जिनवर का दरबार है-आरती भक्तामर जी की

 मंगल आरती भक्तामर जी की

Sung by & Bindu Jain, Delhi.

तर्ज - भव सागर अपार है.........

जिनवर का दरबार है, नमन करें शतबार हैं।

भक्तामर की देखो कैसी, महिमा अपरम्पार है।।टेक।।

मंगल आरती लेकर प्रभु जी, आया तेरे द्वार जी।

भक्तामर का पाठ करे जो, होगा बेड़ा पार जी।।

यही जगत का सार है, झूठा सब संसार है।

भक्तामर की देखो...........।।

चौबीसों जिन, पंच परम गुरु, रत्नत्रय उर धार जी।

अवधि ऋद्धिधारक ऋषिगण को, भक्ति सहित शिर धार जी।।

यही गले का हार है, मानव का शृंगार है।

भक्तामर की देखो...........।।

इक दिन तेरा यह तन चेतन, मिट्टी में मिल जाएगा।

भक्तामर का ध्यान धरे जो, मानतुंग बन जाएगा।।

मूल मंत्र आधार है, बीज मंत्र साकार है।

भक्तामर की देखो...........।।

यह तन तेरा इक दिन चेतन, अग्नि में जल जाएगा।

‘अभयमती’ कहे जप तप करले, नहिं पीछे पछताएगा।।

प्रभु की भक्ति अपार है, पावे मुक्ति सार है।

भक्तामर की देखो कैसी, महिमा अपरम्पार है।।टेक।

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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