कर्मों के बंधन तोड़ो -4 चोरी
कर्मों के बंधन तोड़ो -4 चोरी
लालच का परिणाम!!
कक्षा के कमरे का दृश्य - 1 ब्लैक बोर्ड, 1 कुर्सी, 1 मेज, दरी, मेज पर घड़ी, पैन, किताब, चॉक, डस्टर।
पात्र - गुरुजी, जीवन कुमार, अस्तेय, सत्यव्रत, पवित्रा (लड़की)
सूत्रधार -
कर्मों के बंधन तोड़ो
जिनवर से नाता जोड़ो।
धर्म प्रेमियों! आपस में प्रेम करो, धर्म प्रेमियों!
आज हम आपको एक प्रेरणादायक लघु नाटिका दिखाने जा रहे हैं - लालच का परिणाम!!
आइए हम आपको कर्म-बंधन का लेखा-जोखा समझाते हैं और पात्रों का परिचय देते हैं।
(पात्र परिचय - एक-एक पात्र मंच पर आता है और हाथ जोड़ता हुआ दूसरी ओर चला जाता है।)
ये हैं -
गुरु जी - सफेद धोती, कुर्ता, जैकेट, टोपी हाथ में रजिस्टर लेकर आता है
अस्तेय- हाथ में स्कूल बैग, ब्राउन पैंट, सफेद कमीज पहनकर आता है
जीवन कुमार - हाथ में स्कूल बैग, सफेद पैंट, सफेद कमीज पहनकर आता है
सत्यव्रत - हाथ में स्कूल बैग, सफेद पैंट, हल्की नीली कमीज पहनकर आती है
पवित्रा - हाथ में स्कूल बैग, सफेद सलवार - हल्की गुलाबी कमीज पहनकर आती है
कक्षा के कमरे का दृश्य - 1 ब्लैक बोर्ड, 1 कुर्सी, 1 मेज, दरी, मेज पर घड़ी, पैन, किताब, चॉक, डस्टर।
आइये! आइये हम भी चलते हैं गुरुजी की कक्षा में .....
(सूत्रधार मंच के पृष्ठ भाग में चला जाता है और गुरुजी हाथ में रजिस्टर लेकर धीरे-धीरे मंच पर आते हैं, और मेज़ पर पड़े सामान को यथास्थान रखने का उपक्रम करते हैं, अपने हाथ पर बंधी घड़ी में टाइम देखते हैं। तभी सभी बच्चे कक्षा के द्वार पर आते हैं)
बच्चे - (समवेत स्वर में) गुरु जी! क्या हम अन्दर आ सकते हैं?
गुरु जी - हाँ! हाँ! आओ बच्चों!
बच्चे - गुरुजी! प्रणाम।
गुरुजी - (हाथ उठा कर) आशीर्वाद! सदा ज्ञान वृद्धि हो। आओ बैठो।
(सब बच्चे दरी पर लाइन लगा कर बैठ जाते हैं।)
(गुरुजी रजिस्टर खोलकर सबकी हाजिरी लगाते हैं।)
गुरुजी - चलो! कक्षा आरम्भ करने से पहिले तुम्हारी उपस्थिति दर्ज कर लें। जीवन कुमार।
जीवन कुमार - उपस्थित हूँ श्रीमान्।
गुरुजी - सत्यव्रत।
सत्यव्रत - उपस्थित हूँ श्रीमान्।
गुरुजी - अस्तेय।
अस्तेय- उपस्थित हूँ श्रीमान्।
गुरुजी - अनीता ।
पवित्रा - उपस्थित हूँ श्रीमान्।
गुरुजी - बच्चों! अब तक ( पुस्तक खोल कर बोर्ड पर लिखते हुए) हमें मन-वचन-काया, कृत-कारित-अनुमोदना और क्रोध-मान-माया-लोभ के विषय में जानकारी मिल चुकी है कि किसी भी पाप की पूर्ण प्रक्रिया में कृत, कारित, अनुमोदना और मन, वचन, काया और चार कषाय -क्रोध, मान, माया, लोभ और समरम्भ, समारम्भ, आरम्भ शामिल होते हैं। (इस पहरे के केवल Bold अक्षर ही बोर्ड पर लिखने हैं)
आज मैं तुम्हें चोरी की ऐसी कहानी सुनाऊँगा, जिसमें इन सबका वर्णन आ जाए। फिर से इनके विषय में बता देता हूँ। अपनी अपनी नोट बुक्स खोल लो और जो मैं बताता हूँ, उसे केवल नोट बुक में ही नहीं, अपितु अपने दिमाग में भी नोट कर लो।
कृत - स्वयं पाप करना,
कारित - किसी से पाप करवाना
अनुमोदना - करने वाले की प्रशंसा करना
क्रोध - यह एक तीव्र भावनात्मक प्रतिक्रिया है जो असंतोष, अन्याय, या इच्छाओं में बाधा होने पर उत्पन्न होती है।
मान - अहंकार या गर्व की भावना को मान कहा जाता है।
माया - मायाचारी का अर्थ है छल, कपट या धोखा। यह एक ऐसी मानसिक वृत्ति है, जिसमें व्यक्ति के मन में कुछ और होता है, और वह बाहर कुछ और दिखाता है। अपनी बात या स्वार्थ सिद्ध करने के लिए झूठ और दिखावे का सहारा लेना ही मायाचारी है।
लोभ - किसी वस्तु, धन या सत्ता को आवश्यकता से अधिक पाने की तीव्र और अनियंत्रित इच्छा का नाम लोभ है।
समरम्भ - किसी कार्य को करने की योजना बनाना।
समारम्भ - किसी कार्य को करने की योजना को सफल बनाने के लिए सामग्री एकत्रित करना
आरम्भ - योजना को सफल बनाने के लिए सामग्री का उपयोग करना आरम्भ करना
मन - मन से किया गया पाप
वचन - वाणी से बोल कर से किया गया पाप
काया - शरीर की क्रियाओं से किया गया पाप
अब मैं तुमसे बीच-बीच में प्रश्न पूछूंगा और तुम्हें पहिचान कर बताना होगा कि इनमें से कौन-सा भेद कहाँ लागू होता है? एक ही वाक्य में एक से अधिक भेद भी शामिल हो सकते हैं। लिख लिया सबने।
बच्चे - जी गुरुजी!
गुरुजी - बच्चों! चोरी एक ऐसी घटना है जो व्यक्ति के नैतिक और चारित्रिक पतन का कारण बनती है। इसे एक व्यावहारिक कहानी के माध्यम से समझा जा सकता है।
(गुरुजी पुस्तक खोल कर कहानी पढ़ते हैं।)
तो बच्चों कहानी का नाम है -लालच का परिणाम
(बोर्ड पर लिखते हुए) - इसके पात्रों के नाम हैं -
1. रमेश
2. महेश
3. सुरेश
एक छोटे से शहर में रमेश नाम का एक गरीब व्यक्ति रहता था। वह अपनी आर्थिक तंगी से परेशान था। एक दिन, उसके मन में अपने अमीर पड़ोसी सुरेश की दुकान से पैसे चुराने का लोभ (कषाय) आ गया।
क्या कोई बता सकता है कि इसमें चोरी करने के कौन-सा पाप का बंध होगा?
(बच्चे हाथ खड़ा करते हैं)
गुरुजी - हाँ जीवन कुमार! तुम बताओ।
जीवन कुमार - गुरुजी! इसमें रमेश को मन से और लोभ से चोरी करने के पाप का बंध होगा।
गुरुजी - वाह! बहुत बढ़िया। (बोर्ड पर लिखते हुए) -
1. रमेश (के सामने) - मन से, लोभ से
अब आगे सुनो। उसने अपने दोस्त महेश से इस बारे में बात की और उसे सुरेश की दुकान से पैसे चोरी करने के लिए उकसाया।
क्या कोई बता सकता है कि इसमें चोरी करने के कौन-सा पाप का बंध होगा?
अस्तेय - गुरुजी! मैं बताऊँ!
गुरुजी - हाँ अस्तेय! तुम बताओ।
अस्तेय - गुरुजी! रमेश के दोस्त महेश ने रमेश को चोरी करने के लिए उकसाया, इसलिए महेश को चोरी करने के ‘कारित’ पाप का बंध होगा। यह वचन (बोलकर) और समरम्भ (स्वयं योजना बनाना) का हिस्सा था। वचन से बोल कर उकसाया तो उसे ‘वचन’ द्वारा चोरी करने के पाप का बंध होगा। रमेश के साथ मिल कर चोरी करने की योजना बनाई। इसलिए रमेश और महेश को ‘समरम्भ’ पाप का बंध होगा।
गुरुजी - (बोर्ड पर लिखते हुए) -
1. रमेश (के सामने) - मन से, लोभ से, समरम्भ
2. महेश (के सामने) - वचन, कारित, समरम्भ
अब आगे सुनो। महेश पहिले से ही अपने साथ हथौड़ा लाया था। उस ने दुकान का ताला तोड़ा, इसमें चोरी करने के कौन-सा पाप का बंध होगा?
(सत्यव्रत हाथ खड़ा करता है।)
गुरुजी - हाँ सत्यव्रत! तुम बताओ।
सत्यव्रत - गुरुजी! महेश हथौड़ा लाया। उस ने दुकान का ताला तोड़ा जो काया (शारीरिक क्रिया) द्वारा किया गया कार्य था। तो उसे काया व आरम्भ द्वारा किया गया पाप का बंध होगा।
गुरुजी - अरे वाह! तुमने तो ये भेद जल्दी ही याद कर लिए।
(बोर्ड पर लिखते हुए) -
महेश (के सामने) - वचन, कारित, समरम्भ (ये तो पहिले से लिखे हुए हैं), समारम्भ, काया, आरम्भ
अब आगे सुनो।
रमेश ने महेश से कहा था कि तुम ताला तोड़ो, मैं बाहर पहरा देता हूँ। यह कारित (दूसरों से करवाना) था। इसमें दोनों को चोरी करने के कौन-सा पाप का बंध होगा?
पवित्रा - गुरुजी! मैं बताऊँ!
गुरुजी - हाँ पवित्रा! तुम बताओ।
पवित्रा - गुरुजी! यह कारित (दूसरों से करवाना) था। इसमें रमेश कोे कारित और महेश ने कृत द्वारा किया गया पाप का बंध होगा।
गुरुजी - बहुत अच्छे!
(बोर्ड पर लिखते हुए) -
1. रमेश (के सामने) - मन से, लोभ से, समरम्भ (ये तो पहिले से लिखे हुए हैं), कारित
2. महेश (के सामने) - वचन, कारित, समरम्भ, समारम्भ, काया, आरम्भ (ये तो पहिले से लिखे हुए हैं), कृत,
अब आगे सुनो। जब महेश चोरी करके सफल हो गया, तो रमेश मन ही मन बहुत खुश हुआ और उसकी पीठ थपथपाई। यह अनुमोदना (दूसरों के गलत कार्य का समर्थन करना) थी।
इसमें रमेश को चोरी करने के कौन-सा पाप का बंध होगा?
जीवन कुमार - गुरुजी! यह अनुमोदना (दूसरों के गलत कार्य का समर्थन करना) थी। इसमें रमेश को ‘अनुमोदना से’ चोरी करने के पाप का बंध होगा।
गुरुजी - बहुत अच्छे!
(बोर्ड पर लिखते हुए) -
1. रमेश (के सामने) - मन से, लोभ से, समरम्भ, कारित (ये तो पहिले से लिखे हुए हैं), अनुमोदना
अब आगे सुनो। अगले दिन जब सुरेश को चोरी का पता चला, तो उसे रमेश पर शक हुआ। सुरेश रमेश के घर गया और उससे पूछा। पकड़े जाने के डर से और गुस्से में आकर रमेश ने झूठ बोल दिया कि तुम मुझे चोर समझते हो? मैंने कोई चोरी-वोरी नहीं की है।
इसमें रमेश को चोरी करने के कौन-सा पाप का बंध होगा?
अस्तेय - गुरुजी! इसमें तो रमेश ने क्रोध (कषाय) के कारण उसने माया (छल -कपट) का सहारा लिया और सुरेश को झूठ बोल कर गुमराह करने की कोशिश की। तो उसे क्रोध और माया के पाप का बंध होगा।
गुरुजी - बहुत अच्छे!
(बोर्ड पर लिखते हुए) -
1. रमेश (के सामने) - मन से, लोभ से, समरम्भ, कारित, अनुमोदना (ये तो पहिले से लिखे हुए हैं), क्रोध, माया
अब आगे सुनो। सुरेश ने अहंकार (मान-कषाय) में आकर पुलिस में शिकायत कर दी। पुलिस की जांच में रमेश और महेश दोनों पकड़े गए। इसमें सुरेश को कौन-से पाप का बंध होगा?
पवित्रा - गुरुजी! इसमें सुरेश कोे मान-कषाय द्वारा किया गया पाप का बंध होगा।
(बोर्ड पर लिखते हुए) -
1. रमेश - मन से, लोभ से, समरम्भ, कारित , अनुमोदना, क्रोध, माया
2. महेश - वचन, कारित, समरम्भ, समारम्भ, काया, आरम्भ, कृत,
3. सुरेश - मान-कषाय
तो देखा आपने! इस प्रकार, एक छोटी सी चोरी ने मन, वचन और काया के तीनों स्तरों पर पाप को जन्म दिया और चारों कषायों (क्रोध, मान, माया, लोभ) ने समरम्भ, समारम्भ, काया, आरम्भ के द्वारा रमेश और महेश के जीवन को बर्बाद कर दिया।
इसमें प्रमुख भूमिका थी चोरी करके अपनी आर्थिक तंगी से छुटकारा पाने के भाव की। बन्धुओं! अपनी मेहनत से कमाया गया धन ही समाज में प्रतिष्ठा दिलाता है और इससे ही मन में शांति का वास होता है।
क्या समझे?
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
विनम्र निवेदन
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