वीर भक्ति
वीर भक्ति
( तर्ज—रे पंछी बावरिया )
क्यों ना ध्यान लगाये, वीर से बावरिया ।
जाना देश पराये, झमेला दो दिन का ॥ टेक ॥
जीवन तेरा है एक सपना, इस दुनियाँ में कोई न अपना ।
हंस अकेला जाये वीर से० ॥ १ ॥
माता, बहना, चाची, ताई, पिता, पुत्र और भाई जमाई ।
मतलब से प्रीति लगाये वीर से० ॥ २ ॥
जो हैं तुझको सबसे प्यारे, मृतक देख तुझसे हों न्यारे ।
कोई सङ्ग न जाय, वीर से बावरिया ॥ ३ ॥
जिस तन को तू खूब सजाये, आखिर में कुछ काम न आये ।
फिर पीछे पछताय, वीर से बावरिया ॥ ४ ॥
जिस माया पर तू इतरावे, आखिर में कुछ काम न आवे ।
वहीं पड़ी रह जाये, वीर से बावरिया ॥ ५ ॥
धर्म ही आखिर काम में आवे, हर दम तेरा साथ निभावे ।
“त्रिलोकीनाथ” समझाये, वीर से बावरिया ॥ ६ ॥
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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