आत्मा का स्वभाव

आत्मा का स्वभाव


मैं ज्ञानानन्द स्वभावी हूँ-टेक

मैं हूँ अपने में स्वयं पूर्ण, पर की मुझ में कुछ गन्ध नहीं ।

मैं अरस अरूपी अस्पर्शी, पर से कुछ भी सम्बन्ध नहीं ॥

मैं राग राग से भिन्न भेद से, भी मैं भिन्न निराला हूँ ।

मैं हूँ अखण्ड चैतन्य पिंड, निज रस में रमने वाला ॥

मैं ही मेरा कर्ता-धर्ता, मुझ में पर का कुछ काम नहीं ।

मैं मुझ में रहने वाला हूँ, पर में मेरा विश्राम नहीं ॥

मैं शुद्ध बुद्ध अविरुद्ध एक, पर परिणति से अप्रभावी हूँ ।

आत्मानुभूति से प्राप्त तत्व, मैं ज्ञानानन्द स्वभावी हूँ ॥

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा -सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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