भवसागर में

भवसागर में



भवसागर में दुःख न मिलता, तेरी शरण में आता क्यों? 

शरण में आकर सुख न मिलता, तेरी शरण में आता क्यों?

सच कहता हूँ मेरे भगवन्, नहीं मैं प्रेम से आया हूँ,

विपदाओं ने मुझको घेरा, व्यथा सुनाने आया हूँ।

गर्मी जिसको नहीं सताती, वृक्ष के नीचे आता क्यों?

भवसागर में दुःख......

तुम तो सुख के सागर गुरुवर!, दो बूंद मिल जाएंगी,

जाने वाली अंतिम श्वासें, कुछ पल को रुक जाएंगी।

नदियों में यदि जल न होता, हंस बैठने आता क्यों?

भवसागर में दुःख.....

जो कुछ तुम्हें सुनाया भगवन्!, वो मेरी मजबूरी है,

जो कुछ करना चाहो गुरुवर!, करना बहुत ज़रूरी है।

दूध यदि माँ नहीं पिलाती, बच्चा रुदन मचाता क्यों?

भवसागर में दुःख....

भीख नहीं मैं मांग रहा हूँ, ना ही कोई भिखारी हूँ,

स्वामी सेवक को देता है, मैं तो भक्त पुजारी हूँ।

जितना नीर लुटाता बादल, उतना ऊपर जाता क्यों?

भवसागर में दुःख.... 

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा - सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

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