढाला(41)
अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत
छहढाला(41)
सामायिक, प्रोषध, भोगोपभोगपरिमाण और अतिथिसंविभागव्रत
धर उर समताभाव, सदा सामायिक करिये,
परव चतुष्टयमांहि, पाप तज प्रोषध धरिये;
भोग और उपभोग, नियमकरि ममत निवारै,
मुनिको भोजन देय फेर, निज करहि अहारै ।। १४ ।।
अन्वयार्थ:- (उर) मन में (समताभाव) निर्विकल्पता अर्थात् शल्य के अभाव को (धर) धारण करके (सदा) हमेशा (सामायिक) सामायिक (करिये) करना, सो सामायिक शिक्षाव्रत है; (परव चतुष्टयमांहि ) चार पर्व के दिनों में (पाप) पापकार्यों को छोड़कर (प्रोषध) प्रोषधोपवास (धरिये) करना, सो प्रोषध उपवास शिक्षा-व्रत है; (भोग) एक बार भोगा जा सके, ऐसी वस्तुओं का तथा (उपभोग) बारम्बार भोगा जा सके, ऐसी वस्तुओं का (नियमकरि) परिमाण करके --मर्यादा रखकर (ममत) मोह (निवारि) छोड़ दे, सो भोग-उपभोगपरिमाणव्रत है; (मुनिको) वीतरागी मुनि को (भोजन) आहार (देय) देकर (फेर) फिर (निज अहारै) स्वयं भोजन करे, सो अतिथिसंविभागव्रत कहलाता है ।
भावार्थः-- स्वोन्मुखता द्वारा अपने परिणामों को स्थिर करके प्रतिदिन विधिपूर्वक सामायिक करना सो सामायिक शिक्षाव्रत है । १ । प्रत्येक अष्टमी तथा चतुर्दशी के दिन कषाय और व्यापारादि कार्यों को छोड़कर (धर्मध्यानपूर्वक) प्रोषधसहित उपवास करना, सो प्रोषधोपवास शिक्षाव्रत कहलाता है । २ । परिग्रहपरिमाण--अणुव्रत में निश्चय की हुई भोगोपभोग की वस्तुओं में जीवनपर्यन्त के लिये अथवा किसी निश्चित समय के लिये नियम करना सो भोगोपभोगपरिमाण शिक्षाव्रत कहलाता है । ३ । निर्ग्रन्थ मुनि आदि सत्पात्रों को आहार देने के पश्चात् स्वयं भोजन करना सो अतिथिसंविभाग शिक्षाव्रत कहलाता है ।। १४ ।।
निरतिचार श्रावकव्रत पालन करने का फल
बारह व्रत के अतीचार, पन पन न लगावै;
मरण-समय संन्यास धारि तसु दोष नशावै;
यों श्रावक-व्रत पाल, स्वर्ग सोलह उपजावै;
तहँतैं चय नरजन्म पाय, मुनि है शिव जावै ।। १५ ।।
अन्वयार्थः--- जो जीव (बारह व्रतके) बारह व्रतों के (पन पन) पाँच-पाँच (अतिचार) अतिचारों को (न लगावै) नहीं लगाता, और (मरण-समय) मृत्यु-काल में (संन्यास) समाधि (धार) धारण करके (तसु) उनके (दोष) दोषों को (नशावै) दूर करता है, वह (यों) इस प्रकार (श्रावक व्रत) श्रावक के व्रत (पाल) पालन करके (सोलह) सोलहवें (स्वर्ग) स्वर्ग तक (उपजावै) उत्पन्न होता है, और (तहँतैं) वहाँ से (चय) मृत्य प्राप्त करके (नरजन्म) मनुष्यपर्याय (पाय) पाकर (मुनि) मुनि (ह्वै) होकर (शिव) मोक्ष (जावै) जाता है।
भावार्थः-- जो जीव श्रावक के ऊपर कहे हुए बारह व्रतों का विधिपूर्वक जीवनपर्यन्त पालन करते हुए उनके पांच-पांच अतिचारों को भी टालता है, और मृत्युकाल में पूर्वोपार्जित दोषों का नाश करने के लिये विधिपूर्वक समाधिमरण (सल्लेखना) धारण करके उसके क्रोधादि के वश होकर विष, शस्त्र अथवा अन्नत्याग आदि से प्राणत्याग किया जाता है उसे 'आत्मघात' कहते हैं । सल्लेखना में सम्यग्दर्शन सहित आत्मकल्याण ( धर्म ) के हेतु से काया और कषाय को कृश करते हुए सम्यक् आराधनापूर्वक समाधिमरण होता है, इसलिये यह आत्मघात नहीं, किन्तु धर्मध्यान है ।पांच अतिचारों से भी दूर करता है वह आयु पूर्ण होने पर मृत्यु प्राप्त करके सोलहवें स्वर्ग तक उत्पन्न होता है। फिर देवायु पूर्ण होने पर मनुष्य भव पाकर, मुनिपद धारण करके मोक्ष (पूर्ण शुद्धता) प्राप्त करता है।
सम्यक् चारित्र की भूमिका में रहने वाले राग के कारण वह जीव स्वर्ग में देवपद प्राप्त करता है; धर्म का फल संसार की गति नहीं है किन्तु संवर-निर्जरारूप शुद्धभाव है। धर्म की पूर्णता यह मोक्ष है ।
1 - समताभाव धारण करके सामायिक करना किस शिक्षाव्रत के अन्तर्गत आता है? (सामायिक)
2 - एक माह में पर्व के दिन कौन से हैं? (अष्टमी-चतुर्दशी)
3 - पर्व के दिनों में कौन से कार्य छोड़ने योग्य हैं? (पाप कार्य)
4 - प्रोषधोपवास करना किस व्रत के अन्तर्गत आता है? (प्रोषधोपवास शिक्षाव्रत)
5 - जिस वस्तु को एक बार भोग जाए, उसे क्या कहते हैं? (भोग)
6- जिस वस्तु को बार-बार भोग जाए, उसे क्या कहते हैं? (उपभोग)
7 - भोगोपभोग की मर्यादा रख कर वस्तुओं के प्रति मोह छोड़ देना किस व्रत के अन्तर्गत आता है? (भोगोपभोग परिमाण शिक्षाव्रत)
8 - मुनि को आहार देकर स्वयं भोजन करना किस व्रत के अन्तर्गत आता है? (अतिथिसंविभाग शिक्षाव्रत)
9 - छहढाला के अनुसार कितने व्रत होते हैं? (12)
10 - व्रतों में लगने वाले अतिचारों की संख्या कितनी है? (5)
11 - जो श्रावक व्रतों में अतिचार न लगने दे और व्रतों का पालन करे, वह कौन-से स्वर्ग तक उत्पन्न होता है? (16वें)
12- सोलहवें स्वर्ग से मरण करके मनुष्य पर्याय में जन्म लेने वाला जीव निश्चय से क्या प्राप्त करता है? (मोक्ष)
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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