लघु शांतिनाथ पूजन विधान

लघु शांतिनाथ पूजन विधान (रचनाकार - मुनि श्री सुव्रतसागर जी)


सिद्ध शिला वासी हे भगवन्!  तुमको आज बुलाऊं मैं,

स्वार्थ के सारे नाते हैं, हे सिरताज भुलाऊं मैं।

भक्ति भाव के उर आसन पर, श्रद्धा सहित बिठाऊं मैं,

भक्ति भावना पूरी करिए, सुर संगीत रिझाऊं मैं।

नाना वाद्य बजाऊं मैं, शांतिनाथ गुण गाऊं मैं, बार बार सिर नवाऊं मैं।

ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथ  जिनेन्द्र सर्व कर्म  बंधन विमुक्त सकल विघ्न  शांतिकर सम्पूर्णोत्तम मंगलप्रद! हे पंचमचक्रेश्वर! अत्र अवतर अवतर संवौषट्! (आह्वाननम्)

ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथ  जिनेन्द्र सर्व कर्म  विमुक्त सकल विघ्न  शांतिकर सम्पूर्णोत्तम मंगलप्रद! हे द्वादश कामदेवेन्द्र! अत्र तिष्ठ! तिष्ठ! ठ:! ठ! (स्थापनम्)

ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथ  जिनेन्द्राय सर्व कर्म  बंधन विमुक्त सकल विघ्न  शांतिकर सम्पूर्णोत्तम मंगलप्रद! हे षोडश तीर्थंकर! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्! (सन्निधिकरणम्) पुष्पांजलिं

वापी कूप सरोवर सिंधु का जल, कहां से लाऊं मैं।

युगल नयन का नीर हे भगवन्! तव पद पद्म चढ़ाऊं मैं।

शांतिनाथ शांति के दाता, सर्व अशांति दूर करो।

विघ्न  उपद्रव रोग नष्ट कर, सुख शांति भरपूर करो।।

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः जगदापविनाशनाय ह्रीं शांतिनाथाय जन्म जरा मृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति  स्वाहा।                          

 काश्मीर केशर हे भगवन्! बोलो कहां से लाऊं मैं।

 त्रय पद धारी प्रभु! भक्ति रंग, तुम पद कमल लगाऊं मैं,

शांतिनाथ शांति के दाता, सर्व  अशांति दूर करो।

विघ्न  उपद्रव रोग नष्ट कर, सुख शांति भरपूर करो।।

ॐ भ्रां भ्रीं भ्रूं भ्रौं भ्रः जगदापविनाशनाय ह्रीं शांतिनाथाय संसार ताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति  स्वाहा।                              

धवल अखंडित  सौरभ मंडित, तंदुल अंगुल सम लाया,

अक्षय पद पाने हे भगवन्! तव पद मेरे मन भाया।

शांतिनाथ शांति के दाता, सर्व  अशांति दूर करो।

विघ्न  उपद्रव रोग नष्ट कर, सुख शांति भरपूर करो।।

ॐ म्रां म्रीं म्रूं म्रौं म्रः जगदापविनाशनाय ह्रीं शांतिनाथाय अक्षय पद प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति  स्वाहा।

 मन संयम के सुमन सुगंधित, सुमन नाथ तव ढिंग लाया,

पुनर्जन्म  का बीज नष्ट  हो, मिले न कामदेव  काया। 

शांतिनाथ  शांति के दाता, सर्व  अशांति दूर करो,

विघ्न उपद्रव रोग नष्ट कर,  सुख शांति भरपूर  करो।

ॐ रां रीं रूं रौं रः जगदापविनाशनाय ह्रीं शांतिनाथाय कामबाण विध्वंसनाय पुष्प निर्वपामीति स्वाहा।    

ज्ञानामृत भोजन पाने को, नानाविध  व्यंजन लाया।

क्षुधा पिशाची  सद्य नष्ट हो, पड़े  नहीं उसकी छाया।

शांतिनाथ  शांति के दाता, सर्व  अशांति दूर करो,

विघ्न उपद्रव रोग नष्ट कर, सुख शांति भरपूर  करो।

ॐ घ्रां घ्रीं घ्रूं घ्रौं घ्रः जगदापविनाशनाय ह्रीं शांतिनाथाय क्षुधा-रोग  विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।                         

आत्म-ज्ञान का दीप जलाने, ध्यान दीप मैं ले आया।

मोह तिमिर  नश जाए मेरा, प्रभु चरणों माथा नाया।

शांतिनाथ  शांति के दाता, सर्व अशांति दूर करो,

विघ्न उपद्रव रोग नष्ट कर, सुख शांति भरपूर  करो।

ॐ  झ्रां झ्रीं  झ्रूं झ्रौं झ्रः जगदापविनाशनाय ह्रीं शांतिनाथाय महामोहांधकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

दश  विध धूप मनोज्ञ बनाकर, तुम सन्मुख मैं खेता हूँ।

 पाप नष्ट  कर पुण्य  बढ़ाकर, मुक्ति पद वर लेता हूँ।

शांतिनाथ  शांति के दाता, सर्व  अशांति दूर करो,

विघ्न उपद्रव रोग नष्ट कर, सुख शांति भरपूर  करो।

ॐ स्रां स्री स्रूं स्रौं स्रः  जगदापविनाशनाय ह्रीं शांतिनाथाय अष्ट कर्म  विनानाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।                                     

पाप पुण्य फल भव पाए, पर मुक्ति का फल मिला नहीं,

जिस को पाकर संतुष्टि हो, आतम अब तक खिला नहीं।

अब मोक्ष परम पद पाने को,  मैं लोकोत्तम फल लाया हूँ।

चतुर्गति के दुःख मिटें, शाश्वत सुख पाने आया हूँ।

शांतिनाथ  शांति के दाता, सर्व  अशांति दूर करो,

विघ्न उपद्रव रोग नष्ट कर, सुख शांति भरपूर  करो।

ॐ ख्रां ख्रीं ख्रूं ख्रौं ख्रः जगदापविनाशनाय ह्रीं शांतिनाथाय महामोक्ष पद प्राप्ताय फलं  निर्वपामीति स्वाहा।                               

समकित दर्शन  ज्ञानादि गुण, पाने अर्घ्य समर्पित है।  

राग द्वेष  मद मोह त्याग  कर, पावन तन मन अर्पित  है।

शांतिनाथ  शांति के दाता, सर्व  अशांति दूर करो,

विघ्न उपद्रव रोग नष्ट कर,  सुख शांति भरपूर  करो।

ॐ अ ह्रां सि ह्रीं आ ह्रूं उ ह्रौं सा ह्रः जगदापविनाशनाय ह्रीं शांतिनाथाय अनर्घ्य पद प्राप्तये फलं  निर्वपामीति स्वाहा।

शत इन्द्रों से पूजित शांति प्रभु, नमन आपको करता हूं।

कल्पतरु के सुमन  सुगंधित, तुम  चरणों में धरता हूँ।

पुष्पांजलिं क्षिपेत्।

श्री पंच कल्याणक अर्घ्य

कृष्ण  सप्तमी भाद्र को, तजकर स्वर्ग विमान।

ऐरा माँ के गर्भ  में, वसे शांति भगवान ।।  

ॐ ह्रीं  भाद्रकृष्ण सप्तम्यां गर्भ मङ्गल मण्डिताय श्री शांतिनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

चौदह कृष्णा ज्येष्ठ को, जन्मे शांति विराट।                            

विश्व सेन के आंगने, ज्ञान  बताशा बांट।।                        

ॐ ह्रीं  ज्येष्ठकृष्ण चतुर्दश्यां जन्म मङ्गल मण्डिताय श्री शांतिनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।    

जन्म तिथि में तप धरे, तजे अशांति शोर।                  

शांतिनाथ मुनि को हुई,  नमोस्तु चारों ओर।।                    

ॐ ह्रीं  ज्येष्ठकृष्ण चतुर्दश्यां तपो मङ्गल मण्डिताय श्री शांतिनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

दशमी शुक्ला पौष में, पाया केवलराज।              

नमन शांति अर्हन्त को, करती भक्त समाज ।।            

ॐ ह्रीं  पौष शुक्ल दशम्यां ज्ञान मङ्गल मण्डिताय श्री शांतिनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

चौदश कृष्णा ज्येष्ठ  को, मोक्ष  गए  शान्तीश।         

कुन्द प्रभ कूट शाश्वत गिरि, को वंदन नत शीष।।            

ॐ ह्रीं  ज्येष्ठकृष्ण चतुर्दश्यां मोक्ष मङ्गल मण्डिताय श्री शांतिनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

अर्घ्यावली प्रारम्भ

शोक रहित हे शांतिनाथ,  यह तरु अशोक मन भाता है।   

हं बीजाक्षर सहित  पूजते, तन-मन शांति पाता है।।

ॐ ह्रीं  श्री शांतिनाथाय अशोक तरु सत् प्रातिहार्य मंडिताय अशोक  तरु युक्त  शोभन पद प्रदाय ह्म्ल्व्य्रूं बीजाय सर्वोपद्रव शांतिकराय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

सुर पुष्प  वृष्टि

 कामदेव हे शांतिनाथ,  सुर सुमन सुमन वर्षा करते।

भं  बीजाक्षर पूजा करते,  यश सुखमय जीवन  भरते।।

ॐ ह्रीं  श्री शांतिनाथाय सुर पुष्प  वृष्टि सत् प्रातिहार्य मंडिताय सुर पुष्प  वृष्टि शोभन पद प्रदाय भ्म्ल्व्य्रूं बीजाय सर्वोपद्रव शांतिकराय  अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।             

 दिव्य ध्वनि 

कोटि वाद्य ध्वनि से मनहर, दिव्य  ध्वनि है जिनवर की।

मं  बीजाक्षर सहित  पूजते, कृपा दृष्टि हो प्रभुवर की।।

श्री शांतिनाथाय दिव्य  ध्वनि सत् प्रातिहार्य मंडिताय दिव्य  ध्वनि शोभन पद प्रदाय म्म्ल्व्य्रूं बीजाय सर्वोपद्रव शांतिकराय  अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

चामर 

चौसठ चँवर ढुराते सुरगण, भविजन ऊर्ध्व गमन करते।

रं बीजाक्षर  सहित  पूजते, मुक्तिवधु मुनिजन वरते।।

ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथाय चमरोज्ज्वल  सत् प्रातिहार्य मंडिताय चमरोज्ज्वल शोभन पद प्रदाय रर्म्ल्व्य्रूं बीजाय सर्वोपद्रव शांतिकराय  अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

सिंहासन

सप्त भयों से रहित  शांति प्रभु, सिंहासन पर राज रहे।

घं बीजाक्षर  सहित  पूजते, भव्य मुक्तिपद साज रहे।।

ॐ ह्रीं  श्री शांतिनाथाय सिंहासन सत् प्रातिहार्य मंडिताय सिंहासन शोभन पद प्रदाय घ्म्ल्व्य्रूं बीजाय सर्वोपद्रव शांतिकराय  अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

भामण्डल

भामण्डल में सप्त भवों को, भव्य  जीव प्रभु देख रहे।

झं   बीजाक्षर सहित  पूजते, मोक्ष  महल के लेख रहे।।

ॐ ह्रीं  श्री शांतिनाथाय भामण्डल सत् प्रातिहार्य मंडिताय भामण्डल शोभन पद प्रदाय घ्म्ल्व्य्रूं बीजाय सर्वोपद्रव शांतिकराय  अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

दुंदुभि

धीर मधुर गंभीर  नाद से, दशों दिशाएं गूंज रही।

सं बीजाक्षर सहित  शांति प्रभु, भविष्य भ्रमरावलि पूज रही।।

ॐ ह्रीं  श्री शांतिनाथाय दुंदुभि सत् प्रातिहार्य मंडिताय दुंदुभि शोभन पद प्रदाय स्म्ल्व्य्रूं बीजाय सर्वोपद्रव शांतिकराय  अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।    

छत्रत्रय

तीन लोक  के नाथ शांति पर, तीन छत्र  अति शोभ रहे।

खं बीजाक्षर  सहित  पूजते, भविष्य सुर गण मोह रहे।।

ॐ ह्रीं  श्री शांतिनाथाय छत्रत्रय सत् प्रातिहार्य मंडिताय छत्रत्रय शोभन पद प्रदाय ख्म्ल्व्य्रूं बीजाय सर्वोपद्रव शांतिकराय  अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

अनंत ज्ञान

ज्ञानावरणी कर्म  नाश प्रभु, ज्ञान  अनंत को प्राप्त  किया।

समोशरण में दिव्य  ध्वनि से, जग जीवों को बोध दिया।

ॐ ह्रीं  श्री ज्ञानावरण कर्म-बंधनकृते  सति तत्कर्मविपाकोद्भवोपद्रव निवारकाय श्री शांतिनाथाय  अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

अनंत दर्शन

नव विद्या दृग वाणी को नाशा, दृग अनंत प्रभु पाया है।

शांतिनाथ चरणों में, शत इन्द्रों ने शीश झुकाता है।।

ॐ ह्रीं  श्री दर्शनावरण कर्म-बंधनकृते  सति तत्कर्मविपाकोद्भवोपद्रव निवारकाय श्री शांतिनाथाय  अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

अनंत सुख

मोहनीय को नाश आपने, सुख अनंत को पाया।

सर्व हितंकर जिनवर तुमने, हित उपदेश सुनाया।

ॐ ह्रीं  श्री मोहनीय कर्म-बंधनकृते  सति तत्कर्मविपाकोद्भवोपद्रव निवारकाय श्री शांतिनाथाय  अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

अनंत शक्ति

अंतराय है पाँच प्रकार, तुमने प्रभुवर जीता।

जिसने भी ली शरण तुम्हारी, जीवन सुख से बीता।।

ॐ ह्रीं  श्री अंतराय कर्म-बंधनकृते  सति तत्कर्मविपाकोद्भवोपद्रव निवारकाय श्री शांतिनाथाय  अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

अव्याबाध

वेदनीय दुःख देता है, भगवन् तुमसे हारा।

नाम जपा जिसने भी तेरा, उसको भव से तारा।।

ॐ ह्रीं  श्री वेदनीय कर्म-बंधनकृते  सति तत्कर्मविपाकोद्भवोपद्रव निवारकाय श्री शांतिनाथाय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

अवगाहन

आयु कर्म  जीव को रोके, चारों गति दुःखदायी।

योग निरोध आयु को जीता, सिद्ध  प्रभु सुखदायी।।

ॐ ह्रीं  श्री आयु कर्म-बंधनकृते  सति तत्कर्मविपाकोद्भवोपद्रव निवारकाय श्री शांतिनाथाय  अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

अगुरुलघु

गोत्र कर्म  को जीत आपने, अगुरुलघु  गुण पाया।

मैं भी गोत्र कर्म को जीतूं, शरण तुम्हारी आया।।

ॐ ह्रीं  श्री गोत्र कर्म-बंधनकृते  सति तत्कर्मविपाकोद्भवोपद्रव निवारकाय श्री शांतिनाथाय  अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

सूक्ष्मत्व

नाम जीव से छल करता है, उसको आप छला है।

जग में रहकर तुमको जपना, सब से बड़ी कला है।

ॐ ह्रीं  श्री नाम कर्म-बंधनकृते  सति तत्कर्मविपाकोद्भवोपद्रव निवारकाय श्री शांतिनाथाय  अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

पूर्णार्घ्यं

मन वच तन से पाप हुए जो, उनको मैं स्वीकार  करूँ।

तव चरणों में पूर्ण  अर्घ  दे, सर्व दोष परिहार करूँ।।

ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथा जिनेन्द्राय  अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

चतुर्णिकाय  के देव आपके, चरणों में नित आते।

भक्ति भाव से पुष्प चढ़ा कर, तेरी महिमा गाते।।      

पुष्पांजलिं क्षिपेत्।

जाप्य मन्त्र 

ॐ ह्रीं श्रीं अर्हं  शांतिनाथ  जिनेन्द्राय  नमः मम सर्व कार्य सिद्धिं  कुरु कुरु स्वाहा।                  

जयमाला

शांति विधाता शांतिनाथ की, अब जयमाला  गाऊँ मैं।

शिव सुख दाता शांति प्रदाता, तव गुण  महिमा गाऊँ मैं।।

हे कामदेव! हे चक्रवर्ती! हे तीर्थंकर! तेरी जय हो।

जन्म  जरा मृत्यु को जीता, हे प्रभुवर!तेरी जय हो।

पंचकल्याणक  धारी जिनवर, शांतिनाथ! तेरी जय हो।

 विश्वसेन- सुत , ऐरानन्दन! शांति प्रभु तेरी जय हो।

चार कल्याणक  हस्तिनापुर में, पंचम कूट कुंदप्रभ वन में।

शिखर सम्मेद से मोक्ष पधारे, शांतिनाथ प्रभु की जय हो।

पुण्यात्मा भी तारे भगवन्! पापी जीव भी तारे हैं।

हमको क्यों नहीं तारो भगवन्! हम भी भक्त  तिहारे हैं।।

ह्रीं बीज से युक्त  जिनेश्वर! ह्रीं मध्य  प्रभु राजे हैं।

भोग छोड़कर  योग धरा प्रभु! सिद्ध  शिला पर साजे हैं।।

हे शांतिनाथ! तव अनुकम्पा से, अखिल  विश्व  में शांति हो।

ज्ञान ध्यान  तप करने वाले, संत जनों में क्रांति हो।।

अर्चन पूजन वंदन करके, शांतिनाथ  गुण गाऊं मैं।

ध्यान  तीर्थ में ध्यान  लगाकर, मुक्तिपुरी बस जाऊँ मैं।।

दुःखों का क्षय, कर्मों का क्षय, बोधि लाभ की प्राप्ति हो।

सुगति गमन हो, मरण समाधि, जिन गुण सम्पति प्राप्ति हो।

पूर्णार्घ्यं

ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथाय  जयमाल अनर्घ्य  पद प्राप्तये पूर्णार्घ्यं  निर्वपामीति स्वाहा।

पुष्पांजलि  शांतिनाथ  की शरण  में, पूजा रची विशाल।

तन मन दोनों स्वस्थ हों, पूजक हों खुशहाल।।

भूल चूक जो भी हुई,  क्षमा करो जिनराज।

तव भक्ति के प्रसाद से, मिले मोक्ष  साम्राज्य।।

पुष्पांजलिं क्षिपेत्

आरती श्री शांतिनाथ भगवान की।

शांति अपरम्पार  है, आनन्द  अपार है।

शांतिनाथ  भगवान  की आरती बारम्बार  है।।

पहली आरती पहले पद की, तीर्थंकर पद धारी की।

वीतराग  सर्वज्ञ हितंकर,  छियालीस  गुण धारी की।। शांति अपरम्पार  है,.....

दूरी आरती दूजे पद की, चक्रवर्ती पदधारी की।

चौदह रत्न  नवोनिधि छोड़े, चौरासी लख हाथी जी।। शांति अपरम्पार  है,...... 

तीजी आरती तीजे पद की, कामदेव  पदधारी की।

सहस्र छियानवे रानी तज कर, हुए दिगम्बर  धारी जी।शांति अपरम्पार  है,..... 

कर्म  काट सम्मेदशिखर  से, मुक्ति कंथ पद धारी की।

आप तरे अनगणित को तारा, हमको क्यों न तारो जी।। 

शांति अपरम्पार  है, आनन्द  अपार है।

शांतिनाथ  भगवान  की आरती बारम्बार  है

।। ओऽम् श्री शांतिनाथाय नमः ।।

द्वारा - सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद

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