प्रभु भक्ति

 प्रभु भक्ति (दर्शन करते हुए के भाव) (पारुल जैन, दरियागंज, दिल्ली)

तेरे चरणों में हे भगवन्! मैं शीश झुकाता हूँ।

आशीष मिले तेरा यही भावना भाता हूँ।

दर्शन तेरा पाऊँ, दर्शन मैं कर पाऊँ।

निज में निज को देखूँ, तुम-सा ही बन जाऊँ॥

प्रभु आत्म-बोध जगे, यही आस ले आया हूँ।

तेरा दर्शन कर पाऊँ, यही भावना भाता हूँ॥ तेरे चरणों ...

प्रभु वीतरागी मुद्रा, ये शांत छवि तेरी-

जिसको लख कर प्रभु जी, मैं शांति पाता हूँ।

ये नासा दृष्टि तेरी, प्रभुवर सिखलाती है।

देखें जानूँ सब कुछ, निज में रहना चाहूँ॥ तेरे चरणों ....

कर पर कर रखे देख, यही भाव समझता हूँ।

कर्ता नहीं जब तुम हो, मैं व्यर्थ भटकता हूँ ॥

कर्ता नहीं वह निज पर का, फिर क्यों मैं अटकता हूँ।

कर्ता बुद्धि त्यागूं, यही भावना भाता हूँ॥ तेरे चरणों ...

तुम तो प्रभु वो दर्पण, जो निज को दिखाते हो

मैं दोषों से हूँ भरा, मुझको दिखलाते हो

प्रभु दूर करूँ सब दोष, समकित को अपनाऊँ ।

प्रभु भावना निर्मल हो, यही भावना भाता हूँ ॥ तेरे चरणों ...

मैं त्यागूं राग और द्वेष, प्रभु मोह को त्यागूं मैं।

समता उर में लाकर, मैं निज को पाता हूँ ॥

समता उर में लाऊँ, यही भावना भाता हूँ ॥ तेरे चरणों ...

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा - सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें।

धन्यवाद


Comments

Popular posts from this blog

बालक और राजा का धैर्य

सती कुसुम श्री (भाग - 11)

चौबोली रानी (भाग - 24)

सती नर्मदा सुंदरी की कहानी (भाग - 2)

हम अपने बारे में दूसरे व्यक्ति की नैगेटिव सोच को पोजिटिव सोच में कैसे बदल सकते हैं?

मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 18 अक्टूबर, 2022 के प्रवचन का सारांश

जैन धर्म के 24 तीर्थंकर व उनके चिह्न

बारह भावना (1 - अथिर भावना)

रानी पद्मावती की कहानी (भाग - 4)

चौबोली रानी (भाग - 28)