मेरी भावना (बा० न्यायमत सिंह जैन )
मेरी भावना
(बा० न्यायमत सिंह जैन - रचियता सती कमल श्री नाटक से ली गई)
(चाल) मेरे मौला बुलाले मदीने मुझे ॥
स्वामी चरणों का तेरे सहारा मुझे ।
केवल तेरा ही शरणा गवारा मुझे - टेक
तू न रागी है न द्वेषी, है कि अविनाशी है तू ।
विश्व का ज्ञाता द्रष्टा, जग हितोपदेशी है तू ॥
अपने दर्शन का देना नज़ारा मुझे ।। टेक
वीर पारस हर हरि. ब्रह्मा कि बुद्ध अर्हन्त राम ।
या तुझे स्वाधीन कह दूँ, हैं हजारों तेरे नाम
जिन में हर इक है प्यारे से प्यारा मुझे ॥ टेक
जिन को विषयों की न आशा, है न दिल में राग है ।
स्वार्थ माया लोभ क्रोध अभिमान, का भी त्याग है ॥
ऐसे ऋषियों की सेवा है प्यारा मुझे-टेक
झूठ चोरी ईर्ष्या हिंसा, से हूँ हर वक्त दूर ।
शील सन्तोष और समता, का रहे दिल में जहूर ॥
माया लालच से होवे किनारा मुझे-टेक
मैत्री प्रमोद करुणा, धीरता गम्भीरता ।
देश की जिन धर्म की, प्रीति रहे मन में सदा ।
होवे तत्वों का राज, आशकारा मुझे-टेक
ऐब जोई और किसी के, भूलना अहसान को ।
यह न हों मुझ में, कि पर उपकारता का ध्यान हो ॥
सत पे कायम रहूं, यह हो प्यारा मुझे-टेक
मैं न फूलूं सुख में और, दुःख में न घबराऊं कभी ।
दिल न हो कायर कभी, हिम्मत रहे मेरी बढ़ी ॥
मेरे दिल में भरोसा, तुम्हारा मुझे-टेक
खुश रहें जग जीव सारे, खाने जंगी छोड़ कर ।
सब बनें धर्मात्मा, पापों से रिश्ता तोड़ कर ॥
सुख में आए नजर, जग यह सारा मुझे-टेक
खुश रहे प्रजा कि राजा, धर्म पर कायम रहे ।
वक्त पर बारिश हो, जग में शान्ति दायम रहे ॥
बहती आए नजर, प्रेम धारा मुझे-टेक
ईत भीत और रोग और, दुर्भिक्ष आलस में न हो ।
बद जुबानी बुग्ज कीना और हसद हम में न हो ॥
आवे नजर न शर का, शरारा मुझे-टेक
योग्यता से मैं गृहस्थी धर्म का पालन करूं।
वीर की भक्ति से बन कर, वीर कर्मों को हनूं ॥
आना दुनिया में हो ना दोबारा मुझे-टेक
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