कर्मों के बंधन तोड़ो -2 (हिंसा)
कर्मों के बंधन तोड़ो -2
जीना यहाँ!!
कक्षा के कमरे का दृश्य - 1 ब्लैक बोर्ड, 1 कुर्सी, 1 मेज, दरी, मेज पर घड़ी, पैन, किताब, चॉक, डस्टर।
पीछे की ओर एक डण्डा रखा है।
पात्र - गुरुजी, विवेक, जीवन कुमार, विद्या (लड़की), प्रज्ञा (लड़की)
सूत्रधार -
कर्मों के बंधन तोड़ो
जिनवर से नाता जोड़ो।
धर्म प्रेमियों! आपस में प्रेम करो, धर्म प्रेमियों!
आज हम आपको एक प्रेरणादायक लघु नाटिका दिखाने जा रहे हैं - ’जीना यहाँ’
आइए हम आपको कर्म-बंधन का लेखा-जोखा समझाते हैं और पात्रों का परिचय देते हैं।
(पात्र परिचय - एक-एक पात्र मंच पर आता है और हाथ जोड़ता हुआ दूसरी ओर चला जाता है।)
ये हैं -
गुरु जी - सफेद धोती, कुर्ता, जैकेट, टोपी हाथ में रजिस्टर लेकर आता है
विवक - हाथ में स्कूल बैग, ब्राउन पैंट, सफेद कमीज पहनकर आता है
जीवन कुमार - हाथ में स्कूल बैग, सफेद पैंट, सफेद कमीज पहनकर आता है
विद्या - हाथ में स्कूल बैग, सफेद सलवार - हल्की नीली कमीज पहनकर आती है
प्रज्ञा - हाथ में स्कूल बैग, सफेद सलवार - हल्की ब्राउन कमीज पहनकर आती है
आइये! आइये हम भी चलते हैं गुरुजी की कक्षा में .....
(सूत्रधार मंच के पृष्ठ भाग में चला जाता है और गुरुजी हाथ में रजिस्टर लेकर धीरे-धीरे मंच पर आते हैं, और मेज़ पर पड़े सामान को यथास्थान रखने का उपक्रम करते हैं, अपने हाथ पर बंधी घड़ी में टाइम देखते हैं। तभी सभी बच्चे कक्षा के द्वार पर आते हैं)
बच्चे - (समवेत स्वर में) गुरु जी! क्या हम अन्दर आ सकते हैं?
गुरु जी - हाँ! हाँ! आओ बच्चों!
बच्चे - गुरुजी! प्रणाम।
गुरुजी - (हाथ उठा कर) आशीर्वाद! सदा ज्ञान वृद्धि हो। तुम सब इतनी जल्दी खेल कर आ गए।
जीवन कुमार - हाँ गुरु जी! वहां बगीचे में बारिश के कारण घास भी गीली थी और मिट्टी भी फिसलन वाली हो रही थी, तो ज्यादा खेल नहीं सके और हम वापस आ गए।
(सब बच्चे दरी पर लाइन लगा कर बैठ जाते हैं।)
(गुरुजी रजिस्टर खोलकर सबकी हाजिरी लगाते हैं।)
गुरुजी - चलो! कक्षा आरम्भ करने से पहिले तुम्हारी उपस्थिति दर्ज कर लें। जीवन कुमार।
जीवन कुमार - उपस्थित हूँ श्रीमान्।
गुरुजी - विवेक।
विवेक - उपस्थित हूँ श्रीमान्।
गुरुजी - विद्या।
विद्या - उपस्थित हूँ श्रीमान्।
गुरुजी - प्रज्ञा।
प्रज्ञा - उपस्थित हूँ श्रीमान्।
गुरुजी - बच्चों! पिछली कक्षा में हमने कर्मों के आठ प्रकार के बारे में जाना था। आज हम जानेंगे कि वे कर्म बंधते कैसे हैं? अपनी अपनी नोट बुक्स खोल लो और जो मैं बताता हूँ, उसे केवल नोट बुक में ही नहीं, अपितु अपने दिमाग़ में भी नोट कर लो। क्या तुम्हें पाँच पापों के नाम ज्ञात हैं।
जीवन कुमार - जी गुरुजी! हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह।
गुरुजी - वाह! बहुत बढ़िया। (बोर्ड पर लिखते हुए)
हिंसा - किसी जीव के प्राण हरण कर लेना या किसी के मन को दुर्वचनों के माध्यम से आघात पहुँचाना हिंसा कहलाता है। हमारा पहिला सिद्धांत है - अहिंसा परमो धर्मः।
विद्या - गुरुजी! आपको एक बात बताऊँ।
गुरुजी - हाँ विद्या! बताओ, क्या बात है?
( जीवन कुमार उसकी ओर मुँह पर उंगली रख कर न बताने का इशारा करता है। पर विद्या उसकी ओर ध्यान नहीं देती)
विद्या - गुरुजी! आज ना विवेक भैया ने वहां पर गार्डन में एक कीड़ा मार दिया, पैर से मसल कर। सोच तो मैं भी रही थी कि इसे मार दें तो अच्छा है। वरना यह हमें काट लेगा।
गुरुजी - अरे! क्यों विवेक! तुमने ऐसा क्यों किया?
विवेक - नहीं गुरुजी! मेरा इरादा उसे मारने का नहीं था। मुझे तो प्रज्ञा ने कहा था कि तू इस कीड़े को मार दे, वरना यह हमें काट लेगा। मुझे तो इससे डर लगता है।
गुरुजी - अच्छा! फिर तुमने क्या किया?
विवेक - गुरुजी! फिर मैंने सबको बचाने के लिए उस कीड़े को मार दिया। मैंने तो सबकी रक्षा के लिए मारा न!
गुरुजी - अच्छा! फिर तुम सब ने क्या किया?
जीवन कुमार - गुरुजी! हमें बहुत मज़ा आया कि चलो! उस कीड़े से तो पीछा छूटा। हमने मिलकर ताली भी बजाई। पर हमें दुःख भी हुआ कि बेचारा हमारी वजह से अपनी जान से चला गया। कहीं इसका पाप तो हमें नहीं लगेगा। फिर हमने सोचा कि ऐसे तो यहाँ बारिश में बहुत से कीड़े-मकोड़े होंगे। क्या हम सब को मारते ही रहेंगे। चलो! हम अब यहाँ नहीं खेलते।
गुरुजी - बच्चों! यह तो अच्छा किया कि तुम वहाँ से चले आए, पर यह क्या किया तुमने? देखो बच्चों! किसी को मारने से तो पापकर्म का बंध होता ही है, लेकिन यदि हम खुद न भी मारें और किसी अन्य को मारने को कहें तो भी हमें पापकर्म का बंध होता है।
विद्या - गुरुजी! पर मैंने तो मारा ही नहीं था। प्रज्ञा ने विवेक को कहा था कि तुम इसे मार दो। मैंने तो बस ताली ही बजाई थी न!
गुरुजी - नहीं बेटी! अगर हम किसी के गलत काम की अनुमोदना करते हैं कि उसने बहुत अच्छा किया, तो वह भी तो पाप है। स्वयं हिंसा करना, किसी से करवाना और करने वाले की अनुमोदना करना; ये तीनों ही पाप के कारण हैं। इनको कहते हैं (बोर्ड पर लिखते हुए)
कृत, कारित और अनुमोदना से की गई हिंसा -
कृत अर्थात् स्वयं हिंसा करना,
कारित अर्थात् किसी से हिंसा करवाना
अनुमोदना अर्थात् हिंसा करने वाले की प्रशंसा करना
हमें न तो स्वयं किसी की हिंसा करनी चाहिए, न किसी से करवानी चाहिए और न करते हुए की प्रशंसा करनी चाहिए।
विद्या - गुरुजी! फिर तो हम आगे से इस का ध्यान रखेंगे।
गुरुजी - बच्चों! किसी को जान से मारना द्रव्य हिंसा होती है और हम उसे मारने का भाव भी कर लेते हैं या किसी को मारता देखकर खुशी मनाते हैं, तो वह भाव हिंसा कहलाती है और हमें इससे बचना चाहिए। चलो! खेलना तो हो गया, अब तुम थोड़ी देर बैठ कर यह पाठ याद कर लो। मैं अभी आकर तुमसे सुनूंगा।
(यह कह कर वे मंच के पीछे चले जाते हैं)
सभी बच्चे अपनी-अपनी कॉपी लेकर बैठ जाते हैं। तभी विवेक जोर-जोर से बोल-बोल कर पढ़ने लगता है। प्रज्ञा घूम घूम कर याद करने लगती है और सोचती है।
प्रज्ञा - (चेहरे पर क्रोध का भाव लाकर माइक पर आकर फुसफुसाती है) अगर यह कक्षा में न बैठा होता, तो मैं इसे अभी एक चांटा जड़ देती। शोर मचा कर हमें भी याद नहीं करने देता।
विद्या - प्रज्ञा! तू घूम घूम कर क्यों पढ़ रही है। चुपचाप बैठकर नहीं पढ़ सकती क्या? या तो चुपचाप बैठ जा, वरना मैं तुझे एक चांटा लगाऊंगी।
तभी विवेक को भी गुस्सा आता है और वह उठकर प्रज्ञा को चांटा लगा देता है।
जीवन कुमार उनको शांत करने की और बिठाने की कोशिश करता रहता है। तभी उनकी आवाज सुनकर गुरुजी आते हैं।
गुरुजी - यह क्या उधम मचा रखा है?
(तीनों अपनी-अपनी बात करने लगते हैं)
प्रज्ञा - गुरुजी! विवेक जोर-जोर से बोल-बोल कर पढ़ रहा था। मैंने तो इसे कुछ नहीं कहा। हाँ! सोचा तो था कि अगर यह कक्षा में न बैठा होता तो मैं इसे अभी एक चांटा जड़ देती।
विवेक - गुरुजी! प्रज्ञा घूम घूम कर पढ़ रही थी। तो मैंने इसे एक चांटा जड़ दिया।
विद्या - गुरुजी! मैंने भी बस प्रज्ञा को बोला ही था कि या तो चुपचाप बैठ कर पढ़, वरना मैं तुझे एक चांटा लगाऊंगी और इतने में विवेक ने इसे चांटा लगा दिया।
गुरुजी - प्रज्ञा! तुमने मन से तो हिंसा कर ही ली और विद्या! तुमने मन से भी और वचन से भी हिंसा कर ली और विवेक! तुमने तो मन, वचन और काया तीनों से ही हिंसा कर ली। विवेक के मन में क्रोध छिपा था, प्रज्ञा के मन में माया छुपी थी, विद्या के मन में मान था, और लोभ तो सबके मन में ही छुपा था कि हम सबसे पहिले पाठ याद करके गुरुजी को सुना दें। सब यही चाहते थे कि सभी बच्चे चुपचाप बैठकर पढ़ लें ताकि हम भी अपना काम शांति से कर सकें।
जीवन कुमार - हाँ, गुरुजी! मैं तभी तो इनको शांति से बिठाने का प्रयत्न कर रहा था।
गुरुजी - बच्चों! (बोर्ड पर लिखते हुए)
क्रोध, मान, माया और लोभ से की गई हिंसा पापकर्म के बंध के कारण है।
जीवन कुमार - हाँ, गुरुजी! आगे से मन से, वचन से, क्रिया से और क्रोध, मान, माया और लोभ से की गई हिंसा न स्वयं करूँगा और साथ ही सब को ऐसा न करने की शिक्षा भी दूंगा। अभी तक तो हमें पता ही नहीं था कि ऐसे भी हिंसा का दोष लगता है।
विवेक - हाँ, गुरुजी! ऐसे भी हिंसा होती है, यह तो हमें मालूम ही नहीं था।
विद्या - (अपने स्थान से उछलती हुई) गुरुजी! गुरुजी! वह देखो! कक्षा में चूहा घुस आया है।
(सभी बच्चेे अपने स्थान पर खड़े हो जाते हैं)
बच्चे - कहाँ है? कहाँ है?
विद्या - मैंने देखा है चूहा। (हाथ से इशारा करती हुई) पीछे की ओर गया है। इसको तो भगाने के लिए डण्डा होना चाहिए था।
प्रज्ञा - गुरुजी! मैं अभी इसको भगाने के लिए डण्डा लाती हूं।
(यह कह कर वह एक डण्डा उठा लाती है।)
विवेक - (आगे बढ़कर) लाओ! यह डण्डा मुझे दो।
( विवेक प्रज्ञा के हाथ से डण्डा लेकर उस दिशा में फेंकता है, जिधर विद्या ने इशारा किया था)
गुरुजी - अरे! यह क्या कर रहे हो। अभी-अभी तो हमने हिंसा न करने का वचन लिया है। जानते हो, अभी-अभी तुमने कौन-सी हिंसा की है?
बच्चों! (बोर्ड पर लिखते हुए)
इसे कहते हैं - समरम्भ, समारम्भ और आरम्भ।
समरम्भ - किसी कार्य को करने की योजना बनाना, जैसे अभी विद्या ने चूहे को भगाने के लिए डण्डा से मारने का भाव किया।
समारम्भ - किसी कार्य को करने की योजना को सफल बनाने के लिए सामग्री एकत्रित करना, जैसे अभी प्रज्ञा चूहे को भगाने के लिए डण्डा लेकर आई।
आरम्भ - योजना को सफल बनाने के लिए सामग्री का उपयोग करना आरम्भ करना, जैसे विवेक ने प्रज्ञा के हाथ से डण्डा लेकर चूहे की दिशा में फेंक दिया।
यह तो चूहे की किस्मत अच्छी थी, जो वह पहिले ही भाग गया, वरना वह तो अपने जान से ही हाथ धो बैठता।
आलोचना पाठ में हम पढ़ते हैं न!
इक वे ते चउ इन्द्री वा, मन रहित सहित जे जीवा।
तिनकी नहिं करुणा धारी, निरदय ह्वै घात विचारी।।
समरम्भ, समारम्भ और आरम्भ, मन वच, तन कीने प्रारम्भ।
कृत कारित मोदन करिके, क्रोधादि चतुष्टय धरिके।।
जीवन कुमार - हाँ, गुरुजी! पढ़ते तो हम रोज़ हैं, पर इसका अर्थ हमें आज ही पता चला है।
गुरुजी - हां बेटा! ये बातें पाठशाला में ही पढ़ाई जाती हैं और अपने दैनिक जीवन में इनका सावधानी से प्रयोग किया जाता है। यह चातुर्मास भी तो इसी लिए आता है। दसलक्षण के 10 दिन हम पाठ सीखते हैं और शेष 355 दिन उसका अभ्यास करते हैं। तो इसलिए मैं तुम्हें बता रहा हूं कि तुम भी बच्चों की पाठशाला में जाया करो।
जीवन कुमार - गुरु जी! क्या केवल बच्चों को ही पाठशाला में जाना चाहिए। क्या बड़ों की भी ऐसी कोई पाठशाला होती है? हम अपने बड़ों से ही तो सब संस्कार सीखते हैं।
गुरु जी - हाँ! अपने शास्त्री जी हर रोज़ शाम को 7 बजे शास्त्र-सभा करते हैं न! उसमें बच्चे, बूढ़े, पुरुष, स्त्रियाँ सभी आकर धर्म की ये मूल बातें सीख सकते हैं। घर के बड़े सदस्य आएंगे, तभी तो बच्चे जैन धर्म के गूढ़ रहस्य जान पाएंगे।
बन्धुओं! केवल बच्चों को ही नहीं, बड़ों को भी इसका ध्यान रखना चाहिए। हमें सभी जीवों को जीवन जीने की आज़ादी देनी चाहिए। वे तो हमसे ही डरते हुए भागते रहते हैं। तुमने देखा नहीं क्या? समवशरण में शेरनी का बच्चा गाय का दूध पीते हुए और गाय का बच्चा शेरनी का दूध पीते हुए दिखाया गया है। यह सब भगवान की अहिंसा की भावना का ही प्रतिफल है। यदि किसी जीव-जन्तु को घर से निकालना ही हो, तो आराम से निकालो, न कि उसके प्रति हिंसा की भावना से।
बच्चों! क्या तुम सोचते हो कि तुम इस पाप से बच जाओगे? नहीं! यह तो हमारे खाते में लिखा जाएगा। हमने पाप का बीज बो दिया है और समय आने पर परिपक्व होकर यह अपना फल भी देगा। अहिंसा का फल मीठा निकलेगा और हिंसा का फल कड़वा। तब तुम किसे दोष दोगे? अपने पूर्व में किए हुए कर्म ही सुख-दुःख के रूप में उदय में आते हैं। सबको स्वाध्याय का लाभ लेना चाहिए ताकि कुछ धर्म की बातें सीख सकें और अपना कल्याण कर सकें।
क्या समझे?
बोलो अहिंसा परमो धर्म की जय! जय! जय!
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
विनम्र निवेदन
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