कर्मों के बंधन तोड़ो -6 परिग्रह
कर्मों के बंधन तोड़ो -6 परिग्रह
माया का जाल!!
कमरे का दृश्य - कमरा कीमती सामानों, सजावटी शो-पीस और अलमारियों से भरा हुआ है। दूसरी ओर घर का शांत कोना
पात्र - सुरेश, नीता, रोहन, आनंद भाई, सूत्रधार
सूत्रधार -
कर्मों के बंधन तोड़ो
जिनवर से नाता जोड़ो।
धर्म प्रेमियों! आपस में प्रेम करो, धर्म प्रेमियों!
आज हम आपको एक प्रेरणादायक लघु नाटिका दिखाने जा रहे हैं - माया का जाल!!
यहाँ ‘परिग्रह’ अर्थात् आवश्यकता से अधिक संचय करना और भौतिक वस्तुओं के प्रति मोह रखने के विषय पर एक सरल और विचारोत्तेजक लघु नाटिका प्रस्तुत है। नाटक का नाम है - माया का जाल।
आइए हम आपको कर्म-बंधन का लेखा-जोखा समझाते हैं और पात्रों का परिचय देते हैं।
(पात्र परिचय - एक-एक पात्र मंच पर आता है और हाथ जोड़ता हुआ दूसरी ओर चला जाता है।)
ये हैं -
सुरेश (उम्र 40) - एक धनवान व्यक्ति, जो हमेशा और अधिक कमाने और चीजों को इकट्ठा करने में लगा रहता है।
नीता (उम्र 35) - सुरेश की पत्नी, जो दिखावे और संग्रह से परेशान है।
रोहन (उम्र 14) - सुरेश और नीता का बेटा, जो गैजेट्स और खिलौनों में उलझा रहता है।
आनंद भाई (उम्र 65)- सुरेश के चाचा, जो एक शांत और संतुष्ट जीवन जीते हैं।
सूत्रधार - जो कहानी को आगे बढ़ाएगा।
मंच के आधे भाग का दृश्य 1
सुरेश का बैठक कक्ष: (कमरा कीमती सामानों, सजावटी शो-पीस और अलमारियों से भरा हुआ है। सुरेश लैपटॉप पर काम कर रहा है और फोन पर बात कर रहा है।)
सुरेश- (फोन पर) हाँ-हाँ, डील पक्की समझो! अगली खेप भी गोडाउन में रखवा दो। मुनाफा चाहे कम हो, पर माल अपने पास ही रहना चाहिए। कोई स्टॉक खाली नहीं होना चाहिए। (फोन काटता है)
नीता- (हाथ में कपड़ों का बैग लिए प्रवेश करती है) सुरेश जी! ये लो अपने नए कपड़े। कितनी अलमारियां भरोगे? ये कपड़े, ये बर्तन, ये बेकार का सामान... अब तो घर में चलने की जगह नहीं बची। कल तो आप नया टीवी भी ले आये, पुराने वाले का क्या करें?
सुरेश- अरे नीता! इसे कहते हैं ‘स्टेटस’। घर में जितना सामान होगा, लोग उतना ही बड़ा आदमी समझेंगे। कल कोई नई चीज आएगी, तो उसे भी ले लेंगे। ये सब मेरा है! मेरा!!
रोहन- (अंदर आते हुए) पापा! मेरा दोस्त कल नया ड्रोन लाया है, मेरे वाला तो पुराना हो गया है। मुझे भी नया वाला चाहिए।
सुरेश - ला देंगे बेटा, ला देंगे! तू पढ़ने में कमी मत करना, फिर जो जो मांगना है मांगता जा।
(आनंद भाई प्रवेश करते हैं और सारा दृश्य देख रहे होते हैं।)
आनंद भाई - अरे! सुरेश! अब बंद भी करो अपनी इच्छाओं का पहाड़। यह जितना ऊँचा होता चला जाएगा, उतना ही तुम नीचे गिरते चले जाओगे।
सुरेश - क्या चाचाजी! आप भी कैसी बातें करते हैं? आप के समय में ये सब सामान होते ही कहाँ थे? न टीवी, न लैपटॉप। आप क्या जानो? ये सब तो ‘स्टेटस सिम्बल’ हैं।
आनंद भाई - ठीक है भाई! जैसा तुम्हें ठीक लगे।
(सुरेश को छोड़कर सभी मंच के पीछे चले जाते हैं)
दृश्य 2-
(उसी कमरे में सुरेश लैपटॉप पर काम कर रहा है। कुछ समय बाद सुरेश को छाती में हल्का दर्द महसूस होता है और वह सोफे पर लेट जाता है।)
सुरेश - अरे! ये अचानक क्या हो गया? सीने में बहुत भारीपन लग रहा है... नीता..... नीता.....।
नीता - (घबराकर) क्या हुआ? रुको, मैं डॉक्टर को बुलाती हूँ।
आनंद भाई- (सुरेश के पास आते हैं और उसके सिर पर हाथ फेरते हैं) सुरेश बेटा, जरा गहरी साँस लो। ये जो तुमने इतना भारी सामान इकट्ठा कर रखा है, वही तुम्हारे दिल पर बोझ बन रहा है। इसी को ‘परिग्रह’ कहते हैं।
सुरेश- (हाँफते हुए) चाचा जी... मैं तो सब अपनों के लिए ही जोड़ रहा हूँ। इसमें गलत क्या है?
आनंद भाई- बेटा, आवश्यकता तक संग्रह करना ठीक है, लेकिन जो तुम्हें चाहिए ही नहीं, उसे भी जमा करते रहना और हर चीज से ‘मेरा-मेरा’ का भाव रखना ही परिग्रह है। तुम चीजों को नहीं जोड़ रहे, चीजें तुम्हें जकड़ रही हैं। जब शरीर ही साथ नहीं जाएगा, तो ये गाड़ियाँ और अलमारियां किस काम की? चलो! उस पलंग पर लेट जाओ। तुम्हें आराम की आवश्यकता है।
दृश्य 3-
(आनंद भाई सुरेश को पलंग पर लिटाते हैं)
(सुरेश आँखें खोलता है। वह शांत है।)
सुरेश- (धीमी आवाज में) चाचा जी... आप ठीक कह रहे थे। कल रात जब मुझे दर्द हुआ, तो मुझे लगा कि मैं अपनी ही बनाई तिजोरी में कैद हो गया हूँ। आज से मैं अपने मन से इस संग्रह की आदत को निकाल दूँगा।
रोहन- (आगे बढ़कर सुरेश का हाथ पकड़ता है) पापा, मुझे नया ड्रोन नहीं चाहिए। क्या हम अपने पुराने खिलौने उन बच्चों को दे दें, जिनके पास कुछ नहीं है?
नीता- (मुस्कुराते हुए) यही तो असली खुशी है, सुरेश जी। जितना हम बाँटेंगे और घर खाली होगा, उतना ही मन सुकून से भर जाएगा।
आनंद भाई- बिल्कुल! अपरिग्रह यानी आवश्यकता से अधिक का त्याग ही जीवन में सच्ची शांति लाता है।
(सभी एक साथ मुस्कुराते हैं और पर्दा गिरता है।)
सूत्रधार - बन्धुओं! यह नाटिका दर्शाती है कि मन-वचन-काया से, कृत-कारित-अनुमोदना से, क्रोध-मान-माया-लोभ सेे और समरम्भ, समारम्भ, आरम्भ से अर्थात् हर प्रकार से भौतिक वस्तुओं और धन का अनावश्यक संचय (परिग्रह) व्यक्ति को मानसिक रूप से तनावग्रस्त और स्वार्थी बना देता है। सच्चा सुख त्याग और आवश्यकता के अनुसार वस्तुओं का संग्रह करके जीने में ही है। हमारे साधुजन इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।
बोलो अपरिग्रह धर्म की जय
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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